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लो फिर वसंत आई... या आया (2)

Posted On: 9 Feb, 2010 Others में

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नाइनटीन सिक्सटी नाइन की वसंत पंचमी। अवस्था पूरे चार साल आठ महीने। जिंदगी का खास दिन है। खास दिन का माहौल तो हफ्ते भर से ही बना है। बालमन हिलोरें ले रहा है। मकान नंबर 86/323, देव नगर, कानपुर की सुबह आज कुछ जल्दी हो चली। अम्मा ने आज कुछ खास तरीके से धोया (अम्मा हमें जो नहलाती थीं, वो धोने-पछाड़ने सरीखे होता था, ये प्रसंग काफी आगे)। ब़ड़ी दिद्दा (दीदी) ने ठीक से पोंछा-रगड़ा और छोटी दिद्दा ने ठह के संवारा, पीले रंग में रंगा कुर्ता और चूड़ीदार पायजामा, उसके ऊपर पीली सदरी या जैकेट, जिसे बड़ी दिद्दा ने ऊषा सिलाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान प्रोजेक्ट के तहत सिला था, सिर पर टोपी, खरखराती हुई अंगुलियों से आंखों में काजल और माथे के कोने पर तीन टिकुली यानी अनखन, जिसके बाद नजर लगने की कतई गुंजायश न रह जाए। आज नाम के अनुरूप पूर्ण पीतांबरधारी थे। पूज्य बाबा ने नीचे बुलाया, उनके पांव छुए (प्रातकाल उठि कै रघुनाथा, मातु-पिता गुरु नावहिं माथा की व्यवस्था के तहत रोज बाबा के चरण स्पर्श का नियम था)। उन्होंने आपाद मस्तक देखा, मुस्कुराये, हल्की सी चपत लगायी, असीस दी। बाबा की बैठक में उनके साथ बैठे रहे। इंतजार हो रहा था, मुड़िया मास्टर का। आचार्य पंडित गंगा सागर अवस्थी उर्फ मुड़िया मास्टर। छोटकी बुआ यानी बुआ नंबर तीन के श्वसुर, जिन्हें हम बाबा कहते थे। कानपुर के मुड़िया लिपि या भाषा (मैं विश्वस्त नहीं हूं कि इसे लिपि कहें या भाषा) के यशस्वी कीर्तिलब्ध आचार्य थे वो। आढ़तों-व्यापारिक प्रतिष्टानों में उन दिनों लाल कपड़े की जिल्द चढ़े बहीखातों में सारे लेनदेन मुड़िया लिपि में ही दर्ज होते थे, हुंडियां (प्रामिसिरी नोट) और तगादे की चिट्ठियां (तकादे, तकाजे) भी इसी लिपि या भाषा में लिखी जाती थीं। हूलागंज, नयागंज, बिरहाना रोड, नौघड़ा, जनरल गंज, धनकुट्टी, शक्कर पट्टी, कलक्टरगंज, कोपरगंज, मनीराम बगिया, लाठी मोहाल होते हुए हालसी रोड तक मुडिया मास्टर के शिष्यों की सुदीर्घ श्रृंखला थी। खासकर मारवाड़ी और ओमर-दोसर वैश्य समाज के बीच उनका खासा सम्मान था, आदर था। बताते हैं कि वो अपने शिष्यों को फर्म के नाम से बुलाते थे, प्रत्येक फर्म उनके लिए कांस्टीट्वेंसी थी (जैसे एनडी तिवारी बतौर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश विधानसभा में सदस्यों को नाम से नहीं बल्कि माननीय सदस्य फलां विधानसभा क्षेत्र के नाम से पुकारते थे।)। आढ़तों में आम तौर पर मुनीमत (बहीखाता दर्ज करने या लिखने वाले) करने वाले लोग ब्राह्मण होते थे। मुड़िया मास्टर की शिष्य मंडली में सभी थे। मुनीमत को व्यवसाय के तौर पर लक्ष्य साध चुके ब्राह्मण बटुक और भविष्य में अपनी आढ़त या व्यापारिक प्रतिष्ठान के संचालन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिसंख्य वैश्य युवा। उनके शिष्यों (लेकिन मुड़िया सीखने वालों में नहीं) की अपार संपदा में आज मैं भी एक घटक या अणु के तौर पर शामिल होने जा रहा था। दरअसल वो मेरी पाटी पुजाने के लिए आने वाले थे। आज विद्यारंभ संस्कार था। जीवन पथ पर ये अकादमिक वसंत की घड़ी थी। एक जातक के जीवन चक्र में ककहरा (अक्षर ज्ञान) की नई कोपल कुहुकने को थी। हम औपचारिक तौर पर सारस्वत होने वाले थे, कथित तौर पर ही सही सरस्वती के अर्चक, साधक।

वो आ गए। आज वो भी पीतांबरी थे। इकहरा बदन, टिपिकल ऐनक, हमेशा की तरह कांधे पर झोला और हाथ में छड़ी की मुद्रा में छाता। उनके छाते की गतिविधि एक खास रिदम, लय में होती थी। वो जब चलते तो पहले दाहिने हाथ की चारो अंगुलियों में छाते की मूठ को बैलेंस करते, अंगूठे से पकड़ साधते। इसके बाद छाता तीसरे पांव की भूमिका में आ जाता। एक कदम बढ़ता तो छाता आगे की सीध में ऊपर आते हुए शरीर से नब्बे अंश का कोण बनाता। दूसरे कदम में जीरो अंश के कोण में जमीन को स्पर्श भर करता और तीसरे कदम में पीछे जाते हुए लगभग एक सौ तीस या पैंतालीस अंश का कोण बनाते हुए, फिर धरती, फिर आगे। लय और ताल की कसौटी पर शरीर और छाता एकात्म हो जाते। शेष उनकी वास्तविक मुखाकृति के बारे में स्मरणशक्ति जवाब दे रही है। बाबा ने अपने समधी की आदरपूर्ण अगवानी की, हमने आशीर्वाद लिया। ऊपर जाकर संदेश पहुंचाया, बाबा (मुड़िया मास्टर) आ गए। संयोग से उन दिनों गांव से अजिया (दादी) और बड़ी अम्मा (ताई, वैसे बड़ी अम्मा वो भी होती हैं, जब पिता एकाधिक विवाह करें तो उनकी वरिष्ठ पत्नी। गांव-जवार में हमारी पीढ़ी तक ताऊ या ताई संबोधन नहीं पहुंचा था, सो बड़ी अम्मा को काकी भी कहते थे। पिता जी की बड़ी अम्मा या काकी हमारे लिए ककाइन अजिया होती थीं।) भी आई हुई थीं। आगत बाबा के स्वागत में अजिया जुट गईं। उनके वो रियल मान्यदान थे, बिटिया के श्वसुर यानी आदरणीय समधी। बाबा की मौजूदगी में जलपान के लिए अनिवार्य नियत छोटी सी कटोरी (इसकी भी एक कहानी है) में चीनी के चार छोटे से बताशे, लोटे में पानी और अलग से गिलास। बाद में अतिरिक्त नाश्ते के तौर पर बताशे से खाली हुई कटोरी में कोई आधा दर्जन फुलौरी (बेसन की पकौड़ी, जो कढ़ी में डाली जाती थी। जब भी कढ़ी बनती तो बोनस में सबको अलग से गर्मागर्म फुलौरियां पहले ही मिल जाती थीं।) दोनो बाबाओं के बीच कुछ औपचारिक वार्तालाप (हमारे बाबा न तो किसी से ज्यादा बातें करते थे और उनका व्यक्तित्व भी ऐसा था कि लोग उनसे ज्यादा बातें करने का साहस नहीं जुटा पाते थे।) और ऊपर से संदेशा आया कि दोनो लोगों को छत पर ले आया जाए।

धूप लकलक खिली हुई थी। टसर के सिल्क के एक रंग जैसी। मौसम के मौजूं सिल्क जैसी ही मुलायम लेकिन कलफ ऐसी कि ईशान कोण से मुखातिब हों तो थोड़ी सी चुभती हुई। जब खारिश लिए हुए फगुनहट फरफराये तो धूप सुहाये भी। ऐसी फगुनहट कि थोड़ी सी सर्दियाए तो बगैर रोयें (रोम) खड़े हुए रोमांच हो जाए। आसपास की छतों पर वासंती गहमागमही थी। होली की तैयारियों में नए आलू के चिप्स और नए चावल के पापड़ बन रहे थे, सूख रहे थे। पड़ोस की एक छत पर इस साल की पापड़ प्रक्रिया कुछ खास थी। पड़ोसी की बिटिया की शादी के बाद का पहला होलिकोत्सव जो था। सो बिटिया की ससुराल होली का बायन भी जाना था। पापड़ों की निर्माण कला में इनोवेशन की भरपूर संभावनाएं उड़ेली जा रही थीं। तरह-तरह के आकार वाले पापड़, पान के आकार वाले भी, तब पान का आकार दिल का प्रतीक समझा जाता था। ये आकार उन रसीले जीजा के लिए था जो शादी के बाद पहली बार होली खेलने ससुराल आने वाले थे। आलू या चावल के भर्ता (पेस्ट) के लंबे-लंबे सेव (दीर्घसूत्र, सेवंई को संस्कृत में दीर्घसूत्र ही कहते हैं शायद) निकाले जाते, फिर उनसे प्लास्टिक की पन्नी के कैनवस पर अल्फाबेट्स के अक्षर गढ़े जाते, जैसे SURESH या RANNO DEVI, हो सकता है कि ये होली में आने वाले जीजा जी का नाम हो या उन समधिन का, जिनके लिए बायन में अलग से टिपरिया जाने वाली है। कल्पना कीजिये कि ये अल्फाबेटिकल सेवनुमा पापड़ जब कड़ाही में गर्म तेल में तले जाते होंगे तो अपने नमकीन नाम को तलते हुए समधिन कैसे आल्हादित होती होंगी और खाते हुए किस तरह के चटखारे लेती होंगी। कुछ और छतों पर लाल-हरी भरवां मिर्च के ताजे अचार से भरे मर्तबान धूप दिखाये जा रहे थे। मूली, गोभी, गाजर और आंवले के कतरे नमक मिली कुटी हुई सरसों में बसाये जा रहे थे। पल-पल हवा कानों में खुसफुसाहट करती, उसकी खुश्क सर्द तासीर थरथरा भर देती, उसके साथ आई खट्टापन लिए हुए सरसों की झार नाक में पड़ोस की गतिविधियों की चुगली करके सड़क पार कर जाती, रायपुरवा चौकी (जो संभवतः 1971 में थाना बना) की तरफ। छतों के पिछले हिस्सों में गाय के गोबर के बल्ले भी पाथे जा रहे थे। अलग-अलग आकार-प्रकार के, उनमें बस एक समानता होती कि आकार को अंतिम रूप देने के बाद बीच में बड़े (दही बड़ा वाला बड़ा, DONUT) की तरह मध्यमा (अंगुली) से एक गोल छेद बना दिया जाता ताकि उन्हें सूखने के बाद बान (बांस की पतली रस्सी, जिससे खटिया भी बुनी जाती है) में पुहा जा सके। इन बल्लों की मालाएं होलिका दहन के दौरान होलिका को समर्पित की जाती थीं और एक माला बचा कर मोहल्ले के किन्हीं दलित बंधु से बदल कर उनसे होली (गले) मिला जाता। ये जिम्मेदारी भाई साहब और भाई जी की थी, जिसका निर्वाह करते हुए वो लोग हर साल मुंह बनाते, कभी-कभी तो आपस में मशविरा करके ‘फ्राड’ भी कर लेते। सांस्कृतिक अनुष्ठान के तहत सार्वजनिक होलिका दहन के बाद घर के आंगन में जो होली जलती, वो उन्हीं दलित बंधु के बल्लों से ही जलती, जो बदल कर घर लाई जाती थी।

लेकिन आज हमारी छत कुछ ज्यादा ही खास थी। अंग्रेजी के एल (L) का आकार बनातीं तीन आसंदी बिछी हुई थीं। दो संपार्श्व में और एक विषम पार्श्व में। नीचे कुशासन और उसके ऊपर ऊन का आसन। ये तथाकथित उन (कैशमिलान) के आसन अम्मा ने क्रोशिया से बुने थे, काले और पीले रंग के कांबिनेशन के साथ। आसंदियों के समक्ष अम्मा के द्वारा आटे से पूरा (आलेपित या चौक पूरना) हुआ चौक, चौक के बीच में रखा कलश। कलश में भरा हुआ गंगाजल। कलश का मुंह आम्रपत्रों से ढका हुआ, उसके ऊपर दीपदान। कलश से सटी हुई गौरा-पार्वती (मिट्टी के पांच टुकड़े, पहले चार संयोजित कर दिये जाते, पांचवां उनके ऊपर रख दिया जाता, पांचों पर सिंदूर की टिकुली, जिन्हें शायद गौरा-पार्वती कहा जाता)। उसके बगल में ईंटों से टिकाई गई वीणा बजातीं सरस्वती जी की फोटो (इन सरस्वती जी का चेहरा सविता दिद्दा से बहुत मिलता था। अक्सर मैं दोनो का आनुपातिक अध्ययन करता था। ये चित्र किन्हीं भगवान नामक कलाकार ने बनाया था, जिनका हस्तलिखित नाम फोटो के दाहिने कोने पर नीचे लिखा हुआ था।)। फोटो पर माला और समक्ष रखे हुए अमरूद में खुंसी हुई धूपबत्तियां। संपार्श्व आसंदियों पर हम और बाबा (मुड़िया मास्टर) अगल-बगल बैठे। हमारे बाबा विषम पार्श्व वाली आसंदी पर। सामने पल्ली (गेहूं या चीनी के जूट के बोरों को जोड़ कर बनाई गई एक तरह की दरी या बड़ा आसन) पर बैठी हुईं अजिया और बड़ी अम्मा, और भी बाकी लोग। बाबा (मुड़िया मास्टर) ने कुछ श्लोक बोलते हुए हमारे रोचना (तिलक) लगाया, फिर कुछ श्लोक हमसे दोहरवाये। उन्हें भाई जी ने एक नई पाटी सौंपी। आम की लकड़ी की ये पाटी आरा मशीन वाले बाबू राम तिवारी के यहां से खास तौर पर बनवाई गई थी। लगभग पांच इंच चौड़ी और नौ इंच लंबी। ऊपर कलात्मक मुठिया। उन्होंने पाटी पर रोचने से ही सतिया (स्वास्तिक) बनाई। उस पर अक्षत और गेंदा के फूल छिड़के। नन्हें हाथों में बड़े से आकार की खड़िया (चाक मिट्टी) थमाई, जो हमारे हाथ में उसी तरह से थी, जैसे पुलिस पर पथराव के लिए हाथ में थामा गया गुम्मा या अद्धा (ईंट का टुकड़ा)। उन्होंने अपने दाहिने हाथ से हमारे इस हाथ को थाम लिया। इसके बाद बोले चूल्हा, और वैसे ही हाथ थामे खड़िया से पाटी पर सबसे ऊपर कोने में बाईं ओर देखता हुआ चूल्हा (जैसे करवट लेकर लेटा हुआ अंग्रेजी का U) बना दिया। फिर बोले, एक और चूल्हा, इसके बाद उस लेटे हुए U के ठीक नीचे उससे सटा हुआ दूसरा लेटा हुआ चूल्हा बना दिया। फिर बोले, पूंछ, इसके बाद दोनो चूल्हों के पिछले संगम स्थल से एक पूंछ निकाली गई, हनुमान जी की तरह। फिर बोले चंद्रमा, इसके बाद ऊपर लेटे हुए चूल्हे के सिर पर अर्धचंद्र आसीन हो गया। फिर बोले बिंदी, इसके बाद अर्धचंद्र के ऊपर मध्य में एक छोटी सी बिंदी रख दी गई। कहने को खड़िया हमारे हाथों में थी लेकिन (सर्वशक्तिमान या प्रकृति की तरह) रच तो वही रहे थे। हमें आम मनुष्य की तरह ऐसी कोई गलतफहमी नहीं थी कि जो पाटी (नियति) में अभी तक रचा गया है, वो मेरा ही रचा हुआ है। उनके अगले आदेश की प्रतीक्षा में मैंने उनकी तरफ देखा, वो मुस्कुराये, पूछा, बताओ क्या बना? मैं तो पाटी और खड़िया से मोहाविष्ट। लेकिन थोड़ा संभला, पाटी को देखा और जवाब दिया ओम (ओंकार वाला ओम)। वो भी जोर से बोले ओम। उनका अगला आदेश, मुंह ख्वालौ (खोलो), मैने वैसा ही किया और उन्होंने एक छोटा सा शक्कर का बताशा मुंह में डाल दिया, फिर बोले- चलौ सबके पांए (पांव) छुऔ। हुलसित (उल्लसित) अजिया की गौनिहारी (मंगल गीत गायन) की धीमी-धीमी आवाज कानों में पड़ रही थी, बड़ी अम्मा शायद उनका साथ दे रही थीं। इस अवसर पर भी अजिया ने अपने प्रिय स्नेहिल पौत्र को असीस और ईश्वर से शुभकामनाओं के लिए कोई लोकगीत तलाश लिया था। हम विद्यार्थी हो गए। जीवन में एक नए वसंत का आगमन हुआ, जो काम का नहीं साम (हम लोग सामवेदी हैं) का प्रतिनिधि था, नवोत्पत्ति का हरकारा था। सारस्वत साधना का एक ऐसा वासंतिक भावबोध, दायित्वबोध सौंप दिया गया, जिसे संजोते हुए, संवारते हुए न केवल अपने भविष्य के तमाम वसंतों को प्रगति के सोपानों की तरह लक्षित करना था, बल्कि देश-समाज की वासंतिक अभिकल्पना-संरचना में योगदान का ये सांस्कृतिक-परंपरागत परमादेश था, (ये बात अलग है कि हम उसके पालन में कतई खरे नहीं उतरे) सिर्फ पाटी पूजन ही नहीं था ये।

 

 

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121 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

राजेश खिलारी के द्वारा
August 5, 2011

विष्णु त्रिपाठीजी – मैं मुंबई स्थित मोडी लिपी विशेषज्ञ हूँ । आपका वसंत पंचमी का अनुभव बडा सराहनीय है । मै कानपुर में मुडिया लिपी के प्रशिक्षण के संदर्भ में अधिक जानना चाहता हूँ । कृपया इस पर कुछ प्रकाश डालें । धन्यवाद ।

Woods के द्वारा
May 25, 2011

Great common sense here. Wish I’d thohugt of that.

Amit Dehati के द्वारा
December 15, 2010

सर वाकई क्या लेखन किया है आपने .काबिल-ए-तारीफ . अच्छी एव दमदार पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई ! http//amitdehati.jagranjunction.com

ble900 के द्वारा
March 6, 2010

हैलो मेरा नाम याद है आशीर्वाद मैं अपनी प्रोफ़ाइल देखने और जैसे तुम मुझे वापस मेरे निजी ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं soumah.Blessing@yahoo.co.uk) मेरी तस्वीर है और मेरी जानकारी अपने मेल के लिए इंतज़ार कर रहा हूँ धन्यवाद आशीर्वाद Hello my name is miss Blessing i see your profile and like it can you contact me back at my private email(soumah.Blessing@yahoo.co.uk) to have my photo and my details am waiting for your mail thanks Blessing

O.P.Saxena के द्वारा
February 25, 2010

आदरणीय विष्‍णु जी भाषा के लालित्‍य में गुंथा यह शब्‍द चित्र वास्‍तव में अविस्‍मरणीय है। पढ़ते हुए कहीं कहीं अपना बचपन भी याद आता है। खबरों की उठापटक और व्‍यवस्‍तताओं से तपती जिंदगी में एक ठंडी हवा के झोंके सा लगा यह आलेख …..बधाई। अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

atul tiwari के द्वारा
February 20, 2010

वसंत पंचमी का इतना शानदार चित्रण आज तक नहीं पढ़ा। मैं खबर बना रहा था लेकिन बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा ही सही लेकिन उसे पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। पढ़कर कोई भी अपने अतीत की यात्रा कर सकता है। ऐसा लगा कि मैं कुछ पढ़ नहीं देख रहा हूं।

buzzfan के द्वारा
February 18, 2010

मुडिया लिपी ही है कोई भाषा नही. प्राचीन मराठी ग्रंथ इसी मोडी लिपी मे लिखे हुये हैं। यह देवनागरी लिपी का एक अच्छा पर्याय है। इसमे लिखते समय कलम उठाकर लिखने की जरूरत नही पडती। जब पेशवा विठुर मे आये थे तभी से मराठोंके साथ आर्थिक व्यवहार इसी लिपी मे हुआ करता है। इस लिपी मे मराठी संस्कृत-हिन्दी-नेपाली के कई ग्रंथ हस्तलिखित स्वरूप मे उपलब्ध है।

    LUIZA के द्वारा
    March 15, 2010

    ाेूदह सोगे जाी्ग्ो लाेूो जोुगलो ्द ौहा माुद ास ूगीदूागद कककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककककक\"Ola ोसगुद é um Anjo        ♥          ♥   ♥ Que está sempre ao nosso lado        ♥          ♥ ♥ Mesmo que na distância.        ♥    ♥       ♥ ♥ É aquele que compartilha nossas alegrias  ♥   ♥ E minimiza nossas tristezas.♥    ♥        ♥          ♥ ♥ É aquele que se cala nas horas certas♥   ♥         ♥ ♥ E dentro desse silêncio nos diz tudo…♥     ♥        ♥     ♥ ♥        ♥          ♥ ♥ Amigos, não são    ♥                ♥         ♥ ♥ aqueles que estão     ♥      ♥ do nosso lado, mas           ♥         ♥ ♥ sim aqueles que       ♥           ♥         ♥ ♥ quando prescisamos      ♥            ♥ ♥ de sua ajuda nos     ♥         ♥         ♥ ♥ dizem: CONTA COMIGO ♥Conte comigo sempre!!!♥ कक

Rohit Sharma के द्वारा
February 18, 2010

test

    Elly के द्वारा
    May 25, 2011

    Kewl you should come up with that. Excellnet!

shyamendra kushwaha के द्वारा
February 17, 2010

आदरणीय बडे़ भैया सादर प्रणाम, बहुत बढि़या। सच बताऊं! दिल बाग-बाग हो गया। आज भागदौड़ की जिंदगी में एकल परिवार के बीच बच्चे रिश्ते-नातों को न तो सही ढंग से समझ पाते हैं और न ही अपने धर्म व संस्कृति को। ऐसे में संयुक्त परिवारों का होना जरूरी लगने लगता है। सच, आपने अपनी यादों के झरोखे से ऐसी माला पिरोई है, जिसका एक भी मोती बिखरने नहीं पाया।

shyamendra kushwaha के द्वारा
February 17, 2010

आदरणीय बडे़ भैया सादर प्रणाम, बहुत बढि़या। सच बताऊं! दिल बाग-बाग हो गया। आज भागदौड़ की जिंदगी में एकल परिवार के बीच बच्चे रिश्ते-नातों को न तो सही ढंग से समझ पाते हैं और न ही अपने धर्म व संस्कृति को। ऐसे में संयुक्त परिवारों का होना जरूरी लगने लगता है। सच, आपने अपनी यादों के झरोखे से ऐसी माला पिरोई है, जिसका एक भी मोती बिखरने

    Bubby के द्वारा
    May 25, 2011

    You’ve hit the ball out the park! Incrdebile!

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 15, 2010

very nice regards

sumit rana के द्वारा
February 13, 2010

69 men aap lagbhag 5 sal ke ho gaye the, ab yani 45 paar kar 50 ko chhune men lage hain. par foto apki ……..bhagwan apko banaye rakhen, aise hi. .

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 13, 2010

ेि् कल पंडित विद्यानिवास मिश्र की ५वी पुण्यतिथि है. उन्हें याद करते हुए कुछ लिखने की तैयारी में हूँ. उनका एक निबंध है – बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं…बसंत के प्रति लोगों के नैराश्य पर वे बहुत चिंतित रहते थे. आपने जिस तरह बसंत को सजीव किया है, उससे मुझे लग रहा है कि पंडित जी को सच्ची श्रद्धांजलि मिली है. उनके निबंधों की तरह ही बिलकुल सहज भाव में बहते हुए आपके शब्द अनायास ही मन में गूजने लगे इसलिए मैं यहाँ दुबारा प्रतिक्रिया करने से खुद को रोक नहीं पाया.

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 13, 2010

कल पंडित विद्यानिवास मिश्र की ५वी पुण्यतिथि है. उन्हें याद करते हुए कुछ लिखने की तैयारी में हूँ. उनका एक निबंध है – बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं…बसंत के प्रति लोगों के नैराश्य पर वे बहुत चिंतित रहते थे. आपने जिस तरह बसंत को सजीव किया है, उससे मुझे लग रहा है कि पंडित जी को सच्ची श्रद्धांजलि मिली है. उनके निबंधों की तरह ही बिलकुल सहज भाव में बहते हुए आपके शब्द अनायास ही मन में गूजने लगे इसलिए मैं यहाँ दुबारा प्रतिक्रिया करने से खुद को रोक नहीं पाया.

Anand के द्वारा
February 13, 2010

fagunahat ki sarsarahat par bhi kuchh ho jaye…

Harikesh Mishra-gorakhapur के द्वारा
February 13, 2010

मंजिल आप जैसे लोगों का ही कदम चूमती है।

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 12, 2010

सरस्वती और गोरा पार्वती का चित्रण साहित्य के जरिये अछा लगा , सादर ,

rajeshsingh के द्वारा
February 12, 2010

very good post

    Elly के द्वारा
    May 25, 2011

    Sonuds great to me BWTHDIK

चंदन के द्वारा
February 12, 2010

आज महाशिवरात्रि है। यह तो भगवान भोलेनाथ का दिन है जिसे रात्रि में तब्‍दील किया गया है। ऐसा क्‍यों कहा जाता है। अगर आप अपने शब्‍दों में इसका वर्णन करते तो बेहतर होता।

चंदन के द्वारा
February 12, 2010

आप ऐसा लिख रहे हैं कि एक साहब की नींद ही गायब है। उनकी नींद आये ऐसा भी कुछ लिखिये।

आनन्‍द कुमार के द्वारा
February 12, 2010

हम विद्यार्थी हो गए। जीवन में एक नए वसंत का आगमन हुआ, जो काम का नहीं साम (हम लोग सामवेदी हैं) का प्रतिनिधि था, नवोत्पत्ति का हरकारा था। सारस्वत साधना का एक ऐसा वासंतिक भावबोध, दायित्वबोध सौंप दिया गया, जिसे संजोते हुए, संवारते हुए न केवल अपने भविष्य के तमाम वसंतों को प्रगति के सोपानों की तरह लक्षित करना था बहुत शानदार लक्ष्‍य आपके सामने है। मंजिल आप जैसे लोगों का ही कदम चूमती है।

harishankar kushvaha के द्वारा
February 12, 2010

बसंत भी आपकी मुट़ठी में और संत भी आपकी मुट़ठी में। मां सरस्‍वती पर तो आपका साधिकार है, ही। बधाई।

ANAND के द्वारा
February 12, 2010

pathkon se samvad ka bhi silsila shuru ho…

kaushal के द्वारा
February 12, 2010

लिखने को बहुत लोग लिखते हैं लेकिन आपकी महिमा कुछ निराली है। यहां ज्‍योंहि आपकी पोस्‍ट चढती रेटिंग बढने लगती है। ज्‍यादा पठित और ज्‍यादा चर्चित स्‍टोरी में आप छा जाते हैं। कम लिखते हैं लेकिन इतना शानदार लिखते कि हर पाठक आपका दीवाना हो जाता है। आप इस स्‍लेट के जरिये अपने पाठकों से संवाद करें तो और बेहतर होगा। गोरखपुर में खासतौर से आपके पाठकों की संख्‍या बढी है। इस माध्‍यम ने आपकी लखनऊ की रिपोर्टों का दौर ताजा कर दिया है। गोरखपुर की ओर से आपको सलाम।

rameshwar pandey के द्वारा
February 12, 2010

अरे क्या कर रहे है आप इतना बढ़िया तो मत लिखिए कि मेरे रातों की नींद उड़ जाये

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 11, 2010

प्रणाम , पढकर बहुत अछा लगा अब जंक्सन पर आने का मन करता है लेखन के प्रति आपने प्रेरणा दिया व् वसंत के सोपानो को भी बताया ,

Vinod Bhardwaj Agra के द्वारा
February 11, 2010

विष्‍णु जी, आपके आलख किस्‍तों में कई बार पढा। भाषा के साथ वोली का मनमोहक प्रयोग देख दिल बाग बाग हो गया। बीच बीच में हिंगलिश और साथि में इंगलिश के इस्‍तेमाल ने इसे आधुनिक भाषा का भी स्‍वरूप दे दिया जिससे यह और ज्‍यादा पठनीय हो गया। मुझे तो कभी लगा कि मैं मुंशी प्रेम चंद को पढ रहा हूं, तो कभी आचार्य चतुरसेन जैसी शैली का अहसास हुआ। बसंत पंचमी पर पटटी पूजन का आपने जो शब्‍द चित्र खींचा- गजब। अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और त्‍यौहारों के महत्‍व को बयां करते आपके आलेख में नयी पढी के सीखने के लिए बहुत कुछ है। मेरी ओर से वधाई ओर साधुवाद। विनोद भारद्वाज, आगरा

    Aslan के द्वारा
    May 25, 2011

    TYVM you’ve sloevd all my problems

"Betaul" के द्वारा
February 11, 2010

पूर्व की तरह ही इस बार भी बहुत अन्दर तक छू गयी ये बातें. अतुल पाण्डेय गाँधी नगर

    LUIZA के द्वारा
    March 15, 2010

    ाह ोसद ेहो जोुगलो

    Latisha के द्वारा
    May 25, 2011

    Now I know who the brinay one is, I’ll keep looking for your posts.

alok srivastava के द्वारा
February 11, 2010

आदरणीय भाई साहब, प्रणाम आप की हिंदी वाक् पटुता व विद्वता का कायल तो तभी हो गया था जब आप ने वाजपेय यज्ञ के बारे में बताते हुए बाजपाई को ठीक कराया था! अब आप की लेखनी का भी कायल हो गया! आप के लेखन में हिंदी का जो माधुर्य व परम्परा का ज्ञान मिलता है उससे आत्मिक तृप्ति हो जाती है! आज कल ऐसा लेखन कम ही देखने को मिलता है! आगे भी ऐसी ही रचनाये पढने को मिलेंगी यही कामना है! आलोक श्रीवास्तव,लखनऊ, जागरण

ashutoshmiahra के द्वारा
February 11, 2010

नमन, पूरा चित्र सनातनी और हमारे संस्‍कारों का है गांवों में जिंदा है लेकिन कोने अंतरे में, शहरी बनावट के आपने, सचमुच अक्षरों से छाप छोडी है, जिस उम्र के पडाव की आंखों से देखे चित्रों को लोक के नाम किया है, उनकी ज्‍योति का जमाना कायल रहेगा ही, सच कह रहा हूं आप ने हमारे गांव से बसन्‍त की चोरी की है, पुन: नमन आशुतोष मिश्र बस्‍ती

    Carlie के द्वारा
    May 25, 2011

    Good point. I hadn’t tuhgoht about it quite that way. :)

rajesh singh के द्वारा
February 11, 2010

सचमुच मन मीठा हो गया। ऐसी यादें बस यादें ही है और जब याद आती है तो जुबान पर बताशा घुल ही जाता है।

अजय शुक्‍ला के द्वारा
February 11, 2010

अब तक आई आपकी चारों पोस्‍ट में मुझे यह सबसे अच्‍छी लगी। विषय के साथ अब शैली का जादू भी दिखने लगा है। …पर बार-बार ब्रेकेट में शब्‍दार्थ देखने से पढ़ने का रिदम टूटता है। बेहतर हो कि कठिन लगने वाले शब्‍दों के अर्थ पोस्‍ट के अंत में दिया करें। यह आपकी पोस्‍ट के पाठक के नाते मेरी डिमांड है… प्रणाम

navneet tripathi gorakhpur के द्वारा
February 10, 2010

जीवन की आपाधापी में छूटती जा रही परंपराओं और उनकी यादों को आपने ताजा कर दिया। आपके संस्‍मरण पढ कर न जाने कब बचपन में बिताये दिनों के पन्‍ने खुल कर आंखों के सामने आ गये। जिसे पढ कर ताजगी महसूस होने लगी। मन प्रसन्‍न हो गया। इस कडी की अगली किस्‍त की प्रतीक्षा रहेगी।

vikrant dubey के द्वारा
February 10, 2010

अब तो ये चीजें सपनें में भी ओझल होती जा रही है, हम लोग तो अब इसकी कल्पना भी नही कर सकते। क्योंकी वो बसंत पंचमी, अब बसंत और पंचमी हो गयी।

ashok choudhary के द्वारा
February 10, 2010

अब तो सबकुछ बिखर रहा है। आपके इस आलेख ने मुझे भी अपने बचपन में पहुंचा दिया। मौसम परिवर्तन वातावरण में ही नहीं घरों में भी पता चलता था। एक तो परिवार बिखरे हुए हैं दूसरे मौसम बदलने का भान भी सिर्फ कैलेण्‍डर से ही होता है। इस बार तो बसंत पंचमी का दिन कोहरे और कंपकपाती ठण्‍ड में गुजरा। स्‍कूलों में भी बच्‍चे नहीं पहुंचे बस अध्‍यापकों और अन्‍य कर्मचारियों ने मां सरस्‍वती के चित्र पर फूल चढ़ाकर रस्‍म अदायगी कर ली। घरो में तो खैर किसी को याद ही नहीं रहा कि बसंत पंचमी है। रीति रिवाज परम्‍परा से तो हम गये ही, मौसम भी दगा दे रहा है। अच्‍छा और छूने वाला आलेख है। मन प्रसन्‍न हो गया। लिखते रहिये हम लोग तो मुरीद हैं ही।

मदन मोहन सिंह के द्वारा
February 10, 2010

काश! कोई फरिश्‍ता दउरी में ढंक कर बायन लाता। कहता- यह लो, इसमें हैं तुम्‍हारे बीते हुए दिन।

upendrapandey gkp के द्वारा
February 10, 2010

सतिया,रोचना,अिजया अौर भी संयुक्त परिवार में इस्तेमाल होने वाले उद्बबोधनों का अापने बेहद रोचक ढंग से इस्तेमाल कर बसंत के बहाने पुरानी यादों को ताजा कर िदया है। हम सब गांवों से जुड़े लोग हैं। जब भी इस तरह की पंकि्तयां पढ़ने को मिलती हैं,पुरानी स्मृितयां ताजी हो जाती हैं अौर अांखें भर अाती हैं। उम्मीद करते हैं िक अागे भी इस तरह के अालेख अापके पढ़ने को िमलते रहेंगे।

ANAND के द्वारा
February 10, 2010

sabke dilon ko apne gudguda diya.. man men nayi urja bhar di.

Arvind kumar bagi के द्वारा
February 10, 2010

वासंतिक अभिकल्‍पना- संरचना, गजबए बहुत अच्‍छा लगा, मन खुश हो गया। बधाई। हमे इस संस्‍मरण की अगली किश्‍तों का भी इंतजार रहेगा।

Anand Madhab के द्वारा
February 10, 2010

बचपन की यादों का बहुत ही सजीव चित्रण है.हमलोग भागलपुर में इसे खल्ली छुवाना कहते थे. बड़ा ही आनंद दायक होते थे वोह पल.

mahesh के द्वारा
February 10, 2010

आपके शब्दचित्र गांव या परिवार के ठेठ माहौल में पहुंचा देते हैं। अदभुत और सुखद। लगता है एक भरे पूरे संयुक्त परिवार के बीच पहुंच गए हैं। बचपन की ऐसी बातें अपने बच्चों को बताने पर वे बहुत हैरानी से पूछते हैं, ऐसा होता था क्या। काश, ऐसा उदाहरण हम अपने बच्चों को दिखा पाते।

    Dolly के द्वारा
    May 25, 2011

    Good point. I hadn’t thughot about it quite that way. :)

विजय त्रिपाठी के द्वारा
February 9, 2010

गजब…..इतना बारीक और विशद शब्दचित्र। चार साल आठ महीने के बच्चे की लगभग चार दशक बाद भी ये स्मरणशक्ति…। यकीन ही नहीं हो रहा है। होरी पर बल्लों की मालाएं बदलने में बड़े भाइयों का फ्राड उजागर करने पर कुटाई के खतरे के मद्देनजर अग्रिम संवेदनाएं। धन्य हैं मुड़ि़या मास्टर….जिन्होंने पाटी पुजाई पूरे शास्त्रोक्त और सांस्कारिक तरीके से कराई कि आज सरस्वती जी आपके की-बोर्ड पर बिराजी हैं। प्रभु करे कि आप औरों के मुड़िया मास्टर बनें…शुभकामनाएं

Somendra के द्वारा
February 9, 2010

आपके लेख अपने आप में पूरे एनसाइक्लोपीडिया होते है. अत्यंत सजीव चित्रण है. आप लिखने में लगे रहिये, हम पढने में लगे रहेंगे. माँ सरस्वती आपको लेखनी को और धन्य करें.आने वाली होली की बधाई.

    Daysia के द्वारा
    May 25, 2011

    Kudos! What a neat way of tinhikng about it.

anshuman के द्वारा
February 9, 2010

अतीत के सागर में सुधियों के रत्‍न और संस्‍कारों के सिंगार पटार के साथ।…. अक्षर ब्रह्म की साधना ऐसे ही शुरु होती थी, पवित्रता, सहजता और लोक संस्‍कार के साथ। मैंने देखा है कि पाटी पूजन में आचार्य जिह्वा पर भी एक अक्षर लिखते थे। शायद ग ….. गणेश वाला ही रहा होगा। … अंशुमान

mahendrakumartripathi के द्वारा
February 9, 2010

सादर प्रणाम, लो आई बसंत का दूसरा अंक पढ़ कर नई उर्जा मिली और प्रेरणा भी मिली यह संग्रहनीय सामग्री है. मेरा अपना विचार है की यह आत्म कथा के साथ लोगो खासकर युवाओ के लिए प्रेरित करने वाला लेख है ,बसंत को आपने अनुभवों में सीरिज में दिया बहुत अच्छा लगा आपका प्रयोग पढ़कर हमें गाँधी जी की आत्म कथा याद आ रही है जो लोकप्रिय हुई, आदर के साथ आपको बधाई महेंद्र कुमार त्रिपाठी ,जागरण ,देवरिया

शंभू दयाल वाजपेयी के द्वारा
February 9, 2010

बहुतों को बचपन ,तीन चार दशक पुराने आचार-व्‍यवहार ,रहन सहन और रिश्‍तों नातों वगैरह बहुत सी बातों की यादों का अत्‍यंत मोहक और सजीव चित्रण1 आज कल के बच्‍चों के लिए किस्‍सा कहानी जिन्‍हों ने वह जमाना जिया है उनके लिए कलेजे से सहेज कर रखने वाली अमूल्‍य यादें- थाती1

Harikesh Mishra-gorakhapur के द्वारा
February 9, 2010

yah jo koshth men likhkar samjhaane ki stayl hai usse lekh padhne me majaa aa raha hai.

    Brandie के द्वारा
    May 25, 2011

    Thanks alot – your answer solved all my porbelms after several days struggling

nizamuddin के द्वारा
February 9, 2010

mera apse parichy nahi hai aur n hi main apke tyohar aur iivaj ko janta hun lekin apki bhasha ne mujhe ek naya ilm bakhsha hai. shukriya.

    Lacey के द्वारा
    May 25, 2011

    Hey, subtle must be your mdilde name. Great post!

कौशल के द्वारा
February 9, 2010

विष्णु जी आपका यह लेख जब पढ़ रहा हूँ तब मौसम बहुत सर्द है लेकिन आपके शब्दों से फगुनहट की सरसराहट महसूस कर रहा हूँ. शुभकामना! आप इस नए दौर में परम्पराओं को सहेज रहे हैं, मेरी तो सलाह है कि आप अपने निबंधों को एक किताब की शक्ल दें और इस पर भी केन्द्रित हों, जैसे जागरण ने आपको इतना यश दिया, वैसे जागरण जंक्शन आपकी किताबों की बुनियाद बन जाएगा. कौशल

sumit rana के द्वारा
February 9, 2010

sir ham logon ke liye to yah vakai naya anubhav hai. apke anubhav se ham sab samriddh ho rahe hain. thanks …

विनय कुमार, गाजीपुर के द्वारा
February 9, 2010

पूर्वांचल के लोग कुछ रिश्तों के लिए जो शब्द उचारते हैं उनमें और कनपुरिया इलाके में कुछ अंतर है. मसलन दिद्दा, अजिया, .. पर इन्हें पढ़कर बड़ा अच्छा लगता है. हम रिश्तों के नए नामों से परिचित होते हैं. आपके इस निबंध से मन ४० साल पीछे चला गया जब हम भी बच्चे थे.. आपने एक माला पिरो दी है बल्कि यूं कहें कि एक तराना छेड़ दिया है जिसकी लय आखिर तक बनी हुई है.

एम के राय के द्वारा
February 9, 2010

आपके लेखों को पढ़ना अपने आपमें एक आनंद है. इनके द्वारा जीवन में क्रांति की पदचाप सुनी जा सकती है. एक बात कहूंगा कि ब्लॉग पर यह जो शुभारम्भ है वह निरंतर चलता रहे.. आपकी व्यस्तता से वाकिफ हूँ. जानता हूँ कि कैसे कैसे ३८यूनिटों पर नजर रखनी पड़ती है, जानता हूँ कि आप कैसी कैसी चिट्ठियाँ लिखते हैं, इसलिए आप अपना यह अभियान हम जैसे पाठकों के लिए जारी रखें. धन्यवाद … एम के राय-

    Bardo के द्वारा
    May 25, 2011

    Fell out of bed feeling down. This has bigrhtened my day!

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 9, 2010

अनुभव पकाता है, अनुभव की धूप पकाती है. अनुभव की पीड़ा पकाती है. अनुभव की थाती पकाती है. वाह …मैं दो बार पढ़ा, याद आया आपका इस ब्लॉग पर पहला लेख आओ अब लिखा जाए. दिन भर की इतनी व्यस्तता के बावजूद जब मैंने आपका दूसरा लेख लो फिर वसंत आई… या आया (1) पढ़ा तब मुझे लगा आपने अपने पहले लेख का फालोअप किया है. वसंत को जिस तरह आपने जीवंत किया और लोगों को एक परम्परा से परिचित कराया उससे तो अविभूत हो गया. लेकिन इस शब्द चित्र को पढ़ते हुए मुझे सबसे पहले आपकी याददाश्त पर गर्व हुआ.. आपने सिर्फ अपना बचपना याद नहीं किया, एक साथ कई पीढ़ियों की परम्परा को याद किया . लगता है अनुभव ने आपको कितना विराट कर दिया है. आपकी कलम अनुभव की जिस राह से गुज़री है, वे सभी रास्ते आपके स्वागत में चार चाँद लगा रहे हैं. हमें आगे भी आपके लेखों का इन्तजार रहेगा. यह कहना नहीं भूल रहा कि आपके आह्वान पर लोग खूब लिख रहे हैं.

Anand Rai, Jagran के द्वारा
February 9, 2010

bahut shandar lekh, bhai sahab maja aa gaya.

    Irene के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow, your post makes mine look feelbe. More power to you!

राजू मिश्र के द्वारा
February 9, 2010

बहुत शानदार शब्‍दचित्र खींचा है…एकदम झाड़े रहो कलेक्‍टरगंज स्‍टाइल में।

manoj के द्वारा
February 9, 2010

विष्णु जी, सचमुच प्रांतीय भाषा का इस तरह प्रयोग कलात्मक है . पोस्ट वाकई मजेदार है और पढ़ने में आनन्द आत है .आगे उम्मीद है कि आप होली के बारे में भी कुछ रोचक लिखेंगे क्योंकि वसंत पंचमी तो बीत चुकी है अब सामने होली खडी है.

    रामधनी द्विवेदी के द्वारा
    February 20, 2010

    बाहर रहने के कारण थोड़ा विलंब से पढ़ पाया। बेहद रोचक,जीवंत और भारतीय संस्‍कृति का दस्‍तावेज लगी यह पोस्‍ट। अब ऐसे संस्‍कार देने की परम्‍परा कम देखने को मिलती है। अबोध बच्‍चे से कितनी आसानी। ऊं को इतनी सुगमता से सिखा देना और उसे रोचक तरीके से प्रस्‍तुत करना बहुत अच्‍छा लगा। बधाई


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