जागरण संपादकीय ब्लॉग

Just another weblog

10 Posts

908 comments

Vishnu Tripathi


Sort by:

मुन्नी बदनाम हुई केखे लिए…

Posted On: 14 Nov, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (41 votes, average: 4.17 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others मस्ती मालगाड़ी में

127 Comments

वो बीमार नहीं, थके हुए हैं…

Posted On: 15 Aug, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (28 votes, average: 4.04 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

117 Comments

एक तानाशाह का बुद्धं शरणं गच्छामि (?)

Posted On: 28 Jul, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (15 votes, average: 3.60 out of 5)
Loading ... Loading ...

पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

89 Comments

देख तमासा बुकनू का (2)

Posted On: 3 Apr, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (18 votes, average: 3.72 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

30 Comments

देख तमासा बुकनू का.. (1)

Posted On: 9 Mar, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (13 votes, average: 4.08 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

68 Comments

लो फिर वसंत आई… या आया (2)

Posted On: 9 Feb, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

121 Comments

लो फिर वसंत आई… या आया (1)

Posted On: 20 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.10 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

75 Comments

Hello world!

Posted On: 13 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

Others में

0 Comment

आओ अब लिखा जाए

Posted On: 13 Jan, 2010  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (26 votes, average: 3.23 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others में

215 Comments

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मुन्नी के ऊपर आपका ये चुभता सा व्यंग के रंगों से आभूषित लेख पढ़ा और अपने को कुछ ठगा सा महसूस कर रहा हूँ. भारत का वर्त्तमान समाज जिस रंग में रंगता जा रहा है उसमे शायद मुन्नी भी अब पीछे छूट गयी है, पर ये कहाँ जाकर विराम लेगा ये कहना कठिन है. जब समाज में सामाजिक मूल्य खत्म होने लगते हैं तो ऐसे ही दृश्य उभर कर आते हैं त्रिपाठीजी. क़ानून और सामजिक नियमों को पालन करने वालों को गालियां मिलती हैं और मूल्य तोड़ने वाले भारत कि दुर्दशा को देख कर मन मसोस कर रह जाते हैं. रोज देर रात तक पुरे जोर शोर से लाउड स्पीकर पर ये मुन्नी वाले गीत एक जहर बन कर चारों ओर जिस वातावरण को बिखेर रहे हैं उसमें कभी कभी तो कोई गीत लिखने का मन भी उचाट होने लगता है. उन भावों को आपने अभूत सुंदरता से चित्रित किया है. मेरे अपने एक कुछ अलग से गीत को You Tube पर सुनियेगा, हो सकता है कुछ अच्छा लगे सुभकामनाओं के साथ...Ravindra K Kapoor

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

के द्वारा:

के द्वारा: SATYA PRAKASH SATYA PRAKASH

के द्वारा:

के द्वारा: rakeshvu rakeshvu

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

आदरणीय श्री त्रिपाठी जी, मुन्नी संप्रदाय से मिलवाया आपका धन्‍यवाद । चलिए किसी बहाने ही सही तेरे लिए तेरे लिए की विहंगम ध्‍वनि उत्‍पन्‍न तो हुई । क्‍या पता यह ध्‍वनि सभी कार्यो व क्षेत्रों में नजर आने लगें और लगे हाथो इस देश का कुछ भला हो जाए । हमारी जनसंख्‍या है अमेरिका, यूरोप, आस्‍ट्रेलिया...... तेरे लिए । हमारे खनिज भंडार है विश्‍व..... तेरे लिए । यह राग और यह ध्‍वनि हमारे देश में पहले से ही विद्यमान थी । बस अब मुन्‍नी के नाम से गुंजायमान हो रही है । लेकिन आपकी दृष्टि की दाद देनी होगी जो उसने कुछ समय में ही इतना कुछ देख लिया । लग रहा था कि कोई चलचित्र देख रहा हूँ । प्रत्‍येक अंग की मूवमैंट का वृहद वर्णन । सच अद्भूत । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK bhaijikahin by ARVIND PAREEK

भारतीय लोक संस्कृति में मुन्नी तो पहले से ही बद थी, बदनाम थी, चाहे उसका नाम जो भी रहा हो/ नई बात यह है कि अब उसकी बदनामी की बात व्यापक पैमाने पर होने लगी है/ ऐसा क्यों ? लोग चौंक क्यों रहे हैं ? कहीं हम अपनी लोक संस्कृति से विमुख तो नहीं हो रहे हैं ? फिर यह चर्चा अभी क्यों ? क्या इस कारण कि वैश्वीकरण के इस दौर में मुन्नी अपनी चाहत की अभिव्यक्ति में ज्यादा बोल्ड हो गयी है ? यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि मुन्नी एक पात्र है, जो पूरबी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचल में वर्षों से एक खास चरित्र की अभिव्यक्ति करती रही है/ एक भोजपुरी गीत में मुन्नी को उसका यार मिलने के लिए बुलाता है (साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना साढ़े तीन बजे )/ खैर, इस गाने का अतीत भी वहीं से जुड़ा है/ दबंग का यह गीत ' लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए, सलीमन तेरे लिए' से प्रेरित है/ बाद में एक गीत आया ' लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए' / दोनों में एक महत्वपूर्ण अंतर है - पहले लौंडा बदनाम होता था, अब लौंडिया बदनाम हो रही है/ यह बदलते परिवेश में मुन्नी के बोल्डनेस का सूचक है/ पहले की मुन्नी कुछ सहमी-सहमी सी थी, लेकिन अब उसमें अपनी चाहत की अभिव्यक्ति का साहस आ गया है/ बाजारवाद के इस दौर में ग्रामीण समाज की इस मुन्नी की अहमियत को फिल्म जगत ने भी पहचाना और उसे लपकने में कोई हिचक नहीं दिखाई/ एशिया महाद्वीप ही नहीं, अमेरिका तक को उसने हिला दिया / यह मुन्नी की ताकत थी, लोक संस्कृति की ताकत थी, जिसे बाजार ने पहचाना/ लेकिन इस बाजार ने इसके मूल स्रोत को उतना श्रेय नहीं दिया/ यही कारण है कि लोक संस्कृति से विमुख महानगर का अभिताज वर्ग इस पर चौंकता है/ वह वर्षा और बाढ़ को देखकर भी चौंकता रहा है/ यह तो उसकी आदत में शुमार है/ अब यदि ईद के अवसर पर कोई मुन्नी के गीतों पर थिरकता है, तो वह अकारण नहीं है/ ईद तो उसके लिए एक बहाना है/ दरअसल, मुन्नी उन्हें एक सांस्कृतिक पहचान देती है, एक सुकून देती है/ दिल्ली में रहने वाले बिहार के मजदूर सरस्वती पूजा करते हैं और उसी बहाने नाचते-गाते हैं/ आखिर विद्या की देवी से उनका क्या लेना-देना है ? उन्हें तो श्रम देवता की पूजा करनी चाहिए/ सवाल यह भी है कि ये लोग अंगरेजी या हिन्दी के शास्त्रीय गीतों पर इतना क्यों नहीं थिरकते हैं ? कहने का आशय यह है कि 'मुन्नी संप्रदाय' क्षेत्र, जाति व धर्म से परे है/ यह हीनता ग्रस्त नहीं है/ इसमें लोकानुरंजन है/ इसे अपनी संस्कृति पर गर्व है/ यह अभिताज वर्ग के सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देती है/ यह लोक की भावाभिव्यक्ति है/ इसका हमें सम्मान करना चाहिए/ विष्णु जी ने अपने यात्रा वृतान्त के जरिये मुन्नी के एक नए सांस्कृतिक पक्ष को उदघाटित किया है/ उनकी भाषा-शैली विषय के अनुरूप नर्तन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ती है/

के द्वारा:

मुन्नी की बदनामी नई बात नहीं है। वह तो जमाने से बदनाम होती रही है। नई बात उसका यह ऐलान है कि वह वह किसके लिए बदनाम हुई है। यही बेबाक अंदाज कथित उन्मुक्त समाज को भा गया है। परेशानी की बात यह है कि यह गाना कब्र में पांव लटकाए बूढे भी अपनों के बीच गा रहे हैं। ईद की मस्ती के दौरान रात में म्यूयजिक सिस् म पर यदि आंखें तरेरे मानसिक रूप से बच्चे और शारीरिक तौर पर युवा इस गाने पर अपने अंगों को मरोडते हुए अपनी कुंठा को अभिव्यक्त करते हैं तो कोई नई बात नहीं है। बीस साल पहले से यह परंपरा रही है कि छात्रावासों में सरस्वयती पूजा के दौरान छात्र रात में मां सरस्वती की प्रतिमा के सामने उस साल के सर्वाधिक प्रचलित गीतों पर डांस करते रहे हैं। वह गाना झूठ बोले कौआ काटे :::हो या कभी कभी मेरे दिल में याल आता हो हो। यहां एक बात जरूर स्परर्शी है कि आपने उनकी भंगिमाओं की जिन पैनी नजरों से व्याख्या की उसने उनके इस आइटम को जरूर गौर करने के काबिल बना दिया।

के द्वारा: ramnathrajesh ramnathrajesh

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

विष्णु भईया भोजपुरिया प्रणाम शुरुवात हम करेंगे इन पंक्तियो से जज्बातो के मरते शहर की पैदाईस हो गये हम सब, हर मोड पे एक एक मर्डर तो आज कायर भी करता है ,,, जी हम सही कह रहे है , अपना भी एक ऐसा ही अनुभव रहा जब हम अपने गांव अभी 20 दिन पहले गये थे जहा पे एक गांव पे बुजुर्ग के देहांत हो जाने पे उनकी तेरहवी मे जाने का मौका मिला और जिस समय उनके फोटो पे पुष्प अर्जित हो रहा था उसी समय एक गाने की दो लाईन सुनाई दी जिससे बाकी माजरा मालुम पड गया गाना था मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये झंडु बाम हुई डार्लिंग तेरे लिये अब राजु भईया तो दशहरी आम कह रहे है कोई लंगडा तो कोई खटहवा तो कोई तोतापुरी कह रहा है । मलाईका को देखने के बाद तोतापुरी ज्यादा उचित है । खैर आपके ब्लाग जीवंत होते है एक एक पंक्ति हमारे साथ चलती है और उनका असर वैसा ही होता है ठीक जैसे झंडु बाम के लगाने के बाद कोई पुराना दर्द काफुर हो जाता हो । एक करारा व्यंग्य एक जबरदस्त प्रहार आज के ढकोसले से भरे समाज पे । राजु भईया धन्यवाद इस महारथी से परिचय करवाने के लिये ! जय हो जिया हो ।

के द्वारा:

के द्वारा:

जैसे बाइकर्स, कनछेदन कराके बाली पहनने वालों, उतरने को उद्यत जींस पहनने वालों, अच्छी-भली काया पर डरावने चित्र बनवाने वालों के समुदाय हैं, वैसे ही आपका देखा मुन्यातुर समुदाय भी है। दूर से देखने पर ये सभी बड़ा बढिया और ज्ञानपरक अनुभव देते हैं। कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में हुआ था। जहां माता-पिता और परिवारीजनों के साथ पूजा करने आई एक युवती घुटने से करीब आठ इंच ऊंचा परिधान पहिने थी। फूलवालों और पूजा सामग्री बेचने वालों के द्विअर्थी जुमले तमाम लोगों को असंयत कर रहे थे, स्थान की पवित्रता में बट्टा लगा रहे थे। लेकिन युवती और उसके परिवारीजनों के लिए सब कुछ सामान्य था। जाहिर है कुछ लोग सिर्फ अपनी सुविधा के अनुसार माहौल बनाते हैं, उन्हें बाकी समाज से कोई लेना-देना नहीं होता। इजी कनेक्टिविटी के दौर में उनका जुटान भी आसान होता है औऱ इजी मनी के चलते साधन भी उपलब्ध रहते ही हैं। तब मूल्यों के मूल्यहीन होने में कितनी देर लगती है। रात के दो बजे का अनुभव बढ़िया पिरोया।

के द्वारा:

के द्वारा:

सर प्रणाम। अदभुत विश्‍लेषण किया है मुन्‍नी का आपने। खास तौर पर मुन्‍नी संप्रदाय के बारे में आध्‍यात्मिक नजरिए ने मुझे काफी प्रभावित किया है। यह बहुत कुछ कबीर का अपने निर्गुण राम के प्रति समर्पण जैसा ही है। जहां वह अपने राम के लिए दुल्‍हन तक बन जाते हैं- प्रभु मेरे पीव मैं राम की बहुरिया। आपके विश्‍लेषण में मुझे हिंदी सा‍हित्‍य के प्रख्‍यात विद्वान अज्ञेय का चिंतन नजर आता है। कुछ -कुछ मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा के यायावरपने की भी झलक मिलती है। जो कहीं भी कभी भी आगे बढ जाने के लिए ठहर जाता है। चिंतन करने लग जाता है। बिलकुल बुद्ध की तरह। अज्ञेय की कविता असाध्‍य वीणा का प्रियंवद भी वीणा को साधने के दौरान अपने आपको समर्पण की हद तक गुजर जाता है। वह अपने आपको वीणा के अस्‍ि‍तत्‍व से साम्‍य स्‍थापित कर लेता है। इस प्रकार वह असाध्‍य वीणा बज उठती है। वह कहता है- श्रेय नहीं कुछ मेरा सब कुछ थी तथता की। मैं तो डूब गया था स्‍वयं शून्‍य में। वही चिंतन प्रक्रिया आपने भी अपनाई है। अदभुत और अकल्‍पनीय चिंतन।

के द्वारा:

'मैं उस नर्तक समूह में एक संप्रदाय देख रहा था, मुन्नी संप्रदाय।' आदरणीय भाई साहब आपने अपनी इस यात्रा के बहाने एक नये संप्रदाय की खोज कर दी। वाकई आपके इस शब्‍द चित्र और यात्रा वृतांत से जागरण जंक्‍शन पर बदलते दौर की एक नयी तस्‍वीर चस्‍पा हुई है। इस रपट में मनोविज्ञान, मनोविकृति और उन अदृश्‍य अहसासों की तरफ भी इशारा है जिसे सामान्‍य तौर पर लोग समझ नहीं पाते हैं। दो बार पढ़ा हूं और बहुत मजा आया। कई जगह मन गंभीर हुआ और कई जगह गुदगुदी भी हुई। मसलन -----'उनकी आंखें लगातार चार हो रही थीं, लेकिन निश्चित तौर पर वो, वो नहीं थे, जिनके लिए कुछ दिनों पहले एक (अ) प्राकृतिक कानून बनाया गया है। ' ------- -'गाने के दौरान मुन्नी जब भी बदनाम होती तो तेबारी हो जाती, तिवारी हो जाती, त्रिपाठी हो जाती। वो तीन बार पाठ करती…तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। डार्लिंग! तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। इस त्रिपाठ में एक अदभुत लास्य भाव की अभिव्यंजना है। ललित मिश्रित कामोद और हंसध्वनि की वर्णसंकर भैरवीआइट रागात्मकता है।' यकीनन यात्रा का प्रसंग आपके शब्‍दों में ढलकर इतना पठनीय और मनभावन हो गया है कि उसे व्‍यक्‍त कर पाना मुश्किल लग रहा है। इस सुरुचिपूर्ण रपट के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

के द्वारा:

मत ऊड़ाओ इन कबूतरों को,  ये ही तो मेरे साथ रहते हैं... क्या हूआ जो गंदा किया मुझको,  इकबार ऊड़ कर फिर से लोट आते हैं... आज जो मुझको साफ कर रहे हो,  कल को माला व फूल चढ़ाओगे... सारा दिन इक मेला सा होगा,  हरकोई गांधी जंयती मनाएगा... जोर-जोर से लाउडस्पिकर को बजा कर,  बापू गांधी अमर रहे जैसे नारे लगाओगे... कुछ देश भक्ति के गीत गाकर,  अपने-अपने घर चले जाओगे... साल भर खड़ा रहता हूं,  इंतजार मैं करता रहता हूं.... कभी बस कुछ प्रेमी आते हैं,  बात कर, इश्क मेरे निचे बैठ लड़ाते हैं... और कुछ बच्चे भी आते हैं,  क्रिकेट का विकेट बना खेल कर जाते हैं... गांधी जयंती आया तो क्या हुआ,  किस लिए सारा देश परेशान है हुआ... टीवी पर देखो बापू आज याद आए हैं,  सारा साल क्राइम और नेताओं ने उसपर डेरा लगाया है... शाम ढलते ही तुमसब चले जाओगे,  काफी थके होगे आज, कुछ खाकर सो जाओगे... मत ऊड़ाओ इन कबूतरों को,  ये ही तो मेरे साथ 364 दिन रहते हैं... तुम तो आज गांधी जयंती मनाते हो,  गंदा कर ही सही पर हररोज जयंती मनाते हैं... मत ऊड़ाओ इनको,  ये ही तो मेरा साथ निभाते हैं।

के द्वारा:

वे थके हुए हैं। वक्त और परिस्थितियों ने थका दिया है। हम लोग अपने संपादकीय कक्ष में बैठकर कुछ भी बातें कर लें मगर देश की बागडोर थामने वाला वह भी भारत जैसा, कांग्रेस के भीतर की जो स्थितियां हैं उनमें, वह भी कई साल पहले रिटायर हो चुका व्यक्ति अगर सरकार चला रहा है तो उसे ताकत दी जानी चाहिए जब तक हम दूसरा विकल्प नहीं दे देते। अखबार और पत्रकार निंदा तो करते ही हैं मगर व्यक्तिगत निंदा से बचना चाहिए। ऐसा आप बड़े भाइयों ने ही सिखाया है। प्रधानमंत्री होने के नाते हमें उनकी निंदा करनी चाहिए मगर उनके किए कार्यों और उनके शब्दों की,  न कि उनके स्वास्थ्य और उनके चेहरे की। आप हम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं, मार्गदर्शक  हैं उम्मीद है अगले पोस्ट में जोरदार और मन तो झकझोरने वाला विष्णु त्रिपाठी का लेख पढ़ने को मिलेगा। 

के द्वारा: shaileshasthana shaileshasthana

लेखक नें तो वही लिखा है जो उसने महसूस किया उस अवसर पर।  सच में एसपी सिंह सच काफी कडवा होता है और देश की बात करते हैं  और पार्टी के स्वार्थ में लालकिले से भाषण दिलवाते है आप ठीक कहते हैं कि जब लेखक 70 साल के होंगे तो कैसे व्यवहार करेंगे वो वह ही जाने  पर लिखने की आजादी सभी को है पर क्या 64 साल की आजादी के बीतने पर  भी देश का हाल भी जानते हैं और इन सालों में इसी पार्टी का राज ज्यादातर रहा है  तो इन सालो में देश ने तो बहुत तरक्की की पर जनता वहीं लालकिले के निचे ही भाषण  सुनती रही। और आज भी इसी इंतजार में है। कब तक पार्टी का प्रधानमंत्री लालकिले  से देश के लिए भाषण दे... कब तक पार्टी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को थोपती रहेगी।  बस 5 साल का शासन करना है और भविष्य की योजना बनानी है । लेखक ने जो  देखा वो लिखा है देश के हित में न कि पार्टी के हित में। लगता है सच जान कर  आपको काफी तकलीफ हुई होगी क्यों कि पार्टी के आप भी भक्त लगते हो न देश के।   देश को तो आज अच्छे नेता चाहिए न की पार्टी के प्रचारक। आपको भी पार्टी भक्ति छोड़कर देश और समाज के लिए कुछ सोचो दोस्त।

के द्वारा:

sh.tripathi ji kabhi aapki lekhani padna raha aur bahut dunda usdink ka newspaper jismey unki kuch jaani pachnai bhasan ki perti per kahni nahi mila jismey desh ke p.m.ke uchvicahar mujhey yahi laga yeh nahi bol paye inke upper kaamka bojh bahut pures deeshi/duniya ki sab samsaye in ki dil aur maathey per har samay rahti hain becharey karey bhi kya karein kis ko apne dookh mein milayen kabhi madam ki sunno kabhi virodhiyon ki sunno kabhi opposition leade ki sunno jis ko nakara uske virodhi khud hogaye aur subsey badi samsya naujawn dost ki suno itna time mil nahi pata ki biwi ko apna dookh sookh baatlein zara sa mann ghar lagney chaley jaiyein tab bas afta aayjaye gi sab kah detey bhai agr samay nahi ta tab aur bhi zamney meie aapke sivay bhasand deny ke liy aaj kal gali gali chape chape koi na koi neta desh ka bhar apney kandhey per daaley rahta hai woh issliy lal quiley per apni awaz ko uncha karney gay chal iss bahney unchai se deshwasiyon se kuch gapshap maarloonga waseybhi itni secquirity hogi ki apne dil ki to kuch kah nahi sakta desh ke baarey meie meri kya visat jo apna dookhada roun kyunki inbatton ko to khuleam ab janta ke saamney vote laytey samay hi kahana padta barna voto ke samay janta ko kya jwab dengey woh election ke dino meie hamari baatey sunney hi aati hai hamra cher dekhney nahi aati iss cherey ko to t.v.baaley 15august and 26th january ko hamrachera hi public ko dekhna padta aur lal quiley se bolein har samsya ko roj t.v.news channel badi badi likhai meie dikha detey hain aur boletey t.v. per hain kaan hamre phtey uddhar aajkal gaon ke punch bhi hamre punch maarkar desh ki sabhi smasyon ko bol deytey hain hum kya bole pujab ki koi samsya hai nahi woh to hamari biwi ko hamney samjha diya hai kahadena thekey harey huye hain koi jyada insey na bole kewal haath milana ho mila lo u.p.meie hum bole to kya bole uttrakhand meie bawa ramdev apna aur hamra kaam bol kar chaladeytey hain baki desh meie hamrey asiey asiey leder hamari aguwai kartey hain k haum thhekey huye ho ya na ho woh bol kar hamari jaan bacha leytey humm ko cheek kar nahi bolsaktey bihar meie laloo hi bahut hai issliy hamdesh ki janta ko pasand hain hamrey naam aur kaam ko sabhi jaantey hai humey yeh kursi kyun mili hai isko humey kis prakar nibhna hai tabhi hamrey desh ke gaon meie padney wale bachhon ko yeh bhi nahi pata hum iss deh meie kya hai hamri baaton ko aur log kartey desh ki haalt ke woh jaagirdaar hain hum issliye thhak jaatey hain ki hummey yeh dekhna hai kaun hamri jaga bola sahi hai ya galat kyunki humey bhi upper jawab dena hota haihamko desh ki har samsya ke liye har meeting meie bhi rahna zaroori hai per hum nahi huye tab kya hua hamrey p.a. hi hamrey binbaat puri kardey hain asia hi sahi hamarithankan ko woh kisi per hona nahi deytey abhi bimar padey desh ka kaam nahi ruka hum kahin ho ya na ho desh ka kaam nahin ruk sakta yahi hamri party ki lokpriyta hai issiley ham ko desh ka asia p.m.banayaga hai hum kuch bolna bhi nahi chhatey aur hamrey bagger bole desh chalta rahey yahi hamri desh ke saat subhkamnaye hain................jai jaihind......jaihind

के द्वारा:

के द्वारा:

लगता है लेखक महोदय किसी अवसाद से पीड़ित हैं या किसी ख़ास विचार धारा के पोषक हैं क्योंकि उन्हें डाक्टर मनमोहन सिंह का नाम भी अपने लेख में लिखने में शायद कुछ कठिनाई हो रही थी \ अच्छा होता की वह अपने लेख में उनके पूर्वर्ती प्रधान मंत्रियों के भाषणों से तुलनात्मक व्याख्या करते तो कुछ रोचकता झलकती | यह इतिहास का सत्य है कि कुछ प्रधान मंत्री ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने न तो संसद का सामना किया और न ही लालकिले से भाषण ही दे पाये थे, जो मनमोहन सिंह जी से पहले लगातार छ: वर्षों तक भाषण दे चुके हैं क्या उन्होंने ने लालकिले के प्राचीर से पडोसी को दी गई चेतावनी पर कभी अमल किया था \ स्वाधीन भारत में एक सबसे बड़ी आजादी है बोलने लिखने की पूर्ण सवतंत्रता \ लेखक को शालीनता का परिचय अपने लेख में देना चाहिए था \ लगता है की लेखक बहुत ही युआ हैं जो शायद बुजर्गों की खिल्ली उड़ाने के अभ्यस्त है और मैं आशा भी करता हूँ की लेखक कल्पना करें की जब उनके पिता श्री ८० वर्ष के होंगे तो वह कैसे व्यहार करेंगे तब उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? ////////////एस.पी.सिंह. मेरठ

के द्वारा:

फिल्में समाज का और समाज फिल्मों का आइना होता है-दोनों एक दूसरे पर अपनी छाप छोड़ते हैं। दरअसल 'वो' मूक अभिनय (साउंड लैस) की फिल्मों के दौर में जन्मे हैं, इसलिए बे-आवाज हैं। प्रचीन संस्कारों में बंधे हैं, इसलिए महिला स्वर को मातृ आदेश मानकर सकारात्मक लहजे में गर्दन हिलाने भर का काम (अभिनय) करते हैं। प्राचीन संस्कारों व अनुशासन के बंधन में ही वो स्कूली दौर में चोरी-छिपे सोहराब मोदी और पृथ्वीराज कपूर सरीखे बुलंद आवाज वाले सिनेमा तक पहुंच नहीं सके। वैसे भी भारतीय राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रपिता के स्मरण बिना पूरा नहीं हो सकता, जिनके आदर्श तीन बंदर बिन बोले इशारों से ही अपनी बात कहते हैं।

के द्वारा:

वो बीमार नहीं थके हुए हैं........ पढ़ते हुए, पढ़ने के बाद कई चीजें घटित हुईं। पलटता हूं तो सब एक-दूसरे से जुड़े दिखते हैं। ब्‍लाग पर आपको पढ़ रहा था तभी टीवी पर आरबीआई का नोटों की पहचान वाला विज्ञापन आ रहा था, जिसमें दादा अपनी पोती से संवाद कर रहे हैं---असली नोट की पहचान, बापू वाली तस्‍वीर का वाटर मार्क। 63 साल में कहां पहुंच गये बापू। विदेशी कंपनी की कलम की निब से नोटों के वाटर मार्क तक। एजेंसी के ट्रैक पर संसद ठप के साथ ही संसद से जुड़ी डेढ़ दर्जन खबरों के बीच वह खबर भी , जिसमें छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के सांसद चरणदास महंत की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन सचिवों के वेतन से एक रुपया अधिक यानी.80, 001 रुपये प्रतिमाह वेतन देने की सिफारिश की है। खैर, इसे यहीं समाप्‍त करते हुए मैं आपके उठाए मुद़दे पर ही चलता हूं, चूंकि इस युग का केंद्रीय प्रश्‍न यही है। केंद्रीय प्रश्‍न........इसलिए चूंकि राजनीतिक पार्टियों के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लगभग ठप पड़ जाने ने एक बड़ा शून्‍य खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि बिना एम्प्लीफायर सिस्टम के सपोर्ट के जिस वाणी में ओज होना चाहिए, वह इस सपोर्ट सिस्‍टम के बावजूद लाल किले की प्राचीर पर घरघराता दिखा। दीगर यह कि आपने इसे महसूस किया, लिखा और हम सब आपको पढ़कर महसूस कर रहे हैं। सोचने को बाध्‍य हो रहे हैं। बहुत पहले की बात। एक सभा में नेहरू जी से एक आदमी ने पूछा था कि आजादी के दस साल बीत गये और मेरे पास रहने को घर नहीं, काम करने का साधन नहीं है, ऐसे में आजादी का क्‍या मतलब है? उस समय नेहरूजी ने कहा कि आजादी का यही मतलब है कि देश के प्रधानमंत्री से तुम यह सवाल कर रहे हो। गुलाम भारत में यह संभव नहीं था। कितना बड़ा फर्क आ गया। आज के प्रधानमंत्री के खुद की अभिव्‍यक्‍ित की आजादी एक नहीं दो जोड़े हाथ तय कर रहे हैं। 300 करोड़पतियों की जुटान वाली संसद और दूसरी ओर कई करोड़ लोगों की आय एक दिन में बीस रुपये से ज्‍यादा नहीं। ऐसे देश में जी रहे हैं, हम।

के द्वारा:

आपने बिल्कुल सटीक लिखा है,इतना बोझिल और ऊबाऊ भाषण अब तक किसी प्रधानमंत्री का नहीं रहा। वैसे तो मनमोहन सिंह के जितने भी भाषण अब तक लालकिले से हुए हैं प्रायः नीरस ही रहे हैं लेकिन उन सभी भाषणों से इस 15 अगस्त पर दिए गए भाषण की तुलना की जाए तो उसमें इसकी रेटिंग नंबर वन होगी। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री जी भाषण बांच रहे थे। उनके भाषण में केवल समस्याएं थी,समाधान नहीं। एक समय था जब पंिडत नेहरू,इदिरा जी और वाजपेयी जी बोलते थे तो पूरा देश उनके भाषण को दम साधे सुनता था। और तो और इतना बोगस भाषण तो देवगोड़ा जी का भी नहीं रहा। कल कांग्रेस प्रवक्ता भी चैनलों पर प्रधानमंत्री के भाषण के पक्ष में वकालत कर रहे थे लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी। जिस देश में 80 रुपए किलो दाल बिक रही हो,कश्मीर में आतंकवादियों और दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हाथों सुरक्षा बल के जवान शहीद हो रहे हों। जिस प्रधानमंत्री के आदेश की उसकी कैबिनेट के सदस्य ही अनदेखी करते हों तो इससे ज्यादा दुखद स्थिति क्या हो सकती है। दस जनपथ के रिमोट से प्रधानमंत्री का दिमाग कब तक चलता रहेगा,यह एक बड़ा सवाल है। शायद तब तक जब तक कि युवराज इस योग्य नहीं हो जाते। आदरणीय विष्णु जी इस सामयिक पोस्ट के लिए लिए बधाई। 

के द्वारा:

के द्वारा:

सादर प्रणाम विष्णु भईया ... एक तानाशाह से लोकतंत्र / प्रजातंत्र का सफर वो भी आपके साथ , वाकई बेमिशाल रहा । सीधे सपाट व्यंग्य तो आज कल टिनहिया ( धम धम बजने वाला ) भी कर लेता है लेकिन आपने जिस अँदाज मे संसद को हिला दिया है शायद शिल्पा शेट्टी भी अगर जान जाय तो शर्मा जाय । अरे विश्वास किजिये , हम सही कह रहे है , आज के लेखन शैली मे जिस प्रकार का अकाल आया है जैसे लग रहा है कि मल्लिका शेहरावत ने नई डिजाईन की फरमाईस कर दी हो । लेकिन आपके लेखन शैली को पढने के बाद ऐसा लग रहा है की भारतीय पहनावे मे कोई दुल्हन दास्तान ए हिन्द को प्रस्तुत कर रही हो । वाकई समस्याये विकराल है तेज का बहुत अकाल है कोई कहे महाकाल है कोई कहे विकराल है यह तो हर साल है इसी बात का बवाल है वो ना तो काल है और ना ही बवाल है यह तो प्रजातंत्र का सुरतेहाल है जनता हर तरह से बेहाल है आम आदमी फटेहाल है गाँव बन रहा कंकाल है शहर मे मचा धमाल है नेता जी मालामाल है जिस प्रकार से हमारे शीर्ष के नेता अपनी रंग रोगन से देश के अस्मिता को और फटेहाल बना रहे है उस चीज को  आपने बहुत ही बेहतरीन , लाजवाब और उम्दा तरिके से दिखाया है । हम विश्लेषण नही करेंगे क्योकि सब कुछ आपने कह दिया है अब तो बस बुझो तो जाने वाला हिसाब किताब है । राजु भईया को धन्यवाद कोटिशः धन्यवाद जो हमे एक बार फिर से मौका दिया यहा तक आने के लिये । आपको कोटि कोटि धन्यवाद जो आपने अपनी लेखन शैली से हम जैसे पतझडिये आदमी को वसंत की सौगात दे दी शायद सावन भी इसी मे है .. धन्यवाद नवीन भोजपुरिया

के द्वारा:

विष्णु भाई, पहले तो इतनी सुंदर, परिपक्व व नियंत्रित भाषा, शैली और प्रवाह के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें। लखनऊ से कानपुर जद में लगता रहा होगा, किंतु अब दिल्ली आने के बाद माटी से दूर होने की कसक और उस खुशबू को पाने व बिखेरने की ललक आपकी लेखनी से झलकती है। जिससे पत्रकारिता तो समृद्ध हो ही रही है, हम जैसे तमाम लोग जिन्हें रोजी-रोटी की तलाश वतन से दूर ले आई है, को न सिर्फ अपनी माटी से जोड़ती है अपितु आपसे भी ए क चीन्हा-अनचीन्हा रिश्ता स्थापित करती हैं। बुकनू की कहानी हो या बसंत की महिमा या पीए म की निर्मम समीक्षा, सभी को पढ़कर आनंद आ गया। ब्लाग के साथ-साथ इन तरह के आलेखों को अखबार में भी स्थान मिलना चाहिए । यह मेरा निजी अनुरोध है कि आप आदरणीय काका और शेखर जी को भी इसके लिए प्रेरित करें तो पत्रकारिता में स्थापित और आने वाले तमाम लोगों के लिए ए क उच्च मानदंड व दिगदर्शन होगा

के द्वारा:

सर, थान श्वे के दिन लद गए हैं । तुलसी दास ने लिखा है - एक घडी आधो घडी आधो में पुनि आध तुलसी संगत साधु की हरे कोटि अपराध। यदि श्वे को अपराध बोध हुआ है और अशोक की तरह बुद़ध की शरण में आया है तो वह निश्चय ही मुकि्त का पात्र बन गया है। जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि उसे यह अहसास हो जाए कि उसकी भूमिका एक माली की थी, उसका दायित्व फुलवारी के पौधों का बेहतर ढंग से देखभाल करना था तो वह मोक्ष का पात्र बन गया है। गीता में भी भगवान ने कहा है- सर्व धर्माणि परितज्य मामेकं शरणं ब्रज अहम त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्ष्श्यामि मा शुच:। अत: उसका यह अहसास ही पर्याप्त है कि कैंची फुलवारी के पौधों को बेहतर आकार देने के लिए उसके हाथ में मिली थी, पौधों को बेतरतीबी से काटने के लिए नहीं। कैंची के गलत प्रयोग ने ही उसे तानाशाह का तमगा दिला दिया। सवाल यह है कि चाटुकारों से मुक्त होकर क्या श्वे कभी आत्म चिंतन करने के लिए प्रेरित होगा। क्या उसे कभी उस दर्द का अहसास हो पाएगा जो किसी के परिजन की हत्या के बाद उस पर आश्रित भोगते है। यदि भगवान बुदध की शरण में आना दिखावा नहीं था तो क्षण भर के लिए श्मशान विरक्ति के रूप में ही सही उसका सत्ता से मोहभंग होगा और उसे अपने किए पर अकेले में पछतावा होगा। रही बात म्यांमार की तो अत्याचार का अंत तो होना ही है। कोई निरंकुश शासक कितने दिनों तक राज कर सकता है । ईश्वरीय सत्ता के अलावा सारी सत्ताएं नश्वर और परिवर्त्नशील हैं। अत: म्यांमार को जितने बुरे दिन देखने थे उतने उसने देख लिए, अब तो जो भी होगा बेहतर ही होगा। आपका इस विचारोत्तेजक लेख ने लेखन पर खुद लगाए गए ताले को खोलने का काम किया। संदर्भ भले ही अंतरराष्ट्रीय हो, बात तो चिंतन के स्तर पर ही आकर ठहरती है। श्वे को सदबुद़िध आए यही कामना है।

के द्वारा:

आदरणीय सर, प्रणाम। आपका यह ब्लॉग पढा। मन में एक सवाल उठा कि जनरल थान श्वे का बुद्धं शरणं गच्छामि महज एक दिखावा या अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए एक छलावा तो नहीं। वस्तुत: यह तानाशाहों की एक सामान्य प्रवृत्ति रही है जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से समर्थन हासिल करने के लिए या फिर अपने क़ृत्य को जायज ठहराने के लिए सहज ही धर्म का सहारा ले लेते हैं। चाहे वह सम्राट अशोक हों या फिर जनरल थान श्वे। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध में लाखों व्यक्तियों के मारे जाने के बाद युद्ध -विजय की जगह धम्म-विजय का अभियान चलाया था। किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद अशोक ने न तो कलिंग का राज्य वापस किया और न ही अपनी सेना विघटित की। यही नहीं उसने पराजित राजाओं को उनके राज्य भी नहीं लौटाए। उसने राज्य में पशु-वध निषेध किया था किन्तु राजकीय रसोई में मांसाहार पकाया जाता था। वस्तुत: चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा आरम्भ की गयी राज्य-निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढाते हुए अशोक ने मौर्य साम्राज्य की चौहद्दी तैयार की थी। अब ऐसे में जनसामान्य मेंअपने साम्राज्यवादी कृत्य को न्यायोचित ठहराने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि धर्म का सहारा लिया जाए। अशोक ने भी वही किया। जनरल थान श्वे भी वही कर रहें हैं। वर्ना बौद्ध स्थलों की यात्रा करने से पहले वह वर्षो से नजरबंद व नोबेल पुरस्कार विजेता शांतिदूत आंग सान सूकी को रिहा करते और म्यानमार में लोकतंत्र- बहाली की घोषणा करते। काश आपकी कल्पना साकार होती।

के द्वारा:

के द्वारा:

त्रिपाठी साहब जी बहलाने के लिये ही सही, एक कल्पना ये भी करें कि जनरल का शायद हृदय परिवर्तन हो रहा है, और बहुत शीघ्र म्यांमार से कुछ रचनात्मक और सकारात्मक परिवर्तन वाले निर्णय लिये जाने पर मंथन चल रहा हो, ऐसी खबर छन कर आए । क्योंकि यह भी शाश्वत है कि हर अतिमहत्वाकांक्षी तानाशाह और क़ौमों का या तो दुखद अन्त हुआ है, या फ़िर हृदय परिवर्तन, जिसने लोक कल्याणकारी रचनात्मक परिवर्तन को जन्म दिया । विध्वंसक हथियारों के निर्माता कालान्तर में नोबल बने हैं, और किसी नरसंहार के दोषी अशोक के कारण बुद्धत्व को प्रचार-प्रसार मिला है । वैसे यह एक खयाल ही है । बेहतरीन लेख के लिये बधाई … आर.एन. शाही । shahirn.jagranjunction.com

के द्वारा:

विष्णु त्रिपाठी सादर प्रणाम एक निरंकुश तानाशाह और उसके आडम्बर , या शायद ऐसे कई उदाहरण जब हमारे मानस पटल पे कुछ ऐसी सोच , कुछ ऐसी सिलवटे दे के जाते है जिनको सोच के कभी कभी रुह कांप जाती है । एक तानाशाह की असलियत जो दिखाई दे रही है या ये आडम्बर जो नंगा सच है । आपने जिस प्रकार भगवान बुद्ध और फिर उनकी सोच को आज के वस्तुस्थिति मे उतारा है उसके लिये आप कोटि कोटि बधाई के पात्र है । सत्य - असत्य का द्वन्द , और उनके एक दुसरे से भिडने की प्रक्रिया , और आडम्बर के टुटने का सच , और एक तानाशाह और उसके सिपाहसलारो का वही चाल चलना जो एक असत्य का पुजारी चलता है जैसी चीजो को आपने बहुत ही बेहतरीन तरिके से दिखाया है । भाई मुकेश जी के टिप्पणी से मै बिल्कुल सहमत हुँ कि आपकी रचना पढने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी जी लिखी कोई ताजा तरीन रचना पढ रहा हुँ । एक बेहतरीन लेख , जिसे हर पाठक को पढना चाहिये । राजनीति , तानाशाही , अध्यात्म , सत्य , असत्य और जनता की बेचारगी का एक बेहतरीन संगम । आप कोटि कोटि बधाई के पात्र है । धन्यवाद दुंगा मै राजु भईया का जिनकी वजह से मै यहाँ तक पहुंच पाया । आपका नवीन भोजपुरिया

के द्वारा:

के द्वारा:

एक तानाशाह की तीर्थयात्रा... सचमुच एक पत्रकार की अन्वेषी नजर ही इसे पकड़ सकती है। म्यामार के राष्ट्राध्यक्ष की कुरसी संभालते समय जनरल थान श्वे जिस हेकड़ी में दिखते होंगे, सारनाथ  में उनकी देहभाषा उनकी बेचारगी को परिभाषित कर रही थी। धम्मेख स्तूप की परिक्रमा करते समय उन्हें कदम बढ़ाने के लिए एक सहायक के सहारे की जरूरत पडी। जब वह बुद्ध के प्रतीकों के समक्ष दंडवत हुए तो लगा कि उन्हें अपने किए पर कहीं न कहीं पछतावा होने लगा है। आपने इस पूरी स्थिति को जिन वाक्यों में बांधा है, उसके लिए एक ही शब्द है अदभुत।  एक तानाशाह की यात्रा का सटीक निहितार्थ निकालने के लिए वाराणसी टीम की ओर से आपको ढेरों बधाईयां। साथ में एक सवाल भी मन में उठ रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी तानाशाह की यात्रा को मीडिया किस रूप में देखे, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। कल जब फोन पर आपने सारनाथ और बुद्ध के संबंधों के बारे में दरियाफ्त की तो मुझे लगा कि आपके अंतरमन में जरूर कुछ हलचल मच रही है। उस हलचल के दरमियान जो मंथन और साधना हुई, उससे जो खूबसूरत मोती  निकले, उसकी कल्पना न थी। - राघवेंद्र चड्ढा, वाराणसी -      

के द्वारा:

आदरणीय भाई साहब! बहुत दिन बाद आपको पढने का मौका मिला.. बहुत अच्छा लगा.. बधाई .... बुद्ध अनूठे हैं, ध्रुवतारे हैं, उन तक पहुँच कर हर तानाशाह को अपने गुनाह याद आते हैं. आपने अपनी कल्पना से जो सवाल उठाये हैं वह तो नियति है. सम्राट अशोक हों, डाकू अंगुलिमाल या फिर म्यामार के राष्ट्राध्यक्ष जनरल.. बुद्ध ने यही तो कहा - किसी की गर्दन को काट देना आसान है, उसे जोड़ना मुश्किल. अब कौन जोड़ना चाहता है. जब तक काटने में सुख मिलता तब तक तलवारें चलती रहती हैं. जिस दिन मन भर जाता उस दिन बुद्ध की शरण में लोग चले जाते हैं.. चाहे कोई राष्ट्राध्यक्ष हो या आम आदमी, एक दिन बुद्ध की शरण में जाना ही है. क्योंकि मन की शांति तो वहीं मिलती हैं.

के द्वारा:

के द्वारा:

भाषा, शैली और विट के मामले में आपके पोस्ट मुझे रागदरबारी की याद दिलाते हैं। बस संदर्भ बदलने की देर है। तो फिर…। एक किताब और क्या। आपने नान फिक्शन भी लिखा तो वह फिक्शन से कम नहीं होगी। ऐसी अपेक्षा इसलिए भी क्योंकि, यदि कोई अपने दिक् काल, सराउंडिंग्स, भाषा, संस्कृति और संस्कारों को इतनी तीव्रता से महसूस कर सकता है, उन पर इतनी तीक्ष्ण और विश्लेषणात्मक नजर रखता है (.यह इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि सेंट्रल डेस्क के अन्य साथियों के साथ मुझे भी आपको सुनने के कई अवसर मिले हैं, बल्कि उनसे कुछ ज्यादा ही…) तो मैं जानता हूं ऐसी उम्मीद ज्यादती नहीं मानी जाएगी। इस महान बुकनू की महिमा, गरिमा से पहला परिचय आपकी ही पोस्ट से हुआ। इससे पहले मैंने यह शब्द सुना भी नहीं था। कभी इसे खाना चाहूंगा। Click here to cancel reply. Name (required) Mail (will not be published) (required) English Hindi Hinglish Security Code: Reset

के द्वारा:

आदरणीय विष्णु जी, बुकनू श्रृंखला पढ़कर हतप्रभ हूं। सिद्धहस्त व्यंग्यकार की लेखनी है यह। वह भी गांव के चौपालों पर किस्सागोई में दक्ष लोगों की जुबान जैसी....। हालांकि कुछ प्रश्न उठ रहे हैं- जैसे, वह कौन सा प्राण तत्व है, जो बुकनू को इतना स्वादिस्ट और औषधीय बना देता है (मैंने शहर में बिकने वाला पैक्ड बुकनू भी खाया है, लेकिन उसमें वह मजा नहीं है, जो गांव की चाची के हाथ के बने बुकनू में था), बुकनू का उद्भव और विकास कैसे हुआ होगा। इसका नाम बुकनू ही क्यों रखा गया और कुछ क्यों नहीं। आखिर बुकनू का अर्थ क्या है...  । इन सवालों के जवाब अगले एपीसोड में खोजने का प्रयास कीजिएगा...। एक बार फिर लेखन की शैली के लिए बधाई।

के द्वारा:

भाषा, शैली और विट के मामले में आपके पोस्ट मुझे रागदरबारी की याद दिलाते हैं। बस संदर्भ बदलने की देर है। तो फिर...। एक किताब और क्या। आपने नान फिक्शन भी लिखा तो वह फिक्शन से कम नहीं होगी। ऐसी अपेक्षा इसलिए भी क्योंकि, यदि कोई अपने दिक् काल, सराउंडिंग्स, भाषा, संस्कृति और संस्कारों को इतनी तीव्रता से महसूस कर सकता है, उन पर इतनी तीक्ष्ण और विश्लेषणात्मक नजर रखता है (.यह इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि सेंट्रल डेस्क के अन्य साथियों के साथ मुझे भी आपको सुनने के कई अवसर मिले हैं, बल्कि उनसे कुछ  ज्यादा ही...) तो मैं जानता हूं ऐसी उम्मीद ज्यादती नहीं मानी जाएगी। इस महान बुकनू की महिमा, गरिमा से पहला परिचय आपकी ही पोस्ट से हुआ। इससे पहले मैंने यह शब्द सुना भी नहीं था। कभी इसे खाना चाहूंगा।            

के द्वारा:

भाई विष्णु जी काशी क्षेत्र से हूं, लिहाजा लकड़ी का तमाशा तो - होता है, शबो रोज़ मेरे आगे। फिर भी आपने बुकनू का जो तमाशा दिखाया, उसका जबाव नहीं। वैसे तो आपको मालूम ही होगा कि बुकनू ने कनौज-कानपुर की सीमाएं तोड़ दी हैं। सरयूपार तक जा पहुंचा है। सही कहा जाय तो आयात किया जा रहा है। वहीं क्यों, यहां दिल्ली में भी उसके रसिया हैं। कानपुर से मंगा लेते हैं। स्वाद तो आ जाता है, लेकिन अम्मा की उंगली ने जीभ- तालू पर जो जायका आपको दिया, बुकनू का  तमाश, लिख आपने उसका हक़ अदा कर दिया। यही नहीं उस पूरे परिवेश और सरोकार को भी आपने जीवंत कर दिया, जिसे आपने देखा। इस दौर में जो नहीं दिखता। दूसरी बात- धर्म की किताबों में लिखा है  विद्यारंभ के पहले बालक की जीभ पर शहद से ओम लिखना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी चटपटी लेखन शैली, जीभ पर चढ़े बुकनू का ही नतीजा है। खैर जो भी हो, आनंद आ गया। मन तृप्त हो गया। इसके लिए आपको बहुत बधाई. राजकुमार                

के द्वारा:

अरे वाह, विष्णु जी, आनन्द आ गया। बुकनू तो बहाना उस कालखंड के इतिहास, भूगोल और संस्कृति का आपने हू-ब-हू चित्रण कर किया है। आपका यह शब्द चित्र वाकई काबिले तारीफ है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि बुकनू के बहाने इतनी सारी चीजों पर एक साथ रोशनी डाली जा सकती। दाद देनी होगी आपके यादाश्त को। वाह क्या बात है, जीते बुकनू, मरते बुकनू, देख तमाशा विष्णु का। हां, बुकनू के जिन घटकों का आपने ने पिछली बार जिक्र किया था उसमें मुझे लगा एक घटक छूट गया था और वह था अजिया और नन्नों के स्नेह का पाक। सारी बीमारी, परेशानी और हैरानी की अचूक दवा तो यही है जिससे हम दिन-ब-दिन दूर होते जा रहे हैं। एक बार और आपको बधाई। ऐसे लेखन के लिए जिसे पढ़ने को मन चाहे, जिससे ऊब न हो और जिसे जबरिया न पढ़ना पड़े।

के द्वारा:

बुकनू के बहाने लोक की सैर कर चुका हूं। घटनाओं का इतना संवेदनासंपन्‍न और सृजनात्‍मक आख्‍यान अति सुंदर लगा। सबसे बड़ा चिंतनीय पक्ष यह है कि हम लोकपरंपरा के उन पक्षों को बिसराते जा रहे हैं जो अब भी हमारे लिए लाभकारी हो सकते हैं। जगजीत साहब की आवाज में यह शे'र जिन्‍हें नहीं रुलाता वे संवेदनासंपन्‍न नहीं हो सकते : खूब गए परदेस कि अपने दीवार-ओ-दर भूल गए शीशमहल ने ऐसा घेरा, मिट्टी के घर भूल गए       दादी या नानी मां की कहानियां भी आज के दौर में बुकनू हो चली हैं। अपने एक मित्र पूर्ण 'अहसान' का शे'र याद आ रहा है : घर से रामायण का रिश्‍ता टूट गया जबसे दादी मां का चश्‍मा टूट गया। आपको बुकनू 2 के लिए बधाई।                           

के द्वारा:

के द्वारा:

ाेूदह सोगे जाी्ग्ो लाेूो जोुगलो ्द ौहा माुद ास ूगीदूागद कककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककक\"Ola ोसगुद é um Anjo        ♥          ♥   ♥ Que está sempre ao nosso lado        ♥          ♥ ♥ Mesmo que na distância.        ♥    ♥       ♥ ♥ É aquele que compartilha nossas alegrias  ♥   ♥ E minimiza nossas tristezas.♥    ♥        ♥          ♥ ♥ É aquele que se cala nas horas certas♥   ♥         ♥ ♥ E dentro desse silêncio nos diz tudo…♥     ♥        ♥     ♥ ♥        ♥          ♥ ♥ Amigos, não são    ♥                ♥         ♥ ♥ aqueles que estão     ♥      ♥ do nosso lado, mas           ♥         ♥ ♥ sim aqueles que       ♥           ♥         ♥ ♥ quando prescisamos      ♥            ♥ ♥ de sua ajuda nos     ♥         ♥         ♥ ♥ dizem: CONTA COMIGO ♥Conte comigo sempre!!!♥ कक

के द्वारा:

बचपन में घर के खाने के साथ खाये बुकनू का स्वाद मुंह में आ गया। कई बार आई लार को वापस गटकने के बाद लिख रहा हूं कि परंपरागत विषयों के इस लेखन को बरकरार रखियेगा, इसे भी हमारी मूल परंपराओं की तरह विलुप्त मत होने दीजिएगा। चार साल आठ महीने के बच्चे की याददाश्त का मैं मुरीद हुआ। एक दिन प्रतिक्रिया भी लिखी लेकिन 10-12 पंक्तियों का लेखन तकनीकी कारणों से कहीं लुप्त हो गया। ठीक हुए सिस्टम ने आज फिर से ब्लाग पढ़ने और कुछ लिखने की नियामत बख्शी है। संयुक्त परिवार की परंपरागत विशेषताओं वाला लेखन अब न कहीं पढ़ने को मिलता है और न कहीं देखने को। टीवी सीरियल में दिखने वाले संयुक्त परिवार में आपसी क्लेश ही इतने होते हैं कि नई पीढ़ी को लगता है कि अच्छा है दो-तीन कमरों के फ्लैट में अकेली जिन्दगी जीना। शायद बदलता परिवेश और बाजारी ताकतें अकेलेपन को बढ़ाना चाहती हैं। जब परिवार टूटेंगे, तभी नए फ्लैट बनेंगे-नए बाथरूम उपयोग में लाए जाएंगे-सबके लिए नये तौलिए का इस्तेमाल होगा । नई व्यवस्था में बड़े भाई की शर्ट छोटा भाई नहीं पहन सकता है। पिता के पैंट से बेटे का पैंट तैयार नहीं हो सकती है । मां की साड़ी से बेटी का सलवार सूट नहीं बन सकता है। सबका जुदा अंदाज है, अलग पहचान है, खुद को सबसे अलग दिखाने की ललक है। ऐसे में परंपरागत लेखन को जिंदा रखिएगा, भले ही वह ब्लाग के जरिए लिखा जाए। क्योंकि बाकी सब पर तो उपयोगिता हावी है। धन्यवाद।

के द्वारा:

के द्वारा: Sanjiv Mishra, Jagran Sanjiv Mishra, Jagran

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

अब तो सबकुछ बिखर रहा है। आपके इस आलेख ने मुझे भी अपने बचपन में पहुंचा दिया। मौसम परिवर्तन वातावरण में ही नहीं घरों में भी पता चलता था। एक तो परिवार बिखरे हुए हैं दूसरे मौसम बदलने का भान भी सिर्फ कैलेण्‍डर से ही होता है। इस बार तो बसंत पंचमी का दिन कोहरे और कंपकपाती ठण्‍ड में गुजरा। स्‍कूलों में भी बच्‍चे नहीं पहुंचे बस अध्‍यापकों और अन्‍य कर्मचारियों ने मां सरस्‍वती के चित्र पर फूल चढ़ाकर रस्‍म अदायगी कर ली। घरो में तो खैर किसी को याद ही नहीं रहा कि बसंत पंचमी है। रीति रिवाज परम्‍परा से तो हम गये ही, मौसम भी दगा दे रहा है। अच्‍छा और छूने वाला आलेख है। मन प्रसन्‍न हो गया। लिखते रहिये हम लोग तो मुरीद हैं ही।

के द्वारा:

अनुभव पकाता है, अनुभव की धूप पकाती है. अनुभव की पीड़ा पकाती है. अनुभव की थाती पकाती है. वाह ...मैं दो बार पढ़ा, याद आया आपका इस ब्लॉग पर पहला लेख आओ अब लिखा जाए. दिन भर की इतनी व्यस्तता के बावजूद जब मैंने आपका दूसरा लेख लो फिर वसंत आई... या आया (1) पढ़ा तब मुझे लगा आपने अपने पहले लेख का फालोअप किया है. वसंत को जिस तरह आपने जीवंत किया और लोगों को एक परम्परा से परिचित कराया उससे तो अविभूत हो गया. लेकिन इस शब्द चित्र को पढ़ते हुए मुझे सबसे पहले आपकी याददाश्त पर गर्व हुआ.. आपने सिर्फ अपना बचपना याद नहीं किया, एक साथ कई पीढ़ियों की परम्परा को याद किया . लगता है अनुभव ने आपको कितना विराट कर दिया है. आपकी कलम अनुभव की जिस राह से गुज़री है, वे सभी रास्ते आपके स्वागत में चार चाँद लगा रहे हैं. हमें आगे भी आपके लेखों का इन्तजार रहेगा. यह कहना नहीं भूल रहा कि आपके आह्वान पर लोग खूब लिख रहे हैं.

के द्वारा: Anand Rai, Jagran Anand Rai, Jagran

के द्वारा: Anand Rai, Jagran Anand Rai, Jagran

जनेश्वर जी पर इतनी सटीक टिपण्णी के लिए साधुवाद. ये उस जेनेरशन का भी द्वन्द दर्शाता है जिसके सामने समाजवाद और मार्क्सवाद अपने खो चुके निहितार्थ के साथ सामने था त्तथा व्यवाहरिक सत्य कुछ और था. येसे में प्रकाश स्तम्भ के रूप में बचे नामो में एक नाम जनेश्वर जी का भी था. लेकिन लोहिया स्कूल का मुलायमी संस्करण गले से न उतरा. जैसे मार्क्सवाद का कराती और येचुरी संस्करण भी गले में अटकता है. कलम की ये धार विश्लेषण के साथ-साथ नयी जेनेरशन का मार्गदर्शन भी करे तो शायद हम पत्रकारों का ये प्रोफेसन अपनाना कुछ सार्थक सिध्य हो. भाई, एक बार फिर साधुवाद. कलम की जंग को झाड-पोछ कर फिर धार देने के लिए.

के द्वारा:

के द्वारा: Rahul Miglani Rahul Miglani

जनेश्‍वर मिश्र का आज ब्रह़मभोज है। बलिया जिले के उनके पुश्‍तैनी गांव शुभनथही में उन्‍हें भावभीनी भावांजलि अर्पित की जा रही है। जनेश्‍वर जी वाकई जीवन पर्यंत समाजवाद निभाते रहे और आखिरी समय में भी समाजवादियों ने उन्‍हें अपने कंधे पर बिठाये रखा। एक बार जनेश्‍वर जी का इंटरव्यू कर रहा था- सच और झूठ पर बात चलने लगी। उन्‍होंने बिल्‍कुल डांटने वाले अंदाज में कहा- किस सच की बात कर रहे हो, जिस देश में रहते हो वहां तो सच की स्‍थापना ही आधे झूठ पर हुई है। उन्‍होंने कहा कि युधिष्ठिर को इस देश का सबसे बडा सत्‍यवादी माना गया है और जिस गीता पर हाथ रखकर लोग सच की कसम खाते हैं, उसमें उनका उल्‍लेख है। युधिष्ठिर जैसे महान सत्‍यवादी ने भी परीक्षा की घडी में अश्‍वथामा मरो नरो वा कुंजरों कहा था, यानि पूरा सच नहीं बोला। लोहिया के वे सच्‍चे अनुयायी थे और लोहिया का भारत का सबसे महान राजनेता बताते थे। वे कहते थे कि गांधी जी ने भी साबरमती आश्रम बनाकर अपने लिए एक ठिकाना बनाया था लेकिन लोहिया के पास अपना कोई पता नहीं था। जनेश्‍वर जी को लेकर इधर कई कार्यक्रम हुये और वे बार बार याद आये।

के द्वारा: Anand Rai, Jagran Anand Rai, Jagran

बसंत के बहाने याद अाया बचपन। गांवों में अाज भी पुरानी परम्पराएं िकसी न िकसी रूप में िजन्दा हैं। अादरणीय िवष्णु जी के अालेख को पढ़कर देवरिया जनपद के भाटपाररानी तहसील िस्थत अपने गांव बरईपार पाण्डे की एक परम्परा याद अा गई जो अाज भी चल रही है। बात 1991 की है,उन िदनों की है जब अाज अखबार गोरखपुर में था। बाबरी िवध्वंश की घटना के बाद गांव गया हुअा था। मुहरम की सुबह थी। गांव में परम्परा है िक तािजए उठने के बाद हिंदुअों के दरवाजे पर सबसे पहले पहुंचते हैं अौर घर की बुजुर्ग महिला तािजए पर अक्षत चढ.ाने के बाद उसकी परिक्रमा करती हैं। उस िदन भी अल्लसुबह जब तािजया पहुंचा तो मैनें अपनी बड़ी चाची िजन्हें मौसी कहता था,पूछा िक ई कबसे तािजया के अक्षत चढेला अौर परिक्रमा होला,यह सुनकर वह बोलीं िक बाबू ई पुरखन से होत चलिअावता,कौनो नया बात नइखे। चूंिक मेरे मन में बाबरी िवध्वंश की घटना ताजा थी अौर इसके मद्देनजर ही मौसी से सवाल िकया था लेिकन िजस सहजता से उन्होंने जवाब िदया उससे लगा िक नफरत फैलाने वालों से कहीं ज्यादा मजबूत हमारा सामािजक ताना-बाना है तभी तो गांव की रामलीला में मुसलमान भी अानंिदत होते हैं अौर मुसलमानों के त्योहार में िहन्दू शरीक होते हैं। बसंत के बाद फाग में सभी चेहरे रंग से सराबोर िदखाई देते हैं।

के द्वारा:

के द्वारा:

विष्णु जी, छोटे लोहिया की आपने अच्छी तस्वीर खींची है। ग्यारह साल पहले 1999 में भोपाल में पहली बार उनसे अनायास मिलना हुआ था। समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन था और मैं उस वक्त दैनिक भास्कर, भोपाल में कार्यरत था। जनेश्वर मिश्र और सपा के एक और राष्ट्रीय महासचिव कपिलदेव सिंह एक ही होटल में ठहरे थे। कपिलदेव सिंह से हमारा परिचय और लगाव पटना से ही था। उन्होंने ही मेरा परिचय जनेश्वर जी से कराया, लेकिन दो-तीन दिनों में ही मैं खुद को जनेश्वर जी के ज्यादा करीब महसूस करने लगा। उनका व्यक्तित्व, ज्ञान, चेहरे की सख्ती, बातें कहने की स्टाइल सब मौलिक और सबका मैं फैन। ...और एक दिन तो कपिलदेव सिंह ने उनसे पूछ भी लिया, 'जनेश्वर जी आपने क्या जादू कर दिया। अरविंद हैं मेरे रिश्तेदार, लेकिन अब मिलने आपसे आते हैं।' आखिरी दिन यह भी हुआ कि मैं अपने पेशे से अलग छोटे लोहिया को भोपाल स्टेशन तक छोड़ने भी आया। आपके आलेख से मेरी पुरानी यादें फिर ताजा हो गई हैं। धन्यवाद।

के द्वारा:

राघवेन्द्र दुबे किसी भी बहाने और चाहे जैसे भी मुझे याद करने के लिए विष्णु जी, आपको धन्यवाद। सच कहूं तो अभी कुछ लिखने का मन बना नहीं था- वजह तमाम हैं। कंप्यूटरी पैमाने पर उत्पादन करते रहने की मजबूरी (काश कंप्यूटर यह भी बता पाता कि एक कापी राइटिंग में संदर्भो और शब्दों के लिए खुद को कितना कोंचना होता है), एकरस और बहुत ऊब की मशीनी दिनचर्या के बाद का समय, कुछ वाहियात किस्से- जो दाद की तरह होते हैं उन्हें खुजलाने में ही बीत जाता है। आज ही आप को जागरण के ब्लाग पर पढ़ा और खुशी हुई कि छोटे लोहिया(बाद के दिनों में तो वह इस नाम के साथ उर्फ जनेश्वर हो चुके थे, अपनी अलग शिनाख्त से नहीं पूरी तरह लोहिया के लोग होकर) के कभी के लोगों को आप भूल नहीं गये। उनका यह व्यक्तित्व, उनका अपना ही अनुसंधान या खुद की डिस्कवरी था, जो लोगों को अपना नहीं, लोहिया का कायल बना देने वाला था। शुक्रवार की दोपहर तकरीबन 12 बजे यहां खासी बदली थी और बहुत अवसाद का बहुत नम, तकरीबन अंधेरा। उसी समय अपने समूह के संपादकीय तादाद ताकत (मानव संसाधन) के प्रधान उपेन्द्र पांडेय हम सब के साथ बैठक कर रहे थे। मेरा मोबाइल चुप(साइलेंट मोड में) था लेकिन सामने की गोल मेज पर छटपटा उठा। लखनऊ से मनोज श्रीवास्तव थे और बाहर निकल कर मैंने तो एक तारा गिरते पहले सुना और देख भी लिया। जनेश्वर जी नहीं रहे। जाने कितनी चीजें एक साथ चमक/ कौंध गयी थीं दिमाग में और उड़ भी गयीं फिर लौट आने के लिए। मैंने अपने साथी और अखबार के एक कंटेंट इंजीनियर शशिभूषण को तुरत फोन किया और लगा कि बातचीत करते-करते उसकी आवाज भरभरा गयी थी। शशिभूषण दिल्ली से लौटते हुए कोहरे में ट्रेन की सुस्त चाल से 15 घंटे बाद अभी कानपुर ही पहुंच सका था। सत्तर के दशक की वह अधपकी राजनीतिक समझ और भावुक सक्रियता याद आती है जब समाजवादी युवजन सभा मेरे लिए भी आवेश का मंच था। 1977 में मैं दिल्ली (33 नार्थ एवेन्यू) में बहुत हर दिल अजीज समाजवादी, उग्रसेन उर्फ मास्टर साहब - मरने के बाद सचमुच जिनके पास से 'चंद तस्वीरें बुतां चंद हसीनों के खतूत' ही तो निकले थे और पुरुष संतति उनकी हमीं लोग (धर्मराज और रामायण शुक्ल याद आ रहे हैं) थे, के साथ उनकी चिठ्ठियां लिखा करता था। किशन पटनायक, मधु लिमये, मधु दंडवते, जार्ज फर्नाण्डीज, जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी और मोहन सिंह से मेरी मुलाकात मास्टर साहब ने ही करायी और उन लोगों को यह बता दिया था कि बच्चे में बहुत आग है। यह तगमा बहुत दिनों तक अपनी छाती पर टांगे घूमता भी रहा लेकिन पिताजी की बात मान कर वकालत करने लगा था और उसके पांच साल बाद पत्रकारिता में आ गया। तब उम्र 36 की थी। कोलकाता और बाद में बिहार रहने के दौरान- कह सकते हैं कुछ लोगों का ही असर रहा होगा, मैं धीरे- धीरे वाम रुझान का होता गया और निजी तौर पर यानि प्राइवेट लेफ्टिस्ट होता चला गया हूं। इसीलिए मैंने 1977 की अपनी राजनीतिक समझ को अधकचरी कहा है। कल शायद यह भी कुछ मायनों में कठमुल्ला ख्याल लगे, नहीं कह सकता लेकिन आदमी और आदमी के बीच मोहब्बत और उसकी गरिमा को किसी संहिता में ढाल कर पलटन बना देने वाले लोगों से तो लड़ाई हमेशा बनी रहेगी- यह तय है। बहरहाल जनेश्वर जी बहुत याद आ रहे हैं। उनकी डांट, उनकी नाराजगी और उनका प्यार भी। अभी बस पिछले साल दिल्ली में उनके आवास पर जाकर उनसे मिला था। सामने की कुर्सी पर एक दुग्ध धवल सा हिम शिखर- जो मेरी सारी शिकायतें चुप आंख मूदें सुनता रहा। मन में चिढ़ भी पैदा होती थी कि मैं सुना नहीं जा रहा हूं। और एक शातिर मौन मेरी बातें मेरी ही ओर उछाल दे रहा है। अच्छा अब चलता हूं- जैसे ही मैंने कहा युगों का वैषम्य समेटे पलकें बहुत कुछ समझने की खिड़की सी चट खुलीं और उन्होंने कहा- खाना खाया है कि नहीं, नेरूला से मंगा दे रहा हूं। क्या खाओगे? मैं कहता- लकठा। और यह सुनकर वह हंस पड़ते थे। लकठा शायद आप न जानते हो। यह बेसन की तकरीबन उंगली भर मोटी गुड़ में पकायी देसी मिठाई होती है। और मुझे याद आता है चन्द्रशेखर जी की सरकार के रेलमंत्री जनेश्वर जी एक बार काफिले के साथ कहीं जा रहे थे- उनके साथ मैं भी था, रास्ते में लकठा बेचने वाला ठेला दिखा और उन्होंने गाड़ी रुकवा दी। शायद किलो भर लिया होगा। याद आता है। मैं उनके सामने बैठा हूं। अवांतर प्रसंग समाजवादी आंदोलन को कथा कोलाज बनाते गये हैं उनकी खुली आंखों में और तब एहसास हुआ कि बंद आंखें तो किस्सा सुना रहीं थीं। छोटे लोहिया, एक अच्छे किस्सागो भी थे और तमाम कहानियों में कभी सामने तो कभी पीछे। हालांकि समाजवादी पार्टी में अंतिम दिन उनके लिए बहुत ठीक नहीं थे। राजनीति में आने के विशिष्ट लाउंज में बैठे अभिनेताओं और पूंजी के हक में मेमोरैण्डम आफ अंडरस्टैंडिंग की राजनीति करने वाले एकाध एजेंटों ने उन्हें किनारे करने की खूब कोशिश की। लेकिन मुलायम सिंह के लिए वह पार्टी में आइडियोलाजिकल फेस थे। वह अपने लोगों को डांटते थे और लेन- देन के दावों से दूर थे। तमाम नेताओं की तरह पत्रकारों को आबलाइज्ड भी नहीं करते थे न लोगों को उनसे यह उम्मीद थी। फिर भी लोग उनसे भावात्मक स्तर पर जुड़ जाते थे। उनका यही व्यक्तित्व एक सचेत राजनीतिक समाज (पोलिटिकल सोसाइटी) की संरचना का उत्प्रेरक था। कार्यकर्ता बनते थे और लाइक माइडेंड लोगों की जमात तैयार होती रहती थी। कोई व्यक्ति कैसे खुद ही एक राजनीतिक अभियान हो जाता है क्या मुलायम सिंह यादव या लालू प्रसाद उनसे सीख सकेंगे। विष्णु जी, जनेश्वर जी की याद से ही सही अब लिखना शुरू कर रहा हूं। जनेश्वर जी पर ही अभी और लिखना है। पढि़येगा इसलिए कि ऐसे किसी आदमी का गुजर जाना कंप्यूटर ऑफ हो जाना नहीं है। और दूसरी बात यह कि आदमी को समझ सकेंगे तभी विचार भी बनेंगे और आख्यान भी- आदमी और उसके बहाने समय का रेखांकन ही अपने समय का सर्वाधिक सशक्त कंटेट भी है और नरेशन भी है।.......

के द्वारा:

जनेश्वर जी से मुलाकात तीन बार हुई। दो बार समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों में और एक बार फीरोजाबाद में हुई ट्रेन दुर्घटना के मौके पर। दुर्भाग्य से जिस समाजवादी से मिलने को मैं उत्सुक था, वह सपा के विरोधाभासी माहौल में खुद उलझा मिला। कुछ वैसे ही, जैसे कि कपिलदेव सिंह, कल्याण जैन और किरणमय नंदा मिले थे।...खैर। महान व्यक्तियों की सूची में कोई यूं ही दर्ज नहीं हो जाता, मृत्यु के बाद कोई यूं ही याद नहीं किया जाता। निश्चित ही जनेश्वर जी महान थे, अपने समकालीनों में काफी ऊंचे। मौलिक लेखन व्यक्ति के दिमागी स्तर को प्रदशिर्त करता है। वह अंदर आकार ले रही बहुत सी चीजों की भी चुगली कर देता है। पत्रकारिता जगत के कई बड़े नामों की मौलिकता जब विद्रुप हो चुकी हो, तब लेखनी उठाने के लिए बधाई। बधाई निरंतर उम्दा हो रहे लेखन, लय पाने और विचार प्रवाह के लिए। धन्यवाद।

के द्वारा:

जनेसर बाबा गए, बलिया ''राष्‍ट्र'' से समाजवाद का आखिरी अध्‍याय खत्‍म हो गया। हमारे गांव सुरेमनपुर (बलिया) के पूजन भइया ( तिवारी) के यहां जनेसर बाबा ददिहाल था, इसलिए हम लोग उनको कुछ ज्‍यादा करीबी महसूस करते रहे, चंद्रशेखरजी से ज्‍यादा करीबी।एक बार हमारे गांधी चबूतरा पर छोटे लोहिया आए भी थे, तब हम लोग बहुत छोटे थे। सिर्फ यही जानते थे कोई बड़का नेता आए हैं। तब की शक्‍ल अब भी याद है। बलिया की शान बगावत है तो समझो की हम बागी है कि तर्ज पर जिंदगी भर वह लड़ते रहे। उनका आखिरी संघर्ष समाजवादियों को राह दिखाएगा, यही हमारी कामना है। ईश्‍वर जनेश्‍वर जी की आत्‍मा को वृंदावनवास दें। जय बलिया, जय भृगु क्षेत्र, जय जनेश्‍वर-चंद्रशेखर।

के द्वारा:

sir maja aa gaya. tisri baar padh raha hoon. kitna vyvsthit dhang se gadhe hain ise, waah! waah! waah! yah to mere man par apni chhap chhod gaya. बिप्पू की अम्मा, अद्दू की अम्मा, धुन्ने की अम्मा…(ये अम्मा लोग अधिकतर बेटों के नाम से ही क्यों पुकारी जाती हैं।) धोबिन चाची पालथी मारे, डलिया पसारे आंगन के बीचो-बीच देवी मां की भांति स्थापित हैं। उनका तेल पुता सिर पूरी तरह सिंदूर से लबरेज है, घरों-घरों से सुहागिनों से सुहाग लेते-लेते, देते-देते। वो अति श्यामा थीं कसौटी के पत्थर सरीखी, बाल उनके झक्क सफेद और ऊपर से सिंदूर का जबर्दस्त अतिक्रमित पुट और पीला अंगरखा (ब्लाउज का बुश-शर्ट नुमा बड़ा भाई, जिसमें आजू-बाजू जेब भी होती है)-पीली धोती। अब आप ही उस दैवी छवि की कल्पना करके देखिये

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

छोटे भाई को नजर न लगे। आपके दो ब्‍लॉग ने मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के भीतर कानपुर को जिंदा कर दिया है, जिनकी जड़ें कानपुर में हैं, लेकिन जो काम-धाम की वजह से अपनी जड़ों से बहुत दूर बस चुके हैं। 1983 में कानपुर छूट गया था, 27 साल बाद मेरा शहर मेरे भीतर कुलबुलाने लगा है। जितना मैंने पढ़ा है, अब तक किसी ने इतने पॉवरफुल तरीके से अपने लेखन में कानपुर की खूशबू नहीं संजोई है। कितने नए शब्‍द हैं, जो बचचन में सुने थे, भूल गए, आपने जगा दिए हैं। जैसे पंपा, जांघिया, अजिया, अइपन, पुह, बंसेलिया, कुज्‍झा, लंकलाट, फुलौरियां और रसाजैं। हमारी अम्‍माजी अभी भी ये सारे शब्‍द बोलती हैं, लेकिन बरसों पहले कानपुर से छूट चुके हम भाई-बहन कानपुर की खुशबू समेटने वाले इन शब्‍दों से बहुत दूर आ चुके हैं। मेरी दुआ है, आप लिखते रहिए, इसी तरह कानपुर और कानपुरवालों की खूशबू बांटते रहिए, जिसकी हम जैसों को बहुत जरूरत है। झाड़े रहो कलेक्‍टरगंज।

के द्वारा:

एक देश तभी मजबूत बनता है जब उस देश के नागरिक मजबूत होते है उनके अधिकार समान हो और उनका सही से पालन हो. पर लगता है हमारे देश में ऐसा कुछ भी नही होता है. हमारे देश में नागरिको को अधिकार तो समान है पर हमारे लोंगों में कुछ भी समानता नही है. एक बहुत मजबूत है और एक भिखारी एक दलित है तो दूसरा उच्च कोटि का. इस देश में दलितों के साथ इतना अत्याचार होता है. जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती. हम कहते है कि हम हिंदू प्रधान देश है. अगर इस देश के सारे दलित और पिछड़े अपना धर्म परिवर्तन करके कोई और धर्म स्वीकार कर ले तो यही हिंदू राष्ट्र अल्पमत में आ जाएगा. शायद ऐसा दिन जल्द आएगा अगर दलितों पर अत्याचार नही रुको

के द्वारा:

बात 1978 से 1985 तक ही है। इलाहाबाद विवि का स्‍टूडेंट था। बसंतपंचमी पर संगम नहाने की पूरी तैयारी रहती थी।यार.दोस्‍तों के साथ। कोई न कोई अजूबी सी शर्त लगती थी। पूरा करने की जिम्‍मेवारी मेरे फ्रेंड पंकज की होती थी। एक बार शर्त लगी कि मेले में किसी से कुछ मांग कर खाना है। करने वाले के लिये बंद मक्‍कखन का इनाम भी घोषित था। हम सब रेता कांडते संगम पहुंचे। नहाने धुलने के बाद अब बारी शर्त पूरी करने की थी। एक बुजुर्ग केला खा रहे थे। पंकज ने कहा कि दादा हम लोगों को भी मिलेगा क्‍या। उम्‍मीद थी कि झिडकी ही मिलेगी।पर मांगते ही पूरे प्रेम से उन्‍होंने कई केले हम लोगों को पकडा दिये। वह पंचमी अपनी शरारत और उनकी दरियादिली हम लोगों को अब तक याद है।

के द्वारा:

के द्वारा: rohan rohan

आदरणीय विष्‍णु जी 35 साल पहले अपने अतीत में भले चले गये लेकिन बसंत पंचमी को वर्तमान से जोड दिया। अब पहले जैसी बात तो कहीं नहीं रही पर उत्‍साह अभी भी है। पढते हुये राही मासूम रजा याद आ गये। आधा गांव में उन्‍होंने मुहर्रम के समय का जिस तरह वर्णन किया है उससे मुहर्रम न जानने वाले भी उससे पूरी तरह अवगत हो जाते हैं। इस लेख को पढकर भी जिन्‍हें इस पर्व के बारे में पता नहीं होगा उनकी समझ बढ जायेगी। लिख्नने की शैली बहुत दिलचस्‍प लगी। विष्‍णु जी के शब्‍द चित्र की तरह उभरते गये हैं। सीन में हमारे बडे बुजुर्ग भी हाजिर हैं इसलिए कहानी कई पीढियों को साथ लेकर चल रही है। इस पर्व से जुडे कई अन्‍य कार्यक्रमों का भी अस्तित्‍व उभर आया है। बहुत बहुत शुभकामना। धनुष यज्ञ और परशुरामी के लिए अग्रिम बधाई।

के द्वारा:

के द्वारा:

बहुत सुन्दर! जितनी अच्छी तस्वीर है उतनी सुन्दर लेखनी. उस दिन लखनऊ के जनपथ मे आपको टहलता देख जैसे चौका था वैसे ये लेख पढ़ कर ठिठक गया! हमने तो सुना था हमारे विष्णु जी डेल्ही में न्यूज़ मेनेजेर हो गए. लखनऊ के साथ लिखना पढना भी छोड़ गए.लेकिन भला हो ब्लॉग संस्कृति का. घर वापसी हो गई. पता नहीं आपको याद है की नहीं. मुझे पहली बीट लखनऊ यूनिवर्सिटी की मिली थी जागरण में . रिपोर्टिंग का पहला पहल अनुभव था. इंट्रो के आगे खबर नहीं बढ़ पाती थी. खबर मिस होती थी सो अलग. मै जार जार रोया था. कहा था मुझसे ये सब नहीं होगा. मै डेस्क पर ही ठीक हूँ. तब आपने समझाया था. हेमंत तिवारी आपके साथ थे. दिलासा भरे वो आपके शब्द मै आज भी नहीं भूल पाया हू.मै अब भी नए लडको को वो किस्सा सुनाता हू. उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करता हूँ. दरअसल अब लगता है लिखना हमारी आन्तरिक जरुरत है.सच कहे तो हम पत्रकार लिखने के लिए अभिशप्त है. लिखना एक आदत है जूनून है.क्या करेगे आप. लिखेंगे खूब लिखेंगे का उद्घोष आप जैसे बहुत से लोगों को प्रेरणा देगा जिन्होंने लिखना छोड़ दिया है. शब्दों की अमरता में भरोसा करने वाले हम लोग की और क्या पूंजी है. कल हम नहीं होंगे पर हमारे लिखे हुए शब्द किसी पुस्तकालय की आलमारी में किसी किताब के पन्नो में सहेज के रखे होंगे. या नेटवर्क के इस अद्भुत ब्रह्माण्ड में ये शब्द सितारों की तरह परिक्रमा कर रहे होंगे. इन्ही के बीच कही आपके मोहल्ले के सिद्धि गुरु भी होगें अजर हमेशा के लिए अमर.किसी और को लिखना फिर से शुरू करने की प्रेरण देते हुए. आपका सागर 09415002299

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

अब तो लिखेंगे, खूब लिखेंगे। आदरणीय विष्‍णु त्रिपाठी जी का यह आलेख पढा। खुद को लिखने के लिए एक गुरु का सहारा लिये। पर उनका मकसद सबको प्रेरित करने जैसा है। जिनके हाथ से कलम छूट गयी है यह लेख उन सबको उर्जित करने के लिए पर्याप्‍त है। इस आलेख में भावना है, मर्म है और पीछे छूट रहे लोगों को पकडकर आगे ले चलने की तडप भी है। विष्‍णु जी को हम पढते रहे हैं। उनकी रपट रिझाती रही है। वे लिखेंगे तो निश्चित रूप से पढने वाले मुदित-प्रमुदित होंगे। उनके लिए हमारी यही शुभकामना कि लिखें। लिखेंगे तो चाहे कनपुरिया लिखें या खालिस कनौजिया, जो भी लिखेंगे उसमें सकारात्‍मकता होगी। समाज को और अपने साथियों को आइना दिखाने जैसी बात होगी। मैं दिल की गहराइयों से उन्‍हें बधाई दे रहा हूं।

के द्वारा:

के द्वारा:




latest from jagran