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वो शांत होकर बैठने वालों में नहीं हैं

Posted On: 23 Jan, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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छोटा ही सही एक लोहिया बचा था, वो भी चला गया। हालांकि समाजवादी परिसर में उनकी मौजूदगी बड़े लोहिया जैसी हो गई थी। ये बात अलग है कि बदलते दौर में न तो समाजवादी खेमे में वो आंदोलित तेवर बचे और ना ही गैरकांग्रेसवाद का लोहियाई जज्बा। इस वक्त संगम तट पर उनकी अंत्येष्टि हो रही है, अभी सिर्फ दो दिन पहले ही मौलिक जुझारूपन के साथ पुलिस की गिरफ्त को अकुलाए दिख रहे जनेश्वर जी बगैर आंदोलित हुए नियति और प्रकृति की गिरफ्त में चले गए, सदा के लिए। ये वाक्य तो औपचारिकता के लिए ही है कि वो सदा के लिए तमाम लोगों के जेहन में बसे रहेंगे।

 


मेरा न तो उनसे व्यक्तिगत परिचय था और ना ही पैतृक विरासत में मिले विचारों के कारण कोई वैचारिक लगाव या अनुगमन। फिर भी एक पत्रकार होने के नाते वो अच्छे लगते थे, एक खांटी समाजवादी के नाते भाते थे, अपनी बात रखने के अंदाज के कारण सुहाते थे, एक वक्ता के नाते मोह लेते थे। तब मैं कतई परिपक्व नहीं था (वो तो अब भी नहीं हूं), मेस्टन रोड (कानपुर) में बीच वाले मंदिर के पास उनकी एक मीटिंग कवर करने का मौका मिला था। चंद्रशेखर जी भी उस मीटिंग में वक्ता थे। वैसे तो प्वाइंट्स नोट करने का अभ्यास हो चुका था लेकिन जब जनेश्वर जी शुरू हुए तो एक स्टेनोग्राफर की तरह उनका हर बोल नोट करने को मजबूर हुआ। दिक्कत तब आई जब खबर लिखने बैठे। कापी लंबी होती गई, बेटा प्रकाश, कितनी देर में पूरी होगी खबर? सीनियर विष्णु त्रिपाठी जी (वो हमारे लोकल सिटी इंचार्ज थे और नाम के द्वंद्व के चलते बेटा प्रकाश कह कर बुलाते थे।) की तीन-चार बार की टोकाटाकी के बाद कापी पूरी हुई। कापी उन्होंने देखी और झल्लाये। देर भी हो गई थी और इतनी लंबी। हमारी ओर देखा, हमने भी बेबसी में कह दिया कि वो कुछ ऐसा बोले ही नहीं जो लिखा न जाए, रीडर से बांटा न जाए। हमसे चौगुने अनुभवी विष्णु जी भी काफी देर तक उस पर जूझते रहे और राजू फोरमैन को जल्द कापी कंपोज के लिए देने के वास्ते दिलासा देते रहे। दूसरी बार उन्हें तब कवर किया जब वह समाजवादी पार्टी की रैली में बेगम हजरत महल पार्क (लखनऊ) में बोले थे। लेकिन उन्हें सुना अनेकों बार।

 


तुलना करने की कोई कोशिश नहीं कर रहा लेकिन जो एहसास हुआ, वो इस तरह था कि चंद्रशेखर जी जब बोलते तो वो भाव चेहरे पर भी उतरते, मुख प्रदेश पर थोड़ा गुस्सापन झलकता, भौहें तनती और नथुने फड़फड़ाते। जनेश्वर जी बोलते तो अलंकनंदा की भांति गड़गड़ाते। एक लय में तेवर, तंज, तुर्शी और तल्खी पिरोते जाते और अपनी बात सुनने वालों में गहरे से समोते जाते। उनकी आवाज में, सुर में, एक खास किस्म की गमक थी, गूंज थी, पखावज के नाद (गम्म) सरीखी। जो उनके गले से नहीं, नाभि की पृष्ठभूमि से आती लगती थी, बतर्ज आचार्य पंडित भीमसेन जोशी। बेशक उन्होंने विचार की अनवरत साधना की लेकिन वक्तृत्व कला के तो अतुलित साधक थे। कई लोग तो उनकी भाषण कला के ही कायल थे, तमाम लोग कापी करने की कोशिश करते और हम ये कह सकते हैं कि भाषणबाजी में एक जनेश्वर स्कूल आज भी थोड़ा-थोड़ा कायम है। क्रांतिकारी बलिया और विचारशील इलाहाबाद के मानस संगम से वो समाजवाद के कुंभ क्षेत्र हो गए। उनके भीतर जो ज्वलन था, जज्बा था, जुनून था, एक-एक शब्द उसका प्रतिनिधित्व करता हुआ प्रवाहित होता था। पता नहीं क्यों उन्हें सुनते हुए लगता कि जैसे दिनकर का गद्य पाठ सुन रहे हों। पता नहीं ये बात कहां से दिमाग में बैठ गई जबकि मैंने दिनकर को कभी न तो देखा, न सुना, सिर्फ पढ़ा है। (हां, एक बार ऐसा जरूर हुआ था कि कानपुर के प्रयाग नारायण शिवाला में आयोजित एक समारोह में आचार्य शिवमंगल सिंह सुमन को राम की शक्ति पूजा का पाठ करते सुना था, ये कहते हुए कि निराला जी मंच पर ऐसे ही पाठ करते थे। लेकिन पिता जी ने कहा था कि कुछ-कुछ दिनकर जी की स्टाइल भी है।) जनेश्वर जी को सुनकर अचरज होता कि कितना पढ़ा है, कितना पढ़ते हैं, कितना अपडेट रहते हैं। सभा मंचों पर पूरी ठसक के साथ पालथी मारे उनकी छवि याद कीजिए, सिद्ध साधक स्थितिप्रज्ञ, बुद्धा। उनकी वो छवि आज भी याद आती है जब वो समाजवादी पार्टी के खुले सम्मेलन में झकास रे-बैन का चश्मा लगाये बैठे थे। उनकी वो फोटो खूब चर्चित हुई थी, अंग्रेजी अखबारों ने तो उसे खास तवज्जों दी थी। इस बारे में जब उनसे सवाल हुए, कहां समाजवाद और कहां रे-बैन ब्रांड तो जवाब था-आप लोग ऊपर-ऊपर देखते हो, मेरे नजर-नजरिया और दृष्टि-दोलन वही हैं। इसमें दो राय नहीं कि खुद मुताबिक शब्द और परिभाषा गढ़ने में समाजवादियों का कोई जवाब नहीं। उनका पान या पान मसाला छोड़ने का प्रसंग भी काफी चर्चित हुआ था।

 


मैंने कहीं पढ़ा था कि शुरुआती दौर में इलाहाबाद में जनेश्वर जी, चंद्रशेखर जी के व्यक्तिगत खर्चों की चिंता करते थे। ये भी सुना है कि हरिकेवल प्रसाद से लेकर राघवेंदर दूबे और रविंदर ओझा सरीखे समाजवादी उनसे साधिकार जेब खर्च हासिल करते थे। पता नहीं ऐसे कितने लोग होंगे। कितने ऐसे लोग होंगे जो उनसे वैचारिक दिमागी खर्च हासिल करते रहे होंगे। कितने लोग उनके साये में एमपी-एमएलए बन गए होंगे। फूलपुर लोकसभा सीट पर पहला चुनाव जीते थे तो शायद अपने साथ चार एमएलए भी जिता लाये थे। कहते हैं कि जिन दिनों जनेश्वर जी समाजवादी युवजन सभा के कर्ताधर्ता थे, नई पौध विकसित करने की चलती-फिरती नर्सरी थी।

 


मौत से दो-तीन पहले आंदोलन में जूझने वाले जनेश्वर जी ही ये कह सकते हैं कि उन्हें सड़क पर असली ऊर्जा हासिल होती है। वो शांत होकर बैठने वालों में तो नहीं हैं। मजा तो अब आएगा जब वो ऊपर वाले के यहां भी व्यवस्था के खिलाफ मूवमेंट शुरू करेंगे और वो भी उन्हें किसी न किसी निरोधात्मक कार्रवाई-कानून के तहत जेल भेजने को मजबूर हो जाएगा। वो कार-आगार ही उनकी मोक्ष स्थली है।

 



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66 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jhett के द्वारा
May 25, 2011

Walking in the presence of giants here. Cool tihnikng all around!

Anil Yadav के द्वारा
February 28, 2010

आपको होली की मौज भरी शुभकामनाएं। राघवेन्दर दूबे और रबिन्दर ओझा क्यों नहीं दिख रखे जंक्शन पर। इन दोनों ने तो लिखने लायक जिन्दगी भी जी है। आग्रह है आपसे कि इनसे लिखवाइए, जंक्शन के मकसद की सेहत बेहतर होगी।

navneet sharma के द्वारा
February 9, 2010

एक-एक शब्‍द जैसे सब कुछ कह गया है। बहुत अच्‍छा लगा यह आलेख।

    Laticia के द्वारा
    May 25, 2011

    At last, someone comes up with the “right” asnewr!

kumar peyush, balrampur, up के द्वारा
February 8, 2010

जनेश्वर जी पर इतनी सटीक टिपण्णी के लिए साधुवाद. ये उस जेनेरशन का भी द्वन्द दर्शाता है जिसके सामने समाजवाद और मार्क्सवाद अपने खो चुके निहितार्थ के साथ सामने था त्तथा व्यवाहरिक सत्य कुछ और था. येसे में प्रकाश स्तम्भ के रूप में बचे नामो में एक नाम जनेश्वर जी का भी था. लेकिन लोहिया स्कूल का मुलायमी संस्करण गले से न उतरा. जैसे मार्क्सवाद का कराती और येचुरी संस्करण भी गले में अटकता है. कलम की ये धार विश्लेषण के साथ-साथ नयी जेनेरशन का मार्गदर्शन भी करे तो शायद हम पत्रकारों का ये प्रोफेसन अपनाना कुछ सार्थक सिध्य हो. भाई, एक बार फिर साधुवाद. कलम की जंग को झाड-पोछ कर फिर धार देने के लिए.

shatrughan के द्वारा
February 8, 2010

aadarniya bhai sahab, namaskaar aaj tak me janeshwer mishr ko ek SP leader k rrop me jaanta tha. yeh chhavi anya netaon jesi hee thi. unka aabha mandal itnaa prabhavee, swabhav sanvedanseel, or vichar VISHAAL the iski jankari sach me aapke lekh se hi jan paya… amar culture itna haavee tha ki sp me doosra koi najar hi nahin aata tha.. aapka dhanyawad shatrughan

    Essie के द्वारा
    May 25, 2011

    Now I feel stupid. That’s calreed it up for me

dinesh के द्वारा
February 7, 2010

आद. भाई साहब, बहुत बहुत बधाई। कई लोगों से सुना कि जनेश्वर जी के बारे में आपने गजब का लिखा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनके बारे में इससे अच्छी जानकारी कोई नहीं दे सकता, भले ही वे उनके साथी क्यों न रहें हों। सादर

    Jalene के द्वारा
    May 25, 2011

    That’s 2 celevr by half and 2×2 clever 4 me. Thanks!

अरुण डोगरा रीतू के द्वारा
February 3, 2010

इस लेख को पढ कर जनेश्‍वर जी के बारे में काफी जानकारी मिली है और इससे पहले उने बारे मे पढा तो जरूर था पर इतना अधिक नहीं जानता था आगे भी इसी तरह के ज्ञानवर्धक खोजपूर्ण लेखों की प्रतीक्षा रहेगी

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 3, 2010

जनेश्‍वर मिश्र का आज ब्रह़मभोज है। बलिया जिले के उनके पुश्‍तैनी गांव शुभनथही में उन्‍हें भावभीनी भावांजलि अर्पित की जा रही है। जनेश्‍वर जी वाकई जीवन पर्यंत समाजवाद निभाते रहे और आखिरी समय में भी समाजवादियों ने उन्‍हें अपने कंधे पर बिठाये रखा। एक बार जनेश्‍वर जी का इंटरव्यू कर रहा था- सच और झूठ पर बात चलने लगी। उन्‍होंने बिल्‍कुल डांटने वाले अंदाज में कहा- किस सच की बात कर रहे हो, जिस देश में रहते हो वहां तो सच की स्‍थापना ही आधे झूठ पर हुई है। उन्‍होंने कहा कि युधिष्ठिर को इस देश का सबसे बडा सत्‍यवादी माना गया है और जिस गीता पर हाथ रखकर लोग सच की कसम खाते हैं, उसमें उनका उल्‍लेख है। युधिष्ठिर जैसे महान सत्‍यवादी ने भी परीक्षा की घडी में अश्‍वथामा मरो नरो वा कुंजरों कहा था, यानि पूरा सच नहीं बोला। लोहिया के वे सच्‍चे अनुयायी थे और लोहिया का भारत का सबसे महान राजनेता बताते थे। वे कहते थे कि गांधी जी ने भी साबरमती आश्रम बनाकर अपने लिए एक ठिकाना बनाया था लेकिन लोहिया के पास अपना कोई पता नहीं था। जनेश्‍वर जी को लेकर इधर कई कार्यक्रम हुये और वे बार बार याद आये।

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 1, 2010

आदरणीय त्रिपाठी जी को धन्यवाद् व आभार लोहिया के असली समाजवाद को लेकर चलने वाले जनेश्वर जी के बारे में बताकर कई बाते आपने समाजवाद का डंका बजाने वालो को भी बताई नशिचित तोर पर जनेश्वर जी में मानवता भरी थी इसी क्रम में एक बार की घटना याद आती है यानि जब जनेश्वर जी की पत्नी का निधन हुआ उस वक्त वह देवरिया के जिलाधिकारी के कोठी के गेट पर आन्दोलन का नेत्रित्व कर रहे थे मै उस वक्त रिपोरिंग में गया था जब उनसे निधन की बात किया तो कहे की जनता का सवाल है बेटा मै हिलने वाला नहीं हु यह सुनकर मै भावुक हो गया था जनेश्वर जी में असली समाजवाद थी mahendra kumar tripathi jagran deoria

sanjeev tiwari के द्वारा
January 28, 2010

अभी तमाम ऐसे समाजवादी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी, नेहरूवादी, गांधीवादी, अद्वैतवादी, उग्रवादी,कट्टरवादी और अनुवादी बाकी हैं जिनसे ओझा जी समय-समय पर साधिकार जेब खर्च वसूल लेते हैं ।

Rakesh bhartiya के द्वारा
January 28, 2010

बहुत खूब !!! बधाई राकेश भारतीय

naveen gautam के द्वारा
January 26, 2010

असली समाजवाद की सही तस्वीर पेश कर दी अपने. जनेश्वर जी के बारे मे बहुत जानकारी मिलती है आपके इस लेख से. बधाई और धन्यबाद

arvind sharma के द्वारा
January 26, 2010

विष्णु जी, छोटे लोहिया की आपने अच्छी तस्वीर खींची है। ग्यारह साल पहले 1999 में भोपाल में पहली बार उनसे अनायास मिलना हुआ था। समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन था और मैं उस वक्त दैनिक भास्कर, भोपाल में कार्यरत था। जनेश्वर मिश्र और सपा के एक और राष्ट्रीय महासचिव कपिलदेव सिंह एक ही होटल में ठहरे थे। कपिलदेव सिंह से हमारा परिचय और लगाव पटना से ही था। उन्होंने ही मेरा परिचय जनेश्वर जी से कराया, लेकिन दो-तीन दिनों में ही मैं खुद को जनेश्वर जी के ज्यादा करीब महसूस करने लगा। उनका व्यक्तित्व, ज्ञान, चेहरे की सख्ती, बातें कहने की स्टाइल सब मौलिक और सबका मैं फैन। …और एक दिन तो कपिलदेव सिंह ने उनसे पूछ भी लिया, ‘जनेश्वर जी आपने क्या जादू कर दिया। अरविंद हैं मेरे रिश्तेदार, लेकिन अब मिलने आपसे आते हैं।’ आखिरी दिन यह भी हुआ कि मैं अपने पेशे से अलग छोटे लोहिया को भोपाल स्टेशन तक छोड़ने भी आया। आपके आलेख से मेरी पुरानी यादें फिर ताजा हो गई हैं। धन्यवाद।

Pushpendra, Jagran के द्वारा
January 25, 2010

जनेशवर जी की पर्सनािलटी के बारे मैं इतने शशक्त तरीके से आप ही िलख सकते हैं.

    Lonitra के द्वारा
    May 25, 2011

    Hahaahha. I’m not too bright today. Great post!

संजीव गुप्त के द्वारा
January 25, 2010

जनेश्वर जी के पुण्य स्मरण के लिए बधाई. उनके निधन के बाद अब तो नकली समाजवादी ही नज़र आते हैं हर तरफ.वह खाटी समाजवादी नेता थे. http://www.vastuarchitect.co.in

अतुल चतुर्वेदी के द्वारा
January 25, 2010

मैंने आज तक यदि किसी नेता को बेहद निकट से देखा है तो वह जनेश्‍वर बाबू थे। एक बार वह हमारे डिग्री कालेज में छात्रसंघ शपथ ग्रहण समारोह के दौरान आए थे। निश्वित रूप से आपके द्वारा खींचे गए शब्‍दचित्र से उनका हुलिया हूबहू मिलता है। इसी बहाने वह दिन और उनकी शख्यितत स्‍मृति पटल पर दोबारा तैर गई।

    Xexilia के द्वारा
    May 25, 2011

    Kewl you shloud come up with that. Excellent!

Anand Rai- jagran gorakhpur के द्वारा
January 25, 2010

आदरणीय विष्‍णु जी को धन्‍यवाद। इसलिये कि बहुत दिन बाद भाऊ को पढने को मिला। हम सबके भाऊ यानि राघवेन्‍द्र दुबे। विष्‍णु जी ने उनका जिक्र किया और कम्‍प्‍यूटर के बंधन को तोडकर भाऊ फफक पडे। व्‍यक्तिगत रूप से उन्‍हें बहुत करीब से जानता हूं। अपने आलेख को खुद पढकर भाऊ अकेले में बहुत रोये होंगे। उनकी भावनाओं की सरहद और बढे। और पढने को मिले। यही उनसे अनुरोध है। जबसे वे पटना गये भेंट मुलाकात कम हो गयी। पहले कसौटी के बहाने उनकी रचना मिल जाती थी लेकिन अब ट्रैक पर कभी कभी उनकी बेहतर खबरें मिलती हैं। इधर बहुत दिनों से अपने घर आये भी नहीं। भाऊ आपको दिल से सलाम।

snjay mishra के द्वारा
January 24, 2010

visnu ji , janeshwar ji per marmsparshi aalekh ke liye aap ko dhanyabad

धीरेंद्र श्रीवास्‍तव के द्वारा
January 24, 2010

भाई विष्‍णु जी, पढ़ने के लिए िकसी के साथ लम्‍बे समय तक रहना आवश्‍यक नहीं है। युवा तुर्क चंद्रशेखर और लिटिल लोहिया जनेश्वर मिश्र के चेहरे पर बोलते समय उभरने वाले भाव को आपने सार्थक तरीके से परोसा है। स्‍वीकार करने के आग्रह के साथ दो लाईनें आपको समर्पित कर रहा हूं, इजाजत हो तो इसको बार- बार पढ़ने दो। तेरी कलम में भी जादू है आज कहने दो। -धीरेंद्र श्रीवास्‍तव। धीरेद्र श्रीवास्‍तव।

anal patrwal के द्वारा
January 24, 2010

अच्‍छा लगा इसलिए कि कुछ ऐसी बातें उनके बारे में पता चली जो शायद फिर कभी नहीं पता चलती। आगे भी इस तरह के लेख का इंतजार रहेगा।

sunil pandey के द्वारा
January 24, 2010

जनेश्‍वर जी के बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं जानता था। बस इतना ही कि सपा से जुड़े हैं और छोटे लोहिया कहे जाते हैं। इसे पढ़कर काफी जानकारी मिली।

raghvendra dubey के द्वारा
January 24, 2010

राघवेन्द्र दुबे किसी भी बहाने और चाहे जैसे भी मुझे याद करने के लिए विष्णु जी, आपको धन्यवाद। सच कहूं तो अभी कुछ लिखने का मन बना नहीं था- वजह तमाम हैं। कंप्यूटरी पैमाने पर उत्पादन करते रहने की मजबूरी (काश कंप्यूटर यह भी बता पाता कि एक कापी राइटिंग में संदर्भो और शब्दों के लिए खुद को कितना कोंचना होता है), एकरस और बहुत ऊब की मशीनी दिनचर्या के बाद का समय, कुछ वाहियात किस्से- जो दाद की तरह होते हैं उन्हें खुजलाने में ही बीत जाता है। आज ही आप को जागरण के ब्लाग पर पढ़ा और खुशी हुई कि छोटे लोहिया(बाद के दिनों में तो वह इस नाम के साथ उर्फ जनेश्वर हो चुके थे, अपनी अलग शिनाख्त से नहीं पूरी तरह लोहिया के लोग होकर) के कभी के लोगों को आप भूल नहीं गये। उनका यह व्यक्तित्व, उनका अपना ही अनुसंधान या खुद की डिस्कवरी था, जो लोगों को अपना नहीं, लोहिया का कायल बना देने वाला था। शुक्रवार की दोपहर तकरीबन 12 बजे यहां खासी बदली थी और बहुत अवसाद का बहुत नम, तकरीबन अंधेरा। उसी समय अपने समूह के संपादकीय तादाद ताकत (मानव संसाधन) के प्रधान उपेन्द्र पांडेय हम सब के साथ बैठक कर रहे थे। मेरा मोबाइल चुप(साइलेंट मोड में) था लेकिन सामने की गोल मेज पर छटपटा उठा। लखनऊ से मनोज श्रीवास्तव थे और बाहर निकल कर मैंने तो एक तारा गिरते पहले सुना और देख भी लिया। जनेश्वर जी नहीं रहे। जाने कितनी चीजें एक साथ चमक/ कौंध गयी थीं दिमाग में और उड़ भी गयीं फिर लौट आने के लिए। मैंने अपने साथी और अखबार के एक कंटेंट इंजीनियर शशिभूषण को तुरत फोन किया और लगा कि बातचीत करते-करते उसकी आवाज भरभरा गयी थी। शशिभूषण दिल्ली से लौटते हुए कोहरे में ट्रेन की सुस्त चाल से 15 घंटे बाद अभी कानपुर ही पहुंच सका था। सत्तर के दशक की वह अधपकी राजनीतिक समझ और भावुक सक्रियता याद आती है जब समाजवादी युवजन सभा मेरे लिए भी आवेश का मंच था। 1977 में मैं दिल्ली (33 नार्थ एवेन्यू) में बहुत हर दिल अजीज समाजवादी, उग्रसेन उर्फ मास्टर साहब – मरने के बाद सचमुच जिनके पास से ‘चंद तस्वीरें बुतां चंद हसीनों के खतूत’ ही तो निकले थे और पुरुष संतति उनकी हमीं लोग (धर्मराज और रामायण शुक्ल याद आ रहे हैं) थे, के साथ उनकी चिठ्ठियां लिखा करता था। किशन पटनायक, मधु लिमये, मधु दंडवते, जार्ज फर्नाण्डीज, जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी और मोहन सिंह से मेरी मुलाकात मास्टर साहब ने ही करायी और उन लोगों को यह बता दिया था कि बच्चे में बहुत आग है। यह तगमा बहुत दिनों तक अपनी छाती पर टांगे घूमता भी रहा लेकिन पिताजी की बात मान कर वकालत करने लगा था और उसके पांच साल बाद पत्रकारिता में आ गया। तब उम्र 36 की थी। कोलकाता और बाद में बिहार रहने के दौरान- कह सकते हैं कुछ लोगों का ही असर रहा होगा, मैं धीरे- धीरे वाम रुझान का होता गया और निजी तौर पर यानि प्राइवेट लेफ्टिस्ट होता चला गया हूं। इसीलिए मैंने 1977 की अपनी राजनीतिक समझ को अधकचरी कहा है। कल शायद यह भी कुछ मायनों में कठमुल्ला ख्याल लगे, नहीं कह सकता लेकिन आदमी और आदमी के बीच मोहब्बत और उसकी गरिमा को किसी संहिता में ढाल कर पलटन बना देने वाले लोगों से तो लड़ाई हमेशा बनी रहेगी- यह तय है। बहरहाल जनेश्वर जी बहुत याद आ रहे हैं। उनकी डांट, उनकी नाराजगी और उनका प्यार भी। अभी बस पिछले साल दिल्ली में उनके आवास पर जाकर उनसे मिला था। सामने की कुर्सी पर एक दुग्ध धवल सा हिम शिखर- जो मेरी सारी शिकायतें चुप आंख मूदें सुनता रहा। मन में चिढ़ भी पैदा होती थी कि मैं सुना नहीं जा रहा हूं। और एक शातिर मौन मेरी बातें मेरी ही ओर उछाल दे रहा है। अच्छा अब चलता हूं- जैसे ही मैंने कहा युगों का वैषम्य समेटे पलकें बहुत कुछ समझने की खिड़की सी चट खुलीं और उन्होंने कहा- खाना खाया है कि नहीं, नेरूला से मंगा दे रहा हूं। क्या खाओगे? मैं कहता- लकठा। और यह सुनकर वह हंस पड़ते थे। लकठा शायद आप न जानते हो। यह बेसन की तकरीबन उंगली भर मोटी गुड़ में पकायी देसी मिठाई होती है। और मुझे याद आता है चन्द्रशेखर जी की सरकार के रेलमंत्री जनेश्वर जी एक बार काफिले के साथ कहीं जा रहे थे- उनके साथ मैं भी था, रास्ते में लकठा बेचने वाला ठेला दिखा और उन्होंने गाड़ी रुकवा दी। शायद किलो भर लिया होगा। याद आता है। मैं उनके सामने बैठा हूं। अवांतर प्रसंग समाजवादी आंदोलन को कथा कोलाज बनाते गये हैं उनकी खुली आंखों में और तब एहसास हुआ कि बंद आंखें तो किस्सा सुना रहीं थीं। छोटे लोहिया, एक अच्छे किस्सागो भी थे और तमाम कहानियों में कभी सामने तो कभी पीछे। हालांकि समाजवादी पार्टी में अंतिम दिन उनके लिए बहुत ठीक नहीं थे। राजनीति में आने के विशिष्ट लाउंज में बैठे अभिनेताओं और पूंजी के हक में मेमोरैण्डम आफ अंडरस्टैंडिंग की राजनीति करने वाले एकाध एजेंटों ने उन्हें किनारे करने की खूब कोशिश की। लेकिन मुलायम सिंह के लिए वह पार्टी में आइडियोलाजिकल फेस थे। वह अपने लोगों को डांटते थे और लेन- देन के दावों से दूर थे। तमाम नेताओं की तरह पत्रकारों को आबलाइज्ड भी नहीं करते थे न लोगों को उनसे यह उम्मीद थी। फिर भी लोग उनसे भावात्मक स्तर पर जुड़ जाते थे। उनका यही व्यक्तित्व एक सचेत राजनीतिक समाज (पोलिटिकल सोसाइटी) की संरचना का उत्प्रेरक था। कार्यकर्ता बनते थे और लाइक माइडेंड लोगों की जमात तैयार होती रहती थी। कोई व्यक्ति कैसे खुद ही एक राजनीतिक अभियान हो जाता है क्या मुलायम सिंह यादव या लालू प्रसाद उनसे सीख सकेंगे। विष्णु जी, जनेश्वर जी की याद से ही सही अब लिखना शुरू कर रहा हूं। जनेश्वर जी पर ही अभी और लिखना है। पढि़येगा इसलिए कि ऐसे किसी आदमी का गुजर जाना कंप्यूटर ऑफ हो जाना नहीं है। और दूसरी बात यह कि आदमी को समझ सकेंगे तभी विचार भी बनेंगे और आख्यान भी- आदमी और उसके बहाने समय का रेखांकन ही अपने समय का सर्वाधिक सशक्त कंटेट भी है और नरेशन भी है।…….

    Winter के द्वारा
    May 25, 2011

    IMHO you’ve got the right anwesr!

विजय त्रिपाठी के द्वारा
January 24, 2010

क्या समाजवादी जनेश्वर मिश्र जिंदा थे?? भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

V. RAI- AZM के द्वारा
January 24, 2010

जनेश्‍वर जी वाकई बहुतों के गाडफादर थे। उनके निधन से न जाने कितने लोग अनाथ हो गये हैं। बहुत मर्म स्‍पर्शी आलेख।

Pradeep Agnihotri के द्वारा
January 24, 2010

जनेश्वर जी से मुलाकात तीन बार हुई। दो बार समाजवादी पार्टी के कार्यक्रमों में और एक बार फीरोजाबाद में हुई ट्रेन दुर्घटना के मौके पर। दुर्भाग्य से जिस समाजवादी से मिलने को मैं उत्सुक था, वह सपा के विरोधाभासी माहौल में खुद उलझा मिला। कुछ वैसे ही, जैसे कि कपिलदेव सिंह, कल्याण जैन और किरणमय नंदा मिले थे।…खैर। महान व्यक्तियों की सूची में कोई यूं ही दर्ज नहीं हो जाता, मृत्यु के बाद कोई यूं ही याद नहीं किया जाता। निश्चित ही जनेश्वर जी महान थे, अपने समकालीनों में काफी ऊंचे। मौलिक लेखन व्यक्ति के दिमागी स्तर को प्रदशिर्त करता है। वह अंदर आकार ले रही बहुत सी चीजों की भी चुगली कर देता है। पत्रकारिता जगत के कई बड़े नामों की मौलिकता जब विद्रुप हो चुकी हो, तब लेखनी उठाने के लिए बधाई। बधाई निरंतर उम्दा हो रहे लेखन, लय पाने और विचार प्रवाह के लिए। धन्यवाद।

मदन मोहन सिंह के द्वारा
January 23, 2010

जनेसर बाबा गए, बलिया ”राष्‍ट्र” से समाजवाद का आखिरी अध्‍याय खत्‍म हो गया। हमारे गांव सुरेमनपुर (बलिया) के पूजन भइया ( तिवारी) के यहां जनेसर बाबा ददिहाल था, इसलिए हम लोग उनको कुछ ज्‍यादा करीबी महसूस करते रहे, चंद्रशेखरजी से ज्‍यादा करीबी।एक बार हमारे गांधी चबूतरा पर छोटे लोहिया आए भी थे, तब हम लोग बहुत छोटे थे। सिर्फ यही जानते थे कोई बड़का नेता आए हैं। तब की शक्‍ल अब भी याद है। बलिया की शान बगावत है तो समझो की हम बागी है कि तर्ज पर जिंदगी भर वह लड़ते रहे। उनका आखिरी संघर्ष समाजवादियों को राह दिखाएगा, यही हमारी कामना है। ईश्‍वर जनेश्‍वर जी की आत्‍मा को वृंदावनवास दें। जय बलिया, जय भृगु क्षेत्र, जय जनेश्‍वर-चंद्रशेखर।

    Rileigh के द्वारा
    May 25, 2011

    Great cmoomn sense here. Wish I’d thought of that.

नीरज वशिष्‍ठ के द्वारा
January 23, 2010

जनेश्वहर जी के बारे में पहली बार जाना, इससे पहले उनके बारे में सिर्फ इतना पता था कि उन्हेंह छोटे लोहिया कहा जाता है। पढ़ने का अहसास इतना आनंददायक रहा कि इस दौरान जानेश्वुर बाबू की छवि मेरे मानस पटल पर उभर आई। ओझा जी के बारे में भी नई जानकारी हासिल हुई।

Anand Rai- jagran, gorakhpur के द्वारा
January 23, 2010

जनेश्‍वर जी के निधन की खबर सुनकर मन भर आया। मुझे लगता है कि राजनीति में वे अकेले ऐसे शूरमा थे जिनके पराक्रम का अहसास सबको था। जनेश्‍वर जी को कई बार कवर करने का मौका मिला। मैंने तो यही महसूस किया कि वे छोटे बडे सबको महत्‍व देते थे और किसी गलत बात पर जिस तरह रियेक्‍ट करते थे उससे उनके अंदर की ताकत झलकती थी। उनके मन की ताकत आसमान से ऊंची और समुद्र से गहरी थी। भाई साहब आपने सच लिखा कि जिन दिनों जनेश्वर जी समाजवादी युवजन सभा के कर्ताधर्ता थे, नई पौध विकसित करने की चलती-फिरती नर्सरी थी।


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