blogid : 149 postid : 3

आओ अब लिखा जाए

Posted On: 13 Jan, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

बचपन के एक प्रसंग से बात शुरू करते हैं। मोहल्ले में एक सिद्धी गुरू हुआ करते थे। हमने तो उन्हें बुजुर्ग के तौर पर ही देखा था लेकिन जवानी में वो शौकिया तौर पर पहलवानी भी करते थे, सो उनका निकनेम हो गया सिद्धी गुरू। जबका ये प्रसंग है, तब उनकी उम्र 60 के ऊपर तो हो ही गई होगी। हमें तो बहुत एक्टिव दिखते थे। एक रात जब हम पिता जी के साथ कमल किशोर वैद्य जी के दवाखाने में बैठे थे तो सिद्धी गुरू का पदार्पण हुआ। कुछ बेचैने से थे, वैद्य जी से बोले पता नहीं क्या बात है, कुछ दिनों से पोर-पोर दुखता है। जोड़ों में पीर उठती है। पहले सोचा पुरवाई का असर है लेकिन अब तो पछुवा का जोर चल रहा है लेकिन पीर है कि घटने के बजाय और जोर मार रही है। वैद्य जी बड़ी-बड़ी सघन मूंछों के बीच मुस्कुराए, बोले दादा, पीर इसलिए जोर मार रही है कि आपने जोर करना बंद कर दिया है। सिद्धी गुरू की मुखमुद्रा कुछ ऐसी बनी कि बात समझे नहीं। वैद्य जी ने बात और स्पष्ट की, आपने जोर करना जो छोड़ दिया है, हमें लगता है कि दंड बैठक अब आप करते नहीं, मुगदर भांजना तो दूर की बात रही। गुरू की मुख मुद्रा अब कुछ-कुछ समझने वाली थी। वैद्य जी जारी रहे, जवानी में आपने इतनी कसरत की, अखाड़े में जोर किया, दंड बैठक मारा, मुगदर भांजा तो शरीर जिस मेहनत की खुराक का अभ्यस्त था, वही आपने त्याग दिया, नतीजा शरीर अंदर से आवाज दे रहा है। वैद्य जी, जारी रहे, बोले हम आपके लिए बढ़िया च्यवन प्राश का प्रबंध कर देते हैं लेकिन आप उसके पहले अपना अभ्यास शुरू कर दीजिए। गुरू बोले…और दर्द की दवाई? वैद्य जी का जवाब था दवाई आपके ही पास है, मैंने बता तो दी है।

लिखने पढ़ने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो जाता है। एक बार अभ्यास कमजोर हुआ, बंद हुआ तो मन-चित्त अंदर से आवाज देना शुरू कर देता है। हम जैसे लोग जो अब मूलतः न्यूज मैन कम बल्कि न्यूज सुपरवाइजर या मैनेजर ज्यादा हो गए हैं, कंटेंट कंस्ट्रक्शन कंपनी के हेड मेट (मिस्त्री वाला मेट)। तभी लगता है कि कुछ-कुछ सिद्धी गुरू जैसी दिक्कत हो गई है। कभी कभी लगता है कि हम जैसे लोग खबरों की दुनिया में वाचिक परंपरा के अनुगामी होकर रह गए हैं (सौजन्य से नामवर सिंह)। कभी कभी ये भी लगता है कि लिख तो बहुत रहे हैं, लेकिन वह शब्द रचना नहीं है, बल्कि खबरों की चीर-फाड़, पूछताछ, खबरों का सौजन्यीकरण, समन्वय और तमाम खबरीय प्रशासनिक प्रकरणों को लेकर लंबे-चौड़े चिट्ठों का लेखन, मेल बाजी। हालांकि खबरों का लेखन भी अस्थायी भाव का लेखन है, जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य। बकौल सीनियर विष्णु त्रिपाठी (कानपुर वाले, वैसे हम भी कनपुरिया ही हैं) तीसरे दर्जे का साहित्य। फिर भी आत्मसंतोष होता था। खबर में ही कोई एंगिल देकर, कलर-फ्लेवर देकर, पर्सपेक्टिव देकर स्वांतः सुखाय हो जाता था। सत्ता के गलियारे सरीखे गासिप कालम लिख कर खबरी मन को थोड़ा बहुत तुष्ट कर लेते थे, लेकिन अब तो वो भी नहीं रहा।

जब जागरण जंक्शन की योजना सतह पर आई तो ये तय हुआ कि सबसे पहले माहौल बनाने के लिए जागरण के लोग लिखना शुरू करें। स्वाभाविक रूप से हमें जिम्मेदारी मिली कि जागरण के सम्मानित सहयोगियों से इस आशय का औपचारिक आग्रह करें। आग्रह किया भी गया और उसके परिणाम भी निकले, कई लोगों ने लिख कर भेजा भी, लेकिन आग्रह की अपेक्षानुरूप संख्या कम थी। सुकीर्ति जी ने एकाध बार आग्रह दोहराया भी, लोगों को एक बार फिर याद दिला दीजिये ना। याद तो नहीं दिलाया लेकिन सामने पड़ गए संतोष तिवारी जी से पूछ बैठा-आपने फोटो भेजी, कुछ लिखा? उन्होंने उसी रिदम में पूछ लिया-आपने फोटो भेजी, कुछ लिखा? मैं निरुत्तर, खुद पर बहुत लज्जा आई। वो कहानी याद आ गई। शायद कभी कल्याण में पढ़ी थी। मां अपने बेटे को लेकर एक साधु के पास गई, निवेदन किया-बाबा, ये मिठाई बहुत खाता है, आप कह देंगे, इसे समझायेंगे तो निश्चित तौर पर बुरी आदत तज देगा। बाबा ने कहा-माई, हफ्ते भर बाद आना। हफ्ते भर बाद मां फिर से बेटे को लेकर साधु बाबा के पास पहुंची। बाबा ने बच्चे को पास बिठाया, स्नेह के आंचल में भिगोया और कहा बेटा ज्यादा मिठाई खाना अच्छा नहीं, अति सबकी बुरी होती है। कम खाओगे तो मिठाई और ज्यादा अच्छी लगेगी, जाओ। मां ने शिकायती लहजे में कहा कि अगर यही तीन बोल बोलने थे तो उसी दिन बोल देते। हफ्ते भर का इंतजार क्यों कराया? बाबा बोले-माई, पिछले सात दिन मैं खुद कम मीठा खाने का अभ्यास कर रहा था। माई संतुष्ट हो गई।

रोज सोचते थे कि कहां से शुरू किया जाए? फिर सोचा कि चलो पहले अपनी फोटो ही भेज देते हैं, जागरण जंक्शन के संयोजकों-संचालकों को लगेगा तो कि कुछ हो रहा है। घर पर फोटो की ढुंढ़ाई शुरू की, बच्चा पार्टी से कहा-ऐसी फोटो निकालो जो प्रसन्नवदन हो, चेहरा खिलखिलाता न सही, मुस्कुराता हुआ ही हो। विनी ने कहा- ऐसी फोटो तो मुश्किल है। क्यों? उसका जवाब था ऐसी फोटो तो तब खिंचेगी जब चेहरा भी तो वैसा हो। मेथी की पत्तियां तोड़ रहीं श्रीमती जी को बस विनी के इसी वाक्य के बूते मुझ पर वार करने का एक और मौका मिल गया। बहरहाल एक कामचलाऊ फोटो मिली और उसका प्रेषण भी हो गया लेकिन सवाल यही था शुरू कहां से किया जाए। उपेंद्र स्वामी जी ने घंटी भी बजा दी, बोले फोटो तो आ गई, अब कुछ भी लिख दीजिए सर (सर, शायद उनका तकिया कलाम सरीखा है)। ब्लाग तो लेखन की असीमित दुनिया है, कुछ भी लिखा जा सकता है। मैंने सोचा ये कहना तो बहुत आसान है लेकिन कहीं भी, कभी भी क्या कुछ भी लिखा जा सकता है? मुझे सिद्धी गुरू याद आ रहे थे। वैद्य जी ने तो कह दिया था लेकिन उन्हें नए सिरे से जोर मारने में कितनी दिक्कतें पेश आई होंगी। फिर भी मन जो आवाज दे रहा है, अंदर से जो पोर-पोर दुख रहा है, उससे पार तो पाना ही है। विष्णु भाई, आप पार पा लेंगे।

चारो तरफ लोहड़ी की उमंग है, भगवान भुवन भास्कर उत्तरायण हो रहे हैं। कोई कह रहा था कि खरमास खत्म हो रहा है। मन पक्का हुआ तो कहां से शुरू किया जाए? का जवाब भी मिल गया। चलो वही लिख देते हैं कि फिर से लिखने की प्रक्रिया किस दौर से गुजरी। अब लिखा जाएगा, ओरिजनल लिखा जाएगा। उन्होंने कहा, उन्होंने बताया से आगे। विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि से और आगे। कोशिश करेंगे कि वो लिखा जाएगा जो स्थायी भाव का हो। जीवन के तमाम प्रसंग हैं, मन में भरे पड़े हैं, जिंदगी में तमाम ऐसे चरित्रों से साबका हुआ, जिनके बारे में लिखने की चाहत है, ऐसे चरित्र जो आपसे भी दो-चार हुए होंगे। गांव, मोहल्ले की बातें। रस्मो रिवाज की बातें। बाबा की बातें, अजिया की बातें। कनपुरिया-कनौजिया (कन्नौजिया नहीं) खान-पान की बातें। मूड होगा तो खालिस कनौजिया में लिखेंगे। कोई प्रवचन नहीं, उपेदश नहीं, शोध और रिसर्च नहीं। जिन प्रसंगों और लोगों ने कभी गुदगुदाया, आल्हादित किया, प्रेरणा दी, सिखाया, उन्हें शेयर करेंगे। निश्चित तौर पर सौ फीसद स्वांतः सुखाय लिखेंगे, पढ़ने वाले मुदित-प्रमुदित होंगे तो खुद धन्य समझेंगे।

अब तो लिखेंगे, खूब लिखेंगे।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (26 votes, average: 3.23 out of 5)
Loading ... Loading ...

215 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

krishnakant के द्वारा
October 29, 2012

आदरणीय, सिद्धी गुरु से प्रेरणा लेकर लेखन के प्रति प्रतिबद्ध रहने का यह दिलचस्‍प शपथ ग्रहण मुझे भी प्रेरित कर गया। बहुत बधाई… आओ अब लिखा जाए…

Gopesh Vajpayee के द्वारा
June 17, 2012

Bahhut khoob,kanpuriya khushboo mahka gayee. Main nahi peeta jara si dal leta hoon. khud ko kisi bhi hal me main dhal leta hoon . Janma hoon KANPUR me GANGA-JAMAN ke beech . Jo mil gaya usi se pet paal leta hoon.

Krishna Gupta के द्वारा
September 2, 2011

काफी अच्छा लगा आपके विचार जन कर | उत्साहित भी हुआ की मै भी अच्छा लिखने की कोशिश करूँगा | आपके बाकि के के लेखों को अभी अनहि पढ़ पाया हूँ | मगर जल्दी ही पढूंगा | यदि समय मिले तो मेरे लेखों पर भी दृष्टि डालिए | http://krishnagupta.jagranjunction.com

Rachna Varma के द्वारा
May 26, 2011

आदरणीय विष्णु जी सादर प्रणाम , इस मंच पर आ कर मैंने भी बहुत कुछ सीखा लेकिन लिखना अभी मै सीख रही हूँ मै जल्दी नही लिख पाती जानकारी होने के बावजूद उसे व्यक्त करना शब्द देना बहुत कुछ सीखना है | इस लेख को पढ़ कर अच्छा लगा ढेर सारी बधाइयो के साथ ! धन्यवाद

Lorena के द्वारा
May 25, 2011

Ppl like you get all the barnis. I just get to say thanks for he answer.

bkkhandelwal के द्वारा
February 1, 2011

aapney jo likha bahut acha laga janmas ko ek chetan di aap ka bahut bahut dhanwad iss parak sab jagrat kertey tab hi desh ka kalyan hoga badey bhai,yah baat samay honey per bahut kuch likhi ja sakti iss samy to aapke vicharon se jagrati mili aur wohi mere saat hua hai, bahut kuch likhunga ,jagrat kareny wala guru ho chela na jaagey phir guru ka kya fada guru ko namsakr iss chely ka desh samsaya ko sab ke saamney bina kis laglapeyt ke honi chhaiye sahi baat hai,kash hum samjh ppatey jhanda kya hai hum sab isske liye ek saat cahley ,bahut hi baat hai hain jo chandd minto meie nahi kahi jasakti,desh ke jhandey ki baat aur woh bhi lalchowk oer hai,issko bahut kuch hai kahney layak,issko sahi manney meie share karna hi hai

shyamendra kushwaha के द्वारा
January 25, 2011

सर प्रणाम, आप कहीं से भी लिखें, आप की लेखनी पर तो सरस्‍वती का वास है। पढने में आनंद आ गया।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 20, 2011

विष्णु जी अभिवादन, कुछ लोग प्रतिक्रियाओं का जवाब नहीं देते है, इसका क्या कारण हो सकता है ? यदि आपकी बात की जाये तो ………….. ?

ashwini के द्वारा
October 3, 2010

भैया, लेख दिल को छू गया। सिद़धी गुरु के बहाने अच्‍छी प्रेरणा दी है। जो मूल है, उसे छोडना नहीं चाहिए, क्‍योंकि काम वही आएगा। अश्विनी

Ritambhara tiwari के द्वारा
September 17, 2010

आपके लेख से हम नवोदित लेखकों को भी प्रेरणा मिली ! धन्यवाद्!

prakash chandra के द्वारा
September 12, 2010

आदरणीय विष्णु जी . साधुवाद . आज की पत्रकारिता को परिभाषित करने के लिए दो फिल्मे बिलकुल सटीक है . पहली है पेज थ्री और दूसरी है पीपली लाइव . आज पत्रकारिता मात्र एक पेशा नहीं बल्कि एक धंदा बनकर रह गई है . बस फर्क केवल इतना है कि हर धंदे मे कुछ उसूल होतें हैं जबकि इस धंदे मे केवल एक ही उसूल होता है खरीदो और बेचो . जनता और देश को क्या फायदा या नुकसान होगा इससे कोई मतलब नहीं है . आज लोग इस पेशे को आदर से कम और भय से जादा देखते हैं . अगर मेरे शब्दों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो मुझे छमा कर दें . ये मेरे मन का दर्द था जो बह निकला . मेरा इरादा गलत न समझा जाए .

    Jetsin के द्वारा
    May 25, 2011

    Thanks alot – your anewsr solved all my problems after several days struggling

Rajesh Dwivedi के द्वारा
September 8, 2010

बहुत खूब विष्णु जी, आप को लाख लाख धन्यवाद आपने तो वाकई में लोगों को जगाने का काम बहुत ही अच्छा किया है. अपनी लेखनी की शैली से कुरेद कर रख दिया है. मै भी उसी सिद्दी गुरू जी के जैसे मारा हुआ हूं और आप जैसे लेखनी के वैद्य की जरूरत थी जो आप की लेखनी कैप्सूल का काम करेगी ऐसा मुझे लगता है मैने जागरण ब्लॉग क्रिएट कर के रखा है और आज तक उसमें कुछ डाल नहीं पाया. कि क्या लिखूं कि छोर से शुरुआत करूं लेकिन आपने ने तो कुरेदने का काम बहुत अच्छा किया है. आपको एक बार फिर कोटि कोटि धन्यवाद.

SHIV के द्वारा
September 8, 2010

पहले तो आपको पुनर्प्रेरित होने पर ढेरों बधाइयाँ एवं हम जैसे नौसिखुओं को लिखने की प्रेरणा देने के लिए असंख धन्यवाद् | अब तो सच- मुच बहुत कुछ लिखने को जी कर रहाहै |

    Tibbie के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow! Great thniking! JK

kmmishra के द्वारा
September 7, 2010

अब जा कर पता चला कि नींव जब इतनी मजबूत थी, सधे हाथों से रखी गयी थी तो जागरण जंक्शन की इमारत क्यूं न फिर इतनी बुलंद हो । वाकई में गजब की प्रवाहमयी शैली है । मुदित-प्रमुदित हुये . आभार ।

    Janelle के द्वारा
    May 25, 2011

    HHIS I should have thoguht of that!

आर.एन. शाही के द्वारा
September 6, 2010

बहुत आत्मीय किस्म का सम्पादकीय लेख था त्रिपाठी सर, बधाई ।

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 4, 2010

सादर प्रणाम, प्रेरणादायी आलेख और काम करने का नया जोश पैदा हुआ,हर रोज जागरण जंक्सन पर जाने का मन करने लगा,आदर के साथ mahenra kumar tripathi,jagran

Mehboob के द्वारा
February 4, 2010

एक भारतीय होने के नाते , मैं हर भारतीय से यह कहना चाहुंगा की वे भाषा के नाम पर राजनीती करने वाले खोखले नेताओं से यह पुछें की, जब मुंबई जल रही थी तब उन के कार्यकर्ता किस मांद में अपनी वीरता लिये दुबके बैठे थे ? ईन वारदातों के दौरान उनका मुंबई प्रेम किस के पल्लु में जा छिपता है ? फिर जब कोई सच्चा भारतीय उन शहीदों को याद करता है तो उसे नौटंकी बताया जाता है । देश-द्रोही की इस से बढ कर और क्या मिसाल होगी ? जागो भारत जागो … एक बन जाओ और इन खोखलों का बाईकट करो … वरना.. ये हमारा ज़मीर मार देंगे ….

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 3, 2010

आपने ऐसी प्रेरणा दी कि अब इस स्‍लेट पर लिखने की रफ़तार बढ गयी है। बहुत नयी नयी उम्‍दा जानकारी मिल रही है और दिन में दो बार यहां आये बिना चैन भी नहीं मिल रहा है।

Pradeep Upadhyay के द्वारा
January 27, 2010

Vishnuji It was a nice experience to see you more young, energetic and full of thoughts. I hope you will continue it and entertain us. Lots of memories are associated with you when You were in Lucknow. Praddep Upadhyay 9473584095

rita singh के द्वारा
January 27, 2010

आप का लेख पड़ कर मन को बल मिला है. आपने जिस तरह गुरूजी का उदहारण दिया है यह सत्य है कि कोई भी कार्य छोड़ दिया जाय तो उसमे जंग लग जाता है खास करके कलम चलने की आदत हो तो. मुझे भी थोडा बहुत लिखने का शौक है. परन्तु पिछले १२ सालों से पारिवारिक दायित्व निभाते -निभाते साहित्य से दूर हो गयी हूँ. पर इस नए साल से मैंने पुनः अपना मन बना लिया है आप के लेख पड़ कर दृड़ प्रितिग्य हूँ कि मै भी लिखूंगी खूब लिखूंगी मन को बल देने वाले लेख के लिए धन्यवाद.

roli के द्वारा
January 27, 2010

िसद्धी गुरू के बहाने िलखने और स्थायी िलखने की सीख बहुत खूब है सर

rita singh के द्वारा
January 27, 2010

apke lekh padkar mere manko bal mila hai. apne jistarah guruji ka udaharan diya hai yah satya hai ki koi bhi karya chod diya jaye to usme jank hag jata hai khas karke kalam chalane ke adat ho to.mujhe bhi thoda bahut likhne ka showk hai. Parantu pichale 12 sal se paribarik dayitwa nibhate-nibhate sahityase dur ho gai hu. par is nai sal se maine punh: apna man bana liya hai. apke lekh padkar drid pratigya hu,mai b likhungi,khub likhungi.manko bal dene wale lekh k liya dhanyabad.

    Butch के द्वारा
    May 25, 2011

    That’s way the bsesett answer so far!

naveen gautam के द्वारा
January 26, 2010

ati sunder and prerak

Tarun के द्वारा
January 26, 2010

What an amazing post. Pen is definitely mightier than the sword. Kaash meri bhi hindi itni clairvoyant hoti…pls update your posts regularly sir

    Idalia के द्वारा
    May 25, 2011

    Thanks for sharing. Aalwys good to find a real expert.

    Keyanna के द्वारा
    May 25, 2011

    Kewl you sholud come up with that. Excellent!

vasudha pande के द्वारा
January 25, 2010

great writing,gives u a feeling as if a friend is telling u astory and i cud really relate to it.but then u r a journalist so u hv the flair fr writing.it reminded me of how my father used to write in crisp hindi and english as well and sorry to say that i think in english and then write in hindi.in fact my son is in class 6 and i am learning new words from his textbook and enjoying harivanshraya bacchhan and subadhra kumari chauhan now. i am married in kanpur and when i hear my husband speak in the local slang with his friends ,the words i never knew existed.but i still feel that we r forgetting our roots and culture and our children too.look at me. इतनी कोशिश के बाद भी जब अपने बच्चे को हिंदी का निबंध लिखाना होता है तोह कई बार शब्द फंस जाते हैं. आपका लेख पढ़कर मज़ा आया और अपने बचपन की भी कई याद ताज़ा हो गयी. लिखते रहिये ,इस बहाने से आप अपने मन की बात को कह पाएंगे,हम जैसे मुस्कुराएंगे, सभी प्रसन्न at the end of the day all should be happy. good work

Krishna Dev Mishra YOGESH के द्वारा
January 22, 2010

sir ji, paagal karne ki had tak shabd mathte rahte the, lekin ab main unhe mathungaa… karan tees saal tak paagal nahi hua to sirf isliye ki shayad ishwar mere liye JUNCTION taiyaar kar raha tha… raah dikhane k liye shukriya sir ji, ab to is JUNCTION per yogesh express bhi shaan se rukegi… AAMEEN………

sv के द्वारा
January 21, 2010

एक देश तभी मजबूत बनता है जब उस देश के नागरिक मजबूत होते है उनके अधिकार समान हो और उनका सही से पालन हो. पर लगता है हमारे देश में ऐसा कुछ भी नही होता है. हमारे देश में नागरिको को अधिकार तो समान है पर हमारे लोंगों में कुछ भी समानता नही है. एक बहुत मजबूत है और एक भिखारी एक दलित है तो दूसरा उच्च कोटि का. इस देश में दलितों के साथ इतना अत्याचार होता है. जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती. हम कहते है कि हम हिंदू प्रधान देश है. अगर इस देश के सारे दलित और पिछड़े अपना धर्म परिवर्तन करके कोई और धर्म स्वीकार कर ले तो यही हिंदू राष्ट्र अल्पमत में आ जाएगा. शायद ऐसा दिन जल्द आएगा अगर दलितों पर अत्याचार नही रुको

    Celina के द्वारा
    May 25, 2011

    Stands back from the keyboard in amazement! Tahnks!

saroj awasthi के द्वारा
January 21, 2010

vishnu bhagwan, Naukari k uljhav suljhav bhagambhag may likhna padna hum bhool chukay thay par aap ki lekhni nay humari khatam ho chuki bhook ko phir jaga diya sadhuvad ek disha dikhana k liya.

    Rosa के द्वारा
    May 25, 2011

    I thank you humbly for shanrig your wisdom JJWY

prabhat shunglu के द्वारा
January 21, 2010

बहुत सही विष्णु जी। अभी तो ये अंगड़ाई है… मज़ा आ गया। बहुत बड़ी दुनिया अपने अंदर छुपाये बैठे हैं। अब हमें भी झांकने का मौका मिलेगा। और इसी बहाने कुछ सीखने का भी। चियर्स…

Sakshi के द्वारा
January 21, 2010

Respected Sir, When I was reading this article I felt that I was there and all that is happening around me……that’s called article.. Wow…..!!! Regards

    Stew के द्वारा
    May 25, 2011

    Such a deep asnewr! GD&RVVF

rohan के द्वारा
January 21, 2010

बहुत सही

pushpendra के द्वारा
January 21, 2010

अापकी लेखनी के तेवराें ने सबकाे सममाेिहत कर िदया है ।

Naveen Pathak के द्वारा
January 19, 2010

विष्णु जी, लेखनी पर आपकी पकड़ है ये तो दिख गया| आपके विचार जानना चाहता हूँ की क्यों लेखनी जनमानस पर पकड़ छोड़ चुकी है, ख़बरों का असर साथ में रक्खी प्याली की चाय के साथ ही खत्म हो जाता है| ख़बरों के साथ खबरिओं का मूल्य भी समाप्त होता जा रहा है | दिल्ली में कुछ पत्रकारों को जनता हूँ आत्मबोध आत्ममंथन सुधार जैसी बातें करने वाले स्वयं इससे बहुत दूर होते हैं – बड़ी निराशा होती है| जहाँ से लगता है परिवर्तन शुरू होना चाहिए वहीँ उसका गला दबा दिया जाता है|

Salil के द्वारा
January 19, 2010

सर जी, enjoyed both the writing and the photograph.When are you posting again?

अनंत विजय के द्वारा
January 18, 2010

सर, आपके लेख को पढकर बहुत लोगों को आनंद आया, कई गदगद हो गए, कुछ को प्रेरणादायी लगा लेकिन मुझे तो भूख लग गई है । मेथी की पत्ती सिर्फ टूटती ही रहेगी या फिर किसी दिन उसकी सब्जी भी बनेगी और पूरी कद्दू की सब्जी के साथ मेथी का आनंद

dhirendra srivastva के द्वारा
January 18, 2010

वाह भाई विष्‍णु जी, मजा गया। आगरा से वापसी में एक रात कानपुर के खाते में रही। जयप्रकाश पाण्‍डेय, मुन्नू भैया, राजेश सिंह और कानपुर प्रेस क्‍लब के सचिव सुनील के साथ सेंट्रलधर्मशाला से लेकर भाई अम्‍बरीश शुक्‍ल के नए अड्डे तक कब्‍ज के इलाज का आनंद लिया। आगे भी यह आनंद मिलता रहेगा, इस भरोसे के साथ दो लाइनें आपके लिए, सच को दमदार तरीके से परोसा भी है। अपने प्राचीनतम रस्‍तों पे भरोसा भी है। -धीरेंद श्रीवास्‍तव

Sakshi के द्वारा
January 18, 2010

Dear Sir, You have written an awesome article. Please keep writing such articles. Your experiences will help us in doing a lot in life. Wait for you next article…!! God Bless You…!!

Munish Dixit के द्वारा
January 18, 2010

आदरणीय महोदय, आपका लेख पढ़कर आनन्‍द आ गया। लेख काफी रुचिकर और प्रेरणादायी है। अगले लेख की प्रतिक्षा रहॆगी।

lntripathi के द्वारा
January 17, 2010

आपके लेख की सूचना देने के लिए भाई राजू मिश्र को धन्यवाद। आपका लेख पढ़ने के साथ ही आपके द्वारा समय समय पर बोले जाने वाले विभिन्न डायलाग मन को गुदगुदा गए। सादर।

अजय शुक्‍ला के द्वारा
January 17, 2010

इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा करते हैं कत्‍ल हाथ में तलवार भी नहीं शुक्र है, आपने सिद़धी गुरु की तरह पहलवानी नहीं छोड़ी और वैद्य जी की सलाह मान ली। वैसे, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि अपने कॅरियर के शुरुआती दिनों में मैं जिन दो पत्रकारों की लेखनी का अनुसरण करता रहा हूं उनमें एक आप और दूसरे श्री ज्ञानेंद्र शर्मा जी हैं। प्रणाम

नीरज वशिष्‍ठ के द्वारा
January 17, 2010

लेख काफी रुचिकर और प्रेरणादायी है। प्रेरणादायी इस अर्थ में कि हम अक्सर जीवन के मायने किताबों में तलाशते हैं, आसपास की घटनाओं के प्रति हमारा रवैया बेहद निर्मम रहता है। सिद़ध्‍ गुरु की एक घटना को आपने आज के संदर्भ में, करियर के संदर्भ में जो जोड़ा, वह अनुकरणीय है। हमें आसपास की घटनाओं को ठीक इसी तरह उसके पूरे आयामों में देखने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए। इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद । अगले लेख की प्रतिक्षा में – नीरज वशिष्ठ ।

    Doc के द्वारा
    May 25, 2011

    Now that’s sbtlue! Great to hear from you.

विजय त्रिपाठी के द्वारा
January 16, 2010

हे भगवान………. स्वयं विष्णु को सरस्वती पुत्रों का आह्वान करने को आगे आना पड़ा

विजय त्रिपाठी के द्वारा
January 16, 2010

ऐसा प्रेरक प्रसंग पढ़कर मेरी भुजाएँ भी फड़कने लगी है, पोर-पोर की पीर पिघलने वाली है..मुगदर उठाके हमहूं अखाड़े में कूदने वाले हैं… जय बजरंग बली की विजय त्रिपाठी, पुराने अखाड़ेबाज

    Boss के द्वारा
    May 25, 2011

    And I tuhoght I was the sensible one. Thanks for setting me straight.

    Jasemin के द्वारा
    May 25, 2011

    Great thinking! That ralely breaks the mold!

SANJAY.Bagaha के द्वारा
January 16, 2010

मनुष्य को उसकी िजम्मेदािरयों का एहसास करानेवाली बातों का बहुत अच्छा समावेश । सादर,

hari shankar mishra के द्वारा
January 15, 2010

मुदित करने वाला लेख है। जो मथता रहा है, वही डाला। वह भी इतनी सहजता से कि लोग पढ़ें तो फिर खुद को रोक न पायें। श्रृंखला की उम्मीद हैं। यह भी उम्मीद है कि कोई व्यस्तता इसमें आड़े नहीं आएगी।

suneet के द्वारा
January 15, 2010

accha laga sir. Jounalism ki padaye karte samay jo socha tha uske ulat ab bas ek pagenator Cum copy editor bankar rah gaye hai. incharge kahte panna time par chod do bas. kaun padhta hai.kaun likhta hai

    Ryne के द्वारा
    May 25, 2011

    You’re the gertaest! JMHO

संजीव गुप्ता के द्वारा
January 15, 2010

भैये आप तो बहुत संदर लिखते हैं.मजा आ गया आपका लेख पढ़कर.बधाई. http://www.vastuarchitect.co.in

dinesh mani pathak के द्वारा
January 15, 2010

to hath fir se tarkash pr gaye hai.

daya shankar shukla sagar के द्वारा
January 15, 2010

बहुत सुन्दर! जितनी अच्छी तस्वीर है उतनी सुन्दर लेखनी. उस दिन लखनऊ के जनपथ मे आपको टहलता देख जैसे चौका था वैसे ये लेख पढ़ कर ठिठक गया! हमने तो सुना था हमारे विष्णु जी डेल्ही में न्यूज़ मेनेजेर हो गए. लखनऊ के साथ लिखना पढना भी छोड़ गए.लेकिन भला हो ब्लॉग संस्कृति का. घर वापसी हो गई. पता नहीं आपको याद है की नहीं. मुझे पहली बीट लखनऊ यूनिवर्सिटी की मिली थी जागरण में . रिपोर्टिंग का पहला पहल अनुभव था. इंट्रो के आगे खबर नहीं बढ़ पाती थी. खबर मिस होती थी सो अलग. मै जार जार रोया था. कहा था मुझसे ये सब नहीं होगा. मै डेस्क पर ही ठीक हूँ. तब आपने समझाया था. हेमंत तिवारी आपके साथ थे. दिलासा भरे वो आपके शब्द मै आज भी नहीं भूल पाया हू.मै अब भी नए लडको को वो किस्सा सुनाता हू. उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करता हूँ. दरअसल अब लगता है लिखना हमारी आन्तरिक जरुरत है.सच कहे तो हम पत्रकार लिखने के लिए अभिशप्त है. लिखना एक आदत है जूनून है.क्या करेगे आप. लिखेंगे खूब लिखेंगे का उद्घोष आप जैसे बहुत से लोगों को प्रेरणा देगा जिन्होंने लिखना छोड़ दिया है. शब्दों की अमरता में भरोसा करने वाले हम लोग की और क्या पूंजी है. कल हम नहीं होंगे पर हमारे लिखे हुए शब्द किसी पुस्तकालय की आलमारी में किसी किताब के पन्नो में सहेज के रखे होंगे. या नेटवर्क के इस अद्भुत ब्रह्माण्ड में ये शब्द सितारों की तरह परिक्रमा कर रहे होंगे. इन्ही के बीच कही आपके मोहल्ले के सिद्धि गुरु भी होगें अजर हमेशा के लिए अमर.किसी और को लिखना फिर से शुरू करने की प्रेरण देते हुए. आपका सागर 09415002299

    Jacey के द्वारा
    May 25, 2011

    I bow down humbly in the presence of such graetsnes.

    Conyers के द्वारा
    May 25, 2011

    Thanks alot – your answer solved all my problems after sevrael days struggling

Manish Tripathi के द्वारा
January 15, 2010

अति सुंदर

Atul Agrawal के द्वारा
January 15, 2010

विष्णु जी, शानदार लिखा है आपने। बधाई। सादर, अतुल अग्रवाल 9910021189

    Betsey के द्वारा
    May 25, 2011

    It was dark when I woke. This is a ray of sunhsnie.

Rahees Singh के द्वारा
January 15, 2010

aadarneey bhai kharmas prabhav to badh raha hai, tandrayon ke tootane ka silsila abhi to shuru kahan hua, aapne jo likha hai usase abhi kitane murjhaye chehron ko oorja nashib hogi kaha nahi ja sakata. phir bhi samay ko dhakka to dena hi hai so aapne is blog ke jariye meri samajh achchha khasa diya hai. aapko kotishah sadhuwad.

pradeep agnihotri के द्वारा
January 15, 2010

कम मिठाई की शुरुआत प्रशंसनीय है, इससे दूसरों को भी मुंह मीठा करने की प्रेरणा मिलेगी।…और कामचलाऊ फोटो की बात तो बेहद गुदगुदाने वाली है। जिसने ब्लाग खोला, उसी की नजर फोटो पर ठहरी। कोई भी इस वास्तविकता को नकार नहीं सकता। इस लिहाज से दरपण में देखकर अनदेखा (…… ) करने का अंदाज भी अद्भुत है। प्रयास व उद्देश्य उत्तम हैं, ईश्वर इस क्षेत्र में भी आपको प्रसिद्धि प्रदान करे।

mukund के द्वारा
January 14, 2010

विष्षुजी, आप का लिखा, राजू के संदेश के बाद पढ़ा । भाई, आपने दिल को छू लिया । वह दिन भी जब रात-रात जागकर रिर्पोट तैयार करते थे । तब उसे छपने के लिए भेजते थे । मशीनों ने कलम छीन ली है । …और अब मोबाइल फोनों ने अंतरदेशीय पत्र । चलिए लिखने की शुरुआत तो की आपने । मुकुंद, चंडीगढ़

    Emma के द्वारा
    May 25, 2011

    I bow down humbly in the prseecne of such greatness.

gaurav के द्वारा
January 14, 2010

hope u’ll keep coming up with this kind of stuff…..congrats for this humorous article..!!

ranjib के द्वारा
January 14, 2010

अरे वाह….. बहुत िदन बाद ही सही….िलखे तो

madan mohan singh के द्वारा
January 14, 2010

यह तबियत से उछाला गया पत्‍थर है। आसमां में छेद होकर रहेगा। एक कारवां बनकर रहेगा। जरूरत थी एक संजीदा आगाज की।लिखने का सिलसिला तो अब चलता रहेगा। इसी बहाने बिछड़े साथी-संगाती रूबरू होते रहेंगे। इस जंक्‍शन पर हम नजर आते रहेंगे।

sunil pandey के द्वारा
January 14, 2010

मजा आ गया।

    Dell के द्वारा
    May 25, 2011

    Thank God! Someone with barnis speaks!

raghavpuravia के द्वारा
January 14, 2010

भाई हम तअ भोजपुरी में लिखब। पुरबिया हईं, ठेठ। बात निकलल बिया त दूर तक जाई। शुरुआत गांव से भईल, हमरो अपन गांव याद आईल। अखाड़ा के जिक्र से निमोछिया जवानी सर से आंखी के सामने से गुजर गईल। आजकल के जाकी के पितामह लंगोट करीब 30 साल से साथी बा। पहलवान कभी बूढ़ा ना होखे ला, बस आखाड़ा के जरूरत पड़ेला। अखाड़ा ( जागरण जंक्‍शन )मिल गइब बा, आदरणीय विष्‍णु जी शुरुआत कइये देले बाड़न, अब लिखाई। खूब से भी ज्‍यादा लिखाई। सबसे अच्‍छा बात ई बा कि श्री गणेश गांव से भइल बा। उम्‍मीद बा कि शहर के भीड़ में कहीं गांव हंसत जरूर नजर आई। कहीं पिंक शर्ट में तो सफेद शर्ट में। —राघव पुरबिया

शिवांशु शुक्ल के द्वारा
January 14, 2010

आपका लेख बहुत दमदार है.बस अब दनादन लिखते रहिये.सिलसिला टूटने न पाए.जौहिंद,जय भारत.

manish srivastava के द्वारा
January 14, 2010

आदरणीय भाईसाहब, ब्लॉग के बहाने पुँराने दिनों में झाकने की पहल वाकई सराहनीय है, यादें सिर्फ किस्सागोई बनकर रह जाती हैं. इन्हे शब्दों में पिरोने के आप बाजीगर हैं ही, कुछ अनकही बातें भी आपने कह दी, शब्दों की इस लड़ी को टूटने नहीं देंगे, ऐसे मेरी आपमें आस्था है. मनीष श्रीवास्तव

    Doughboy के द्वारा
    May 25, 2011

    Hey, good to find smeoone who agrees with me. GMTA.

    Deliverance के द्वारा
    May 25, 2011

    Your anwser was just what I needed. It’s made my day!

Ashok के द्वारा
January 14, 2010

अगर पहलवान हैं तो पहलवानी न छोडिये। इसमें उम्र और बीमारी का बहाना नहीं चलेगा। विष्‍णु जी के लेख से तो यही संदेश मिलता है। लेख्‍ा अच्‍छा और नसीहत वाला है। ऐसे ही लिखते रहिये, पहलवानी से निराश लोग अपनी लकीर से जुदा नहीं हो पायेंगे। अशोक चौधरी

rajesh chandra mishra के द्वारा
January 14, 2010

sir its too good.very orignal and heart toucing.specialy the ur photo searcing part, Rajesh chandra mishra Reporter,hindustan Vns.

chaumasa.blogspot.com के द्वारा
January 14, 2010

वस्‍तुत: आंकडों के मुताबिक, उन्‍होंने बताया, उन्‍होंने कहा, उनके अनुसार से इतर रचा गया ही हृदयस्‍पर्शी होता है, एकदम वंडरफुल।

Anand Rai के द्वारा
January 14, 2010

अादरणीय िवष्णु ित्रपाठी जी,बहुत खूब। वही िबंदास अंदाज,जो अापकी बातचीत में िदखाई देता है। अपने अालेख में बाबा की बातें अिजया की बातों का िजक्रकर अापने गंवई याद ताजा कर दी। उम्मीद है िक कनपुिरया-कनौिजया के बाद अागे लखनऊवा भी खूब पढ़ने को िमलेगा। साथ ही न िलखने वाले भी िलखने की प्रेरणा लेंगे। -upendrapandey के द्वारा

sankalp के द्वारा
January 14, 2010

सिद्धी गुरू एक प्रतीक है. सच कहिये तो बड़े बड़े धुरंधर सिद्धी गुरू हो गए हैं. अब तक असली बात बताने वाले वैद्य की कमी थी. विष्णु जी ने वैद्य की भूमिका खुद निभा दी. बेहद शानदार और प्रभावशाली लेख. जागरण के सोये हुए शेर जाग जायेंगे. संकल्प -

Gauri Mishra के द्वारा
January 14, 2010

Liked your script .Its really good.Hope you will be writing something like this one

manoj rai के द्वारा
January 14, 2010

आपने एक फूल चढ़ा दिया और लोग खुश हो गए. वृक्ष रोज ही फूल चढ़ा रहे हैं. आपने एक गीत गुनगुना दिया, पक्षी सुबह से शाम तक गुनगुना रहे हैं. आप वृक्ष बनकर रोज फूल चढ़ाइए. आपसे उम्मीद बहुत है. आप लिखेंगे तो लोग बदलेंगे. आप लिखेंगे तो लोग प्रेरित होंगे. आप लिखेंगे तो दुनिया सीखेगी और जागरण चमकेगा. मनोज राय

sumit rana के द्वारा
January 14, 2010

भैया विष्णु जी बहुत दिनों के बाद आपको देखा. आपका लिखा अच्छा लगा. प्रेरित हुआ. पर लगे हाथ आपसे शिकायत जरूर कर दूं. पहले तो अखबार में खूब दिखते थे, बहुत साल हो गए आपको देखे. खुशी यही कि अब आप दिखेंगे. बधाई . आपका सुमित

    Polly के द्वारा
    May 24, 2011

    Kudos! What a neat way of thniking about it.

Anand Rai के द्वारा
January 14, 2010

सच कहूं तो यह आम पत्रकारों का दर्द है। पूरी पत्रकारिता जिस तेजी से व्‍यवसायिक और प्रबंधपूर्ण होती जा रही है उसमें सिद्धी गुरूओं की संख्‍या तेजी से बढ रही है। ऐसे में हम सबके वरिष्‍ठ विष्‍णु त्रिपाठी जी का लेख हम सबके लिए चेतावनी और काफी हद तक प्रेरणास्‍पद है। Rakesh sarswat sarswat_rakesh@yahoo.com

    Bison के द्वारा
    May 25, 2011

    Your aneswr was just what I needed. It’s made my day!

आलोक त्रिपाठी के द्वारा
January 14, 2010

अगले लेख में फोटो थोड़ा और पुराना (मतलब मुस्कराता हुआ) हो तो अच्छा लगेगा।

Vats के द्वारा
January 14, 2010

विष्णु जी, लिखने का अंदाज बेहद रोचक है आपका. अब तो ऐसे ही मजेदार चिठ्ठों का इंतज़ार रहेगा. धन्यवाद

Anand Rai के द्वारा
January 14, 2010

और जो सबसे मजेदार बात, विष्‍णु जी ने अपनी फोटो थोडी पुरानी लगा दी है। शायद तबकि जब वे खूब लिखते थे। लिखने वालों के लिए यह सावधानी बरतने की जरूरत है कि गुरुजी की तरह अगर उन्‍हें अपनी पुरानी कसरत याद रखनी है तो पुरानी फोटो लगानी जरूरी है। खालिस जवानी वाली।

Anand Rai के द्वारा
January 14, 2010

अब तो लिखेंगे, खूब लिखेंगे। आदरणीय विष्‍णु त्रिपाठी जी का यह आलेख पढा। खुद को लिखने के लिए एक गुरु का सहारा लिये। पर उनका मकसद सबको प्रेरित करने जैसा है। जिनके हाथ से कलम छूट गयी है यह लेख उन सबको उर्जित करने के लिए पर्याप्‍त है। इस आलेख में भावना है, मर्म है और पीछे छूट रहे लोगों को पकडकर आगे ले चलने की तडप भी है। विष्‍णु जी को हम पढते रहे हैं। उनकी रपट रिझाती रही है। वे लिखेंगे तो निश्चित रूप से पढने वाले मुदित-प्रमुदित होंगे। उनके लिए हमारी यही शुभकामना कि लिखें। लिखेंगे तो चाहे कनपुरिया लिखें या खालिस कनौजिया, जो भी लिखेंगे उसमें सकारात्‍मकता होगी। समाज को और अपने साथियों को आइना दिखाने जैसी बात होगी। मैं दिल की गहराइयों से उन्‍हें बधाई दे रहा हूं।

Rakesh bhartiya के द्वारा
January 14, 2010

शानदार!! थोडा इमोशनल लिख दिया है आपने,लेकिन सच मन लिखने को कुलांचे मरने लगा है.अपने मकसद मे कामयाब रहे है आप ,साधुवाद!! राकेश भारतीय ऑस्ट्रेलिया

Professor cs chauhan के द्वारा
January 14, 2010

I will not comment on this article. But will say with full courage that word bank is increased after reading. Article is inspiriting and will shut mouths of those who always cry on there present.

JJ के द्वारा
January 14, 2010

sir aanand aa gya.

    Burchard के द्वारा
    May 25, 2011

    Tnakhs for the insight. It brings light into the dark!

क्रांति मिश्रा के द्वारा
January 14, 2010

पुरानी यादें ताजा करने का एक अलग ही आनंद है। आपके लेख से लोगों को अपने पुराने दिन याद करने और उनका चित्रण करने की प्रेरणा मिलेगी।

    Flip के द्वारा
    May 25, 2011

    That’s 2 cleevr by half and 2×2 clever 4 me. Thanks!

मनीष मिश्रा के द्वारा
January 14, 2010

फोटो गजब की शानदार है।

aditya के द्वारा
January 14, 2010

आपका लेख मुझे काफी प्रेरणास्‍पद लगा। इससे मुझे आगे बढ़ने के लिए हौंसला बनाने में मदद मिली। बेहतरीन लेख के लिए धन्‍यवाद स्‍वीकारें।

ankit kumar mishra के द्वारा
January 13, 2010

लेख पढ़ने के बाद मन मुदित हैं। निरंतरता बनाये रखियेगा।

आलोक त्रिपाठी के द्वारा
January 13, 2010

यह किस्सा `अखाड़े के नवोदित पहलवानों` का हौसला बढ़ाने के लिए काफी है। लिखने के लिए मन कुलाचे मारने लगा है। लेखनी चल पड़ी तो शायद सिद्धी गुरू वाला रोग न लगे।

    Flossy के द्वारा
    May 25, 2011

    Good to see a tlaent at work. I can’t match that.

धर्मेंद्र पाण्‍डेय के द्वारा
January 13, 2010

वास्‍तव में आपका लेख पढ़कर आनन्‍द आ गया। बीते दिनों की यादें ताजा हो गईं।

राजू मिश्र के द्वारा
January 13, 2010

वास्‍तव में हम झोंके में लिख गये। सिद्धी गुरू और सिद्धे गुरू दो अलग-अलग महानुभाव थे। सिद्धी गुरू अखाड़ेबाजी में निष्‍णात थे तो सिद्धे गुरू कला जगत में। संतोष की बात है लिखने का वचन। लिखवाने वाले लोग जब खुद लिखेंगे तो जाहिर है बेहतर सामग्री पढ़ने को मिलेगी।

    Paulina के द्वारा
    May 25, 2011

    Hahahaha. I’m not too brhigt today. Great post!

Pradeep Mishra के द्वारा
January 13, 2010

हम भी पढ़ ही लिए हैं आपका प्रेरक प्रसंग (राम कहानी कहना अच्छा नहीं लगता है ना)। पुराने दिनों (खासतौर पर लखनऊ) की कुछ-कुछ वे बातें हमें याद आ रही हैं, जो आप मौका पड़ने पर पूरी तल्लीनता के साथ सुनाते-बताते थे। सत्ता के गलियारे में तो कई आइटम आप खुल्ला खेल फरुक्खाबादी की तर्ज पर लिखते थे। लेकिन समझ में यह नहीं आया कि कन्नौजियों (माफ करें। मैं फरुखाबादी हूं और कभी यह हमारे जिले का भाग था। इसलिए बुरा लग रहा है) की बात क्यों नहीं करेंगे। थोड़ा विचार करें। लगातार लिखेंगे तो यकीन है कि आप फैजाबाद तक भी पहुंच जाएंगे।

    Artie के द्वारा
    May 24, 2011

    That’s the best awnser of all time! JMHO

anal patrwal के द्वारा
January 13, 2010

वास्‍तव में पढ़कर मजा आया,अच्‍छा लगा। जिस ढंग से लिखा गया है,आगे भी रूची बनी रहेगी। इंतजार रहेगा और पढ़ने के लिए।

    Denim के द्वारा
    May 25, 2011

    You’re the one with the barins here. I’m watching for your posts.

sanjivmishra के द्वारा
January 13, 2010

कनौजिया ब्लागिंग एक नया कांसेप्ट है…. झाड़े रहो कलक्टरगंज टाइप भी कुछ आपके कीबोर्ड से ही आयेगा, उम्मीद है जल्दी पढ़ने को मिलेगा….

raju mishra के द्वारा
January 13, 2010

शानदार लिखा लेकिन वह सिद्धे गुरु थे, सिद्धी गुरु नहीं। बहुत तगड़े रंगकर्मी और लिक्‍खाड़ थे वह। नाना प्रकार के रसायनों से तैसार सुपारियां रखते थे और प्रियजन को ही खिलाते थे वह। किसी एर- गैर ने मांग लिया तो मानों खैर नहीं उसकी।


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran