blogid : 149 postid : 7

लो फिर वसंत आई... या आया (1)

Posted On: 20 Jan, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

रात की तरह सुबह भी थरथरा रही थी। फिजां के भी दांत किटकिटा रहे थे। हवा को भी कंपकपाहट छूट रही थी। लेकिन कोहरा तो नहीं था। सब लोग आम दिनों के मुकाबले कुछ जल्दी ही बिस्तर छोड़ चुके थे। घर में सबसे ज्यादा व्यस्त पंपा (हम लोग बाथरूम को पंपा कहते थे) और अंगौछा (तब घर के सभी पुरुषों के लिए नहाने के बाद बदन पोछने खातिर एक ही गमछा या अंगौछा हुआ करता) था। पंपा के लिए एक तरह जैसे क्यू (कतार) लगी थी, एक बाहर निकला और दूसरा तत्काल भीतर। टोंटी से पानी की धार नीचे की ओर थी और भाप की उबार ऊपर की ओर। सीधे टोंटी के नीचे दाखिल हुए, जूड़ी सिर से होते हुए पांव के तलुओं के रास्ते बाहर हो गई। हहरा के नहाए…ओं नमः शिवाय…ओं नमः शिवाय। कूटे हुए काले तिलों को बदन पर मला, एक बार फिर टोंटी के नीचे। तब तक भाई जी ने पंपा की अलगनी पर अंगौछा टांग दिया था। बदन पोंछा, आधे गीले-आधे सूखे। अधोवस्त्र के नाम पर पटरा का जांघिया, बाल काढ़े और सरस्वती जी की फोटो के सामने…या कुंदेंदु तुषार हार धवला…शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमां…या देवि सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता। चौके (रसोई) मे घुसे और तिलकुट (कुटा हुआ तिल और भेली वाले नए गुड़ की मिलौनी) अंजुरी में अंजोरा, छत की तरफ भाग निकले। सुर्ज भगवान आरुणि राग में निबद्ध कोई गीत विलंबित भाव से गुनगुना रहे थे, उस ठंड में उनकी गुनगुनाहट हमें भी कथरी की तासीर का एहसास करा रही थी। ऊपर से ये गुनगुनी और अंदर से तिलकुट की सक्रियता का असर।

 

छत के दूसरी तरफ पीत वस्त्रों में अम्मा और बुआ अजिया (पिता जी की बड़ी बुआ) तुलसा जी के सान्निध्य में हैं। अइपन (पिसे हुए गीले चावल और हल्दी का मिश्रण जो विशुद्ध वासंती रंग को हो जाता है, अइपन शायद आलेपन या अल्पना का देशज-अपभ्रंश हो गया) से तुलसा जी का चौरा लीपा जा रहा है। तुलसा जी नहलाई जा रही हैं। उन्हें पीतांबर ओढ़ाया जा रहा है। सुहाग-सिंदूर लगाया जा रहा है। तिलकुट का भोग लगाया जा रहा है। अब धूप (अगरबत्ती) दी गई और लीजिए आरती भी शुरू हो गई…जय तुलसा मैया,रानी जय तुलसा मैया। मालिन अजिया भी आ गईं। वो चार भेंटें लाई थीं। भेंट माने अइपन से रंगे-पुते मिट्टी के हुंडा यानी कुल्हड़ में भरी हुई पिलखुआं दोमट मिट्टी। उस मिट्टी में खुंसी हुई गेंदा, खासकर जाफरी की चार सींकें (जैसे माला बनाने के लिए गेंदे को सूत के धागे में पुहते हैं, पिरोते हैं वैसे ही भेंटों के लिए गेंदें के फूल महीन सींकों में पुह दिये जाते थे और खड़ी लड़ी तैयार हो जाती थी)। भेंटें उस जमाने के गुलदस्ते थे, बुके थे। एक भेंट तुलसा जी के चौरे पर, दूसरी सरस्वती जी के समक्ष, तीसरी पंपा में और चौथी चौके में। ये तो हमने बाद में निहितार्थ निकाला कि चूंकि पंपा शुद्धता का प्रतीक था और चौका, मां अन्नपूर्णा का मंदिर यानी समृद्धि का प्रतीक, सो इन दोनो स्थानों को भी वसंत की शुभकामना के तौर पर भेंटे भेंटाई जाती थीं।

 

नीचे आंगन में धोबिन चाची (कल्लू बरेठा की अम्मा) गोहार लगा रही हैं। बिप्पू की अम्मा, अद्दू की अम्मा, धुन्ने की अम्मा…(ये अम्मा लोग अधिकतर बेटों के नाम से ही क्यों पुकारी जाती हैं।) धोबिन चाची पालथी मारे, डलिया पसारे आंगन के बीचो-बीच देवी मां की भांति स्थापित हैं। उनका तेल पुता सिर पूरी तरह सिंदूर से लबरेज है, घरों-घरों से सुहागिनों से सुहाग लेते-लेते, देते-देते। वो अति श्यामा थीं कसौटी के पत्थर सरीखी, बाल उनके झक्क सफेद और ऊपर से सिंदूर का जबर्दस्त अतिक्रमित पुट और पीला अंगरखा (ब्लाउज का बुश-शर्ट नुमा बड़ा भाई, जिसमें आजू-बाजू जेब भी होती है)-पीली धोती। अब आप ही उस दैवी छवि की कल्पना करके देखिये।। एक-एक करके अम्मा लोग धोबिन चाची से सुहाग का आदान-प्रदान कर रही हैं (इस परंपरा का लाजिक आज तक समझ नहीं आया)। उनकी डलिया में यथा स्थान तिल, गुड़, अमरूद, आलू, पैसा धरे जा रही हैं। मुनीमिन चाची ने उन्हें इस बार नई धोती भी दी, तीन बेटियों के बाद बेटा जो हुआ है, उनका ये पूरा साल कुड़वार मनेगा। धोबिन चाची गईं और ज्ञाना बुआ (नापिताइन-नाउन बुआ) का रंगमंच रूपी आंगन में आगमन। एक के ऊपर एक तीन बंसेलिया (बांस की डलिया), सब पेरी या पियरी (पीले रंग से रंगा सूती झीना कपड़ा) से ढकी हुई। ज्ञाना बुआ समग्र मोहल्ले की रिलेशन इनसाइक्लोपीडिया हैं, उन्हें मालूम है कि किस परिवार का किस-किस से व्यवहार है और किस स्तर का। उनका अम्मा लोगों से ननद-भौजाई का रिश्ता है। आते ही आंगन में पसरना और चौके में व्यस्त किसी एक भौजाई से उनका चुहल करना, ठठा कर हंसना। हंसी एक सायरन की तरह थी जो ताकीद कर देती थी, बाअदब, बामुलाहिजा! ज्ञाना बुआ पधार गई हैं। पूरे मकान में रहने वाली अम्मा लोग, चाची लोग, दिद्दा लोग या हम लोग, (प्रत्येक परिवार का कोई एक प्रतिनिधि) थालियां लेकर उनके इर्द गिर्द इकट्ठा हो जाते। वो एक-एक करके बंसेलिया से मैदा की पूड़ी, पुआ, लड्डूट, लेड़ुआ, बालूसाही, कुज्झा (चीनी यानी शक्कर से बना हुआ कोई भी पात्र) आदि थालियों को पहचान-पहचान कर यथा व्यवहार रखती जातीं। साथ-साथ कमेंट्री जारी रखतीं, राम स्वरूप भैया के नाती भा है, यो मूलचंद के लड़िका की ससुरार से आओ है। वस्तुतः ये वसंत पंचमी का बायन था।

 

चौके में खटपट शुरू हो गई है। अंगीठी में चाय बन रही है और चूल्हे पर चढ़ी कढ़ाई से फुलौरी (बेसन की डमरूनुमा पकौड़ी, जिनकी कढ़ी भी बनती थी) निकल रही हैं। वासंती फुलौरियों के साथ चाय की चुस्कियां। एक-एक करके सबके कपड़े निकल रहे हैं। हम जैसों के लिए लंकलाट (एलगिन मिल का लांग क्लाथ) का चूड़ीदार पैजामा और कुर्ता। टेलर मास्टर साहब (आ. स्व. शर्फुद्दीन मास्टर, फाइन आर्ट टेलर्स वाले, जो हमारे मकान के शुरुआती किरायेदार थे) ने दो दिन पहले ही सिल कर दिये थे। अम्मा ने उन्हें वासंती रंग में पूरी तरह रंग दिया था। अब उन्हें पहनने की बारी है। चहुं ओर वसंत ही वसंत। सब वासंती में रचे-बसे-पगे। तन ही नहीं बाल मन भी वासंती हो रहा है। नीचे चबूतरे पर रामनाथ चच्चू सबको रेवड़ी बांट रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा पाने की होड़। अचानक हुजूम दूसरी दिशा में मुड़ा, छोटे मामा थोड़े आधुनिक हो गए हैं, वो आज रेवड़ी के बजाय सबको हूलागंज की भुर्रा गजक खिला रहे हैं। बच्चन लाल सेठ (हलवाई) ने हर साल की तरह खास वासंती पेड़े बनवाये हैं, सब ईमानदारी से उनकी दुकान के चबूतरे पर रखे थाल से एक-एक करके सिर्फ एक पेड़ा उठा रहे हैं। मन ही मन ये कामना कि उनका कारोबार खूब फले फूले। नन्नो (नानी) हम लोगों का इंतजार कर रही हैं। (दरअसल शहर में हमारा घर और ननिहाल एक दूसरे से सटे हुए हैं।) बारी-बारी से पैर छू रहे हैं और आशीर्वाद में नन्नो से मिल रहा है दस पैसे का सिक्का। इसके बाद मामा और मइयां (मामी) लोगों से भी पैसे मिलने वाले हैं। बड़कऊ तिवारी आवाज दे-देकर गाय-बछड़ों-बछियों को बुला रहे हैं, उनके लिए तिल के लड्डुओं और खालिस गुड़ का इंतजाम किया गया है।

 

खाने का वक्त हो गया। फुलौरी की कढ़ी बनी है, एकदम वासंती। नए चाउर (चावल) की महक सबको सोंधिया रही है। अम्मा ने केसर का हल्का पुट देकर भात को भी वासंती रोगन दे दिया है। रसाजैं (इनका रंग और मिजाज भी वासंती होता है) भी बनी हैं। आज के लिए बेझरा में चने का अनुपात कुछ ज्यादा ही बढ़ा दिया गया था, सो रोटी भी कुछ वासंती-वासंती। भोजन-पानी के बाद छत या रामलीला वाले पार्क की बारी। सुर्ज भगवान से होड़ लेतीं कनकैया (पतंगें) भी आसमान में जोर मार रही हैं। कुछ तन रही हैं, कुछ झुक रही हैं, कुछ कट भी रही हैं, कुछ नए उछाह के साथ वासंती आंगन में पदार्पण कर रही हैं। पीली पतंगों के मेले ने आकाश को भी वासंती उछाह से सराबोर कर दिया है। दोपहर थोड़ी ढलने को ही है और घर में गांव जाने की तैयारी हो रही है, आखिर प्रत्येक वसंत पंचमी को गांव में होने वाली धनुष यज्ञ या परशुरामी का आनंदोत्सव भी तो बाकी है। (इस प्रसंग की चर्चा कभी आगे।)

 

आज जागरण जंक्शन के बहाने 35 साल पहले की वसंत पंचमी याद आ गई। जो अब सिर्फ यादों की ही होकर रह गई है।



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.10 out of 5)
Loading ... Loading ...

75 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

दीक्षा के द्वारा
February 17, 2013

सर , आपने बहुत अच्छा लिखा है , bachpan याद आगया …………. धन्यवाद

Julissa के द्वारा
May 25, 2011

Fell out of bed feeling down. This has brihgetend my day!

rddixit के द्वारा
December 31, 2010

Congratulations Sir. It is a delicious and picturesque and vivid writing.

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
April 15, 2010

बहुत ही सुंदर शब्द चित्र, यादों के झरोखों से एक पुराना चित्रण उठ के खड़ा हो गया…आज के भाग दौड़ में सुकून का अहसास करता आपका लेख…आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Rahul Miglani के द्वारा
February 4, 2010

wow its a good one , i liked it :)

    Melia के द्वारा
    May 25, 2011

    Kewl you should come up with that. Ecxelnelt!

indu के द्वारा
February 3, 2010

लो फिर वसंत आई…..ताहिरा सैय्यद की आवाज में तो वसंत की यही धुन अच्छी लगती है। नॉस्टेलजिया में ले गया यह आलेख। आज के बाजारवादी वेलेंटाइन डे में वो बात कहां जो वसंत पंचमी में होती है। एक बेचैन कर देने वाली उदासी, रोमांटिसिज्म और अजीब सी कैफियत में ले जाने वाला मौसम है यह। बेहतरीन शब्दचित्र…।

mahesh के द्वारा
February 1, 2010

कंप्यूटर सिस्टम में कुछ गड़बड़ी की वजह से देर से पढ़ पाया बसंत को। आपने बसंत का जो रंग बिखेरा है, सचमुच मन बासंती हो गया। अब ऐसा बसंत देखने को नहीं मिलता। खासतौर से शहरी जीवन में तो कतई नहीं। यहां तो चीख-चीख कर बताना पड़ता है सखि मादक बसंत आयो, तब कहीं पता चलता है बसंत आ गया। आपने भी बसंत का कुछ ऐसा ही मौलिक अहसास कराया है। धन्यवाद।

upendrapandey gkp के द्वारा
January 28, 2010

बसंत के बहाने याद अाया बचपन। गांवों में अाज भी पुरानी परम्पराएं िकसी न िकसी रूप में िजन्दा हैं। अादरणीय िवष्णु जी के अालेख को पढ़कर देवरिया जनपद के भाटपाररानी तहसील िस्थत अपने गांव बरईपार पाण्डे की एक परम्परा याद अा गई जो अाज भी चल रही है। बात 1991 की है,उन िदनों की है जब अाज अखबार गोरखपुर में था। बाबरी िवध्वंश की घटना के बाद गांव गया हुअा था। मुहरम की सुबह थी। गांव में परम्परा है िक तािजए उठने के बाद हिंदुअों के दरवाजे पर सबसे पहले पहुंचते हैं अौर घर की बुजुर्ग महिला तािजए पर अक्षत चढ.ाने के बाद उसकी परिक्रमा करती हैं। उस िदन भी अल्लसुबह जब तािजया पहुंचा तो मैनें अपनी बड़ी चाची िजन्हें मौसी कहता था,पूछा िक ई कबसे तािजया के अक्षत चढेला अौर परिक्रमा होला,यह सुनकर वह बोलीं िक बाबू ई पुरखन से होत चलिअावता,कौनो नया बात नइखे। चूंिक मेरे मन में बाबरी िवध्वंश की घटना ताजा थी अौर इसके मद्देनजर ही मौसी से सवाल िकया था लेिकन िजस सहजता से उन्होंने जवाब िदया उससे लगा िक नफरत फैलाने वालों से कहीं ज्यादा मजबूत हमारा सामािजक ताना-बाना है तभी तो गांव की रामलीला में मुसलमान भी अानंिदत होते हैं अौर मुसलमानों के त्योहार में िहन्दू शरीक होते हैं। बसंत के बाद फाग में सभी चेहरे रंग से सराबोर िदखाई देते हैं।

sanjeev tiwari के द्वारा
January 28, 2010

बसंत के साथ-साथ आपकी भी याद आ गई। आपके संस्मरण और उनको व्यक्त करने का तरीका वाकई अद्भुत है। धोबिन चाची और ज्ञाना बुआ हमारे गांव में भी हैं और जैसे-जैसे बसंत प्रसंग आगे बढ़ रहा था, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बरोठे से होकर मैं आंगन में पहुंच गया हूं और अम्मा (दादी) की पंचायत का एक हिस्सा बन गया हूँ। अब न सोहाग लेने के लिए भाना चाची हैं न ही नाउन भौजी, तुलसी की पूजा भी उतने शानदार तरीके से नहीं होती पर संस्मरण के बहाने बसंती यादों को झकझोरने के लिए आपको बहुत -बहुत बधाई।

    Tisha के द्वारा
    May 25, 2011

    I’m not esaliy impressed. . . but that’s impressing me! :)

Rakesh bhartiya के द्वारा
January 28, 2010

सर्वोतेम शब्दावली !!! सजीव चित्रण !! साधुवाद!! राकेश भारतीय ऑस्ट्रेलिया

shrikant के द्वारा
January 27, 2010

वसंत पंचमी या यों कहें कि किसी तीज-त्यौहार पर ऐसा ललित लेखन पिछले कई सालों से आंखों के सामने से नहीं गुजरा था। देर से ही सही, पढ़ने का मौका तो मिला। न पढ़ पाता तो पता चलने पर वंचित रहने का दुःख सालता। बहुत-बहुत बधाई। बहुत सारी शुभकामनाएं।

अतुल चतुर्वेदी के द्वारा
January 25, 2010

सहज चित्रों का उदात्‍त वर्णन। परशुरामी प्रसंग की प्रतीक्षा में….

agrah के द्वारा
January 22, 2010

main to is lekh ko padhkar rahul ji ki baat ka samrathan kartaa hoon. yah jarur kahungaa ki sarswati maa ke din aapne apni kalam jagaayee hai to aap ka naam hindi saahity men jagegaa. badhai, shubhkamna is sankoch ke sath ki vishnu ji ko iski kyaa jaroorat hogi.

rahul shahi. gorakhpur के द्वारा
January 22, 2010

sau sunar ki, do luhar ki, sir! vakai aapki kalam men jadoo hai. rahul

j.s. tripathi- gorakhpur के द्वारा
January 22, 2010

धनुष यज्ञ या परशुरामी का आनंदोत्सव…………..वासंती उछाह से सराबोर ……अब isee की जरूरत है.

sumit rana के द्वारा
January 22, 2010

sir maja aa gaya. tisri baar padh raha hoon. kitna vyvsthit dhang se gadhe hain ise, waah! waah! waah! yah to mere man par apni chhap chhod gaya. बिप्पू की अम्मा, अद्दू की अम्मा, धुन्ने की अम्मा…(ये अम्मा लोग अधिकतर बेटों के नाम से ही क्यों पुकारी जाती हैं।) धोबिन चाची पालथी मारे, डलिया पसारे आंगन के बीचो-बीच देवी मां की भांति स्थापित हैं। उनका तेल पुता सिर पूरी तरह सिंदूर से लबरेज है, घरों-घरों से सुहागिनों से सुहाग लेते-लेते, देते-देते। वो अति श्यामा थीं कसौटी के पत्थर सरीखी, बाल उनके झक्क सफेद और ऊपर से सिंदूर का जबर्दस्त अतिक्रमित पुट और पीला अंगरखा (ब्लाउज का बुश-शर्ट नुमा बड़ा भाई, जिसमें आजू-बाजू जेब भी होती है)-पीली धोती। अब आप ही उस दैवी छवि की कल्पना करके देखिये

rameshwar pandey के द्वारा
January 22, 2010

वाह क्या बात है . मन करता है हाथ चूम लूं .भाई मेरे लिए तो वसंत आज आया .यह शब्द चित्र तो वही लिख सकता है जिसने बचपन में ही अपने पोर पोर में वसंत समो लिया हो .इतना भरपूर कि पूरी जिन्दगी मन वासंतिक बना रहे / उत्सव धर्मिता की यही पृष्ठभूमि हमारा सांस्कृतिक धरातल व्यापक बनाती है /पढ़ कर मन अतीत की क्यारियों में घूम रहा है /बहुत बहुत बधाई

मनीष मिश्रा के द्वारा
January 22, 2010

ओह…… अद्भुत!

    Darnesha के द्वारा
    May 25, 2011

    What a joy to find such clear thniknig. Thanks for posting!

sunil pandey के द्वारा
January 22, 2010

मन को भा गया।

संतोष तिवारी के द्वारा
January 22, 2010

छोटे भाई को नजर न लगे। आपके दो ब्‍लॉग ने मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के भीतर कानपुर को जिंदा कर दिया है, जिनकी जड़ें कानपुर में हैं, लेकिन जो काम-धाम की वजह से अपनी जड़ों से बहुत दूर बस चुके हैं। 1983 में कानपुर छूट गया था, 27 साल बाद मेरा शहर मेरे भीतर कुलबुलाने लगा है। जितना मैंने पढ़ा है, अब तक किसी ने इतने पॉवरफुल तरीके से अपने लेखन में कानपुर की खूशबू नहीं संजोई है। कितने नए शब्‍द हैं, जो बचचन में सुने थे, भूल गए, आपने जगा दिए हैं। जैसे पंपा, जांघिया, अजिया, अइपन, पुह, बंसेलिया, कुज्‍झा, लंकलाट, फुलौरियां और रसाजैं। हमारी अम्‍माजी अभी भी ये सारे शब्‍द बोलती हैं, लेकिन बरसों पहले कानपुर से छूट चुके हम भाई-बहन कानपुर की खुशबू समेटने वाले इन शब्‍दों से बहुत दूर आ चुके हैं। मेरी दुआ है, आप लिखते रहिए, इसी तरह कानपुर और कानपुरवालों की खूशबू बांटते रहिए, जिसकी हम जैसों को बहुत जरूरत है। झाड़े रहो कलेक्‍टरगंज।

girish pandey gkp के द्वारा
January 21, 2010

बात 1978 से 1985 तक ही है। इलाहाबाद विवि का स्‍टूडेंट था। बसंतपंचमी पर संगम नहाने की पूरी तैयारी रहती थी।यार.दोस्‍तों के साथ। कोई न कोई अजूबी सी शर्त लगती थी। पूरा करने की जिम्‍मेवारी मेरे फ्रेंड पंकज की होती थी। एक बार शर्त लगी कि मेले में किसी से कुछ मांग कर खाना है। करने वाले के लिये बंद मक्‍कखन का इनाम भी घोषित था। हम सब रेता कांडते संगम पहुंचे। नहाने धुलने के बाद अब बारी शर्त पूरी करने की थी। एक बुजुर्ग केला खा रहे थे। पंकज ने कहा कि दादा हम लोगों को भी मिलेगा क्‍या। उम्‍मीद थी कि झिडकी ही मिलेगी।पर मांगते ही पूरे प्रेम से उन्‍होंने कई केले हम लोगों को पकडा दिये। वह पंचमी अपनी शरारत और उनकी दरियादिली हम लोगों को अब तक याद है।

    Bono के द्वारा
    May 25, 2011

    Hahahaha. I’m not too brihgt today. Great post!

Sakshi के द्वारा
January 21, 2010

Respected Sir, When I was reading this article I felt that I was there and all that is happening around me……that’s called article.. Wow…..!!! Regards

चौमासा के द्वारा
January 21, 2010

बहुत ही शानदार शब्‍दचित्र है। तबियत बाग-बाग हो गई।

    Jalia के द्वारा
    May 24, 2011

    That’s not just the best ansewr. It’s the bestest answer!

v. rai के द्वारा
January 21, 2010

ऐसे पर्व तो अब सिर्फ यादों और ख्‍वाबों में ही रह गये हैं। आपने परम्‍परा को आगे बढाने का कार्य किया है। यह बहुत ही शुभ है। बसंत पंचमी के दिन दिल बाग बाग हो गया।

    Randi के द्वारा
    May 25, 2011

    Real brain power on display. Tanhks for that answer!

aditya srivastava के द्वारा
January 21, 2010

thanks sir aapne jo maine kabhi dekha bhi nahi usse bhi is tarah likha ki jaise lag rah tha ki mai bhi wahi par hu ab ye sab to yaaado me hi rah gaya hai जरा सोचो िक हमने िवकास के नाम पर िकतना गंवा िदया

    Rain के द्वारा
    May 25, 2011

    That saves me. Thanks for being so snebisle!

vinay के द्वारा
January 20, 2010

बहुत खूब। पढकर लगा कि सामान्‍य घटनाओं को भी कैसे महत्‍वपूर्ण बना दिया जाता है। राजू जी की तरह हमारी भी पाटी पूजा इसी दिन हुई थी। बधाई।

sumit के द्वारा
January 20, 2010

sachmuch majaa aa gayaa. badhaai. टेलर मास्टर साहब (आ. स्व. शर्फुद्दीन मास्टर, फाइन आर्ट टेलर्स वाले, जो हमारे मकान के शुरुआती किरायेदार थे) ने दो दिन पहले ही सिल कर दिये थे। अम्मा ने उन्हें वासंती रंग में पूरी तरह रंग दिया था। अब उन्हें पहनने की बारी है। चहुं ओर वसंत ही वसंत। सब वासंती में रचे-बसे-पगे। तन ही नहीं बाल मन भी वासंती हो रहा है। नीचे चबूतरे पर रामनाथ चच्चू सबको रेवड़ी बांट रहे हैं

M.K.RAI. के द्वारा
January 20, 2010

kabhee kabhee bahut see jankaaree vykti ke paas rahtee hai lekin uska mhtav nahee pataa chalataa hai. par use jab shabd mil jaate hain to n keval jaankaaree badhtee hai balki dil ko sukoon bhee miltaa hai. vishnu ji ko badhaai. maa sarswati unkee kalam ko aur prabhaavee banaayen.

sankalp के द्वारा
January 20, 2010

बहुत ही सुंदर आलेख। बधाई सर। ऐसी जानकारी मिली जिससे हम वाकिफ नहीं थे।

Anand Rai के द्वारा
January 20, 2010

आदरणीय विष्‍णु जी 35 साल पहले अपने अतीत में भले चले गये लेकिन बसंत पंचमी को वर्तमान से जोड दिया। अब पहले जैसी बात तो कहीं नहीं रही पर उत्‍साह अभी भी है। पढते हुये राही मासूम रजा याद आ गये। आधा गांव में उन्‍होंने मुहर्रम के समय का जिस तरह वर्णन किया है उससे मुहर्रम न जानने वाले भी उससे पूरी तरह अवगत हो जाते हैं। इस लेख को पढकर भी जिन्‍हें इस पर्व के बारे में पता नहीं होगा उनकी समझ बढ जायेगी। लिख्नने की शैली बहुत दिलचस्‍प लगी। विष्‍णु जी के शब्‍द चित्र की तरह उभरते गये हैं। सीन में हमारे बडे बुजुर्ग भी हाजिर हैं इसलिए कहानी कई पीढियों को साथ लेकर चल रही है। इस पर्व से जुडे कई अन्‍य कार्यक्रमों का भी अस्तित्‍व उभर आया है। बहुत बहुत शुभकामना। धनुष यज्ञ और परशुरामी के लिए अग्रिम बधाई।

    Lynn के द्वारा
    May 25, 2011

    Thank God! Soonmee with brains speaks!

राजू मिश्र के द्वारा
January 20, 2010

आनंद आ गया,यादे ताजा हो गयी.मेरी भी आज ही के दिन पाटी पूजा हुई थी.लिखा भी आपने काफी जानदार है.अहा वसंत.

Deepak Pandey के द्वारा
January 20, 2010

I used to spend my childhood years in Kankhal near Hardwar. Aaj Kankhal ho aaye aur gangaji ji ki nahar mein bhi naha Liya. Sochta hoon, Samriddhi ke naam par Hamne kya kho diya hai? Aapka dhanyavaad, apne aaj bachpan phir ghuma diya.


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran