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देख तमासा बुकनू का (2)

Posted On: 3 Apr, 2010 Others में

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छह फरवरी, 1988 का प्रसंग है। दद्दा की बरात बिदा हो के आई। छाबड़ा टूरिस्ट बस सर्विस की खटारा घरघरा के रुकी, तीन बार पों-पों-पों। अगल-बगल के छज्जों-छतों पर दर्शनाभिलाषियों का जमावड़ा। घर में चारो तरफ चहल पहल। एक-एक करके बराती बस से उतरे। मध्य प्रदेशस्थ उदरीय अधैर्य के शिकार छिद्दू बस की खिड़की से फांदे और चौतरा फलांग कर आंगन से होते हुए नारा मुक्त पाजामे को थामे धच्च से पाकिस्तान में दाखिल (शौचालय, जिसे हम लोग यूं तो आमतौर पर टट्टी किंतु मजाक में पाकिस्तान कहते।) । सरहद-ए-सदा यानी गलियारे से गुजरते कई लोगों ने पाकिस्तान के भीतर से सस्ती आतिशबाजी वाले बरसाती राकेट के छोड़ते ही उभरने वाली तरह-तरह की आवाजें महसूस कीं, बीच-बीच में बादल भी गड़गड़ाये। आंदोलित उदर और व्यग्र किंतु आड़ोलित प्रस्थान बिंदु (शरीर के इस भूभाग के बारे में अंदाजा लगाएं) के चलते छिद्दू मग्घे (प्लास्टिक का मग) में पानी भरे बगैर निष्पादन प्रक्रिया में संलग्न हो गए थे। जब उन्होंने अंदर से मिमियाती आवाजों में पानी का आह्वान किया तो चच्चू बड़बड़ाये, मना कर रहै रहन लेकिन सार जौन पाएस धांसत गा, धांसत गा, का बालूसाही औ का सिन्नी, अब झ्यालैं सरऊ। मैदा की लुचुई की तरह लचकीय काया के साथ छिद्दू पाकिस्तान से हांफते हुए बाहर आए। चाची ने अपने लाड़ले के हाथ-पांव धोआए, ऊपर ले गईं और उन्हें गुनगुने पानी के साथ बुकनू फंकाई गई। मध्य प्रदेश की अनियंत्रित हो चुकी कानून व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए त्वरित कार्रवाई बल (रैपिड एक्शन फोर्स) के रूप में बुकनू तो मौजूद ही थी।
देखते-देखते सबके केआरआरए (की रोल रिस्पांसबिलिटीस एरिया) फिक्स हो गए। रामौतार चच्चू बस की छत पर चढ़े, कमले और मुल्लू नीचे सन्नद्ध, एक-एक करके दहेज का सामान उतारा जाने लगा। विभा की अम्मा की दिलचस्पी इसमें थी कि टीवी कलर है या ब्लैक एंड व्हाइट। कटियारिन चाची ने सीधे दद्दा से पूछ लिया, हीरो हांडा नहीं मिली? ज्ञाना बुआ पूजा की थारी और पानी भरी लोटिया ले के बस के गेट पर तैनात। उत्फुल्ल ननदें अपनी सिकुड़ी-सिमटी नई भौजाई को कौरिया के बस से उतार के देहरी तक ले आईं। मंदिर पुजाई हुई और लगे हाथ मड़वा (मंडप) भी सेरवा लिया गया। उधर गौनहरी के बीच बहुरिया की निहारन शुरू हुई औ इधर बुआ नंबर दो, भैया से शिकवा कर रही थीं, तुम तो कहत रहौ कि साफ है, बहुरिया के पायें देखि के तौ लागि रहौ है कि रंग काफी दबो है। भैया ने चश्मा दुरुस्त किया, अंपायर ई रामास्वामी की तरह उनकी अपील इग्नोर कर दी और थर्ड मैन बाउंड्री की तरफ देखने लगे। उन्होंने रामौतार चच्चू को बुलंद आवाज में निर्दश जारी किया जेत्ती डोलची, डलिया, बंसेलिया, भंड़िया औ टेपरिया हैं, सब ऊपर जइहैं। निहारन में मिले तुड़े-मुड़े नोट मुट्ठी में भींचे भौजाई अपने लिए नियत कमरे में दाखिल करा दी गईं। ननदें उनसे बक्से की चाभी मांग रही हैं और वो न देने के लिए चाभी ढ़ूंढ़ने का उपक्रम कर रही हैं। कभी कमरबंद के इर्द गिर्द टटोलती हैं तो कभी हाथ ऊपर लाकर…। बगल में बड़े वाले कमरे में अदालत लगी हुई है। श्वेतकेशी वेटेरन महिला समुदाय आयकर टीम की तरह समधिन की टिपरिया के छिद्रान्वेषण में व्यस्त है। सनील के बटुआ, रामपुरी सरौता, कलकतिया सिंदूरदान, फिरोजी चूड़ियों का ललखऊं डिब्बा, कन्नौज के केव़ड़िया गुलाब पत्ती गट्टा, लकड़ी की नन्हीं-मुन्नी इतरदानी में हिना, चमेली, जबाकुसुम की छोटी-छोटी शीशियां, खपच्ची की पिटरियां, बनारसी लहंगा औ जार्जेट की साड़ी। बुआ ने चाची की चुहल की, भौजी! मुंह दिखाई के बुलउवा मा लहंगा पहिन के नचिहौ ना। किसिम-किसिम की सास बैठी हैं औ चाची सरमा गईं। इसके बाद मृदभाडों की बारी। एक-एक भंड़िया टटोली जाने लगीं। भ़ंड़ियों से आटे की लोई की पैकिंग उतारी जा रही है। भड़ियों पर लिखी गारी (गालियां) पढ़ी जा रही हैं। समधिन ने समधिन के लिए कुछ संदेस भी लिखे हैं और अपनी कल्पना के मुताबिक सिर्फ लहंगा और कंचुकीशुदा समधिन का एक खजुराहोनुमा चित्र भी उकेरा है। चटको अजिया धीरे से बुदबुदाईं, दहिजार। भड़ियों में कसरायन था, बूरा था, नुक्ती थी। आयकर टीम का सर्वे तो खत्म हुआ लेकिन सबके चेहरे, हाव-भाव असंतुष्ट। किसी की नाक तो किसी भौं सिकुड़ी हुई। निंबियाखेरे वाली बुआ से रहा नहीं गया, दौड़ी-दौड़ी बगल वाले कमरे में धंसीं और उलाहना देती हुईं, नवागत वधु से बोलीं, दुलहिन का तुम्हरे हेन बुकनू नहीं खाई जात? दो-तीन और कमेंट हुए, ई गंगापारी, बुकनू खाब का जानैं। हमरे हेन तो धांकरौ (कम बिस्वा वाले कनौजिया) बुकनू खात हैं। बेटे की ससुराल से आई समग्र व्यंजन सामग्री के समूह से बुकनू नामक पदार्थ नदारद था और यही महत्वपूर्ण अहम अभाव समधियाने के संस्कारों की चीरफाड़ का सबब बन गया। बुकनू के अभाव में समधियाना संस्कारहीन साबित हो गया। जाहिर है कि इसके चलते नववधु के भी कुछ नंबर कट गए, जिन्हें दोबारा उपार्जित करने के लिए उसे भविष्य में सासुओं के समक्ष अतिरिक्त उपक्रम करने होंगे। बुकनू न हुई, कैरेक्टर सार्टीफिकेट हो गई।

पंडित दातादीन चिकित्सालय के तनहा स्वयंभू सीएमओ गदाधर मिश्र, बीएएमएस, आयुर्वेद विशारद। जो क्लीनिक के बोर्ड के मुताबिक डाक्टर और अपने मरीजों की जुबान पर बैद जी थे। उनकी अंगूठा छाप पत्नी बैदाइन हो चली थीं और वो भी अपने पति परमेश्वर को बैद जी कहकर ही पुकारती थीं, ये बात अलग है कि वो अकेले में कई बार टोकी जा चुकी थीं, कित्ती बार कहो है तुमते कि डाक्टर साहेब कहो करौ। गदाधर दुबौली थे। निहायक फार्मल मामलों में ठेठ कनौजिया बोलते और मरीज से ठेठ लंठ खड़िहा के बोलते। कुर्सी पर बिछी रुई की गद्दी पर अर्ध वज्रासन, उनका प्रिय बैठासन था। सामने मेज पर मेजपोश के रूप में हैंडलूम का वो कपड़ा जो करघे पर पर्दे के लिए बुना गया था। हेक्टर के स्टेथोस्कोप (आला), स्टार के ब्लड प्रेशर इंस्ट्रूमेंट, स्टील की चम्मचनुमा जीभी (जिसे मरीजों के मुंह में डालकर जीभ का जायजा लिया जाता), प्रभात कंपनी के किरासिन स्टोव और उस पर सिरिंज उबालने के लिए स्टील के टोपिया (भगोना) जैसी उन तमाम सामग्रियों के साथ ही वह मेजपोश भी पंडित दातादीन चिकित्सालय में उद्घाटन समारोह से ही उपस्थित था। इन सभी सामग्रियों पर अवस्था-आयु का असर-अंदाज दिख रहा था। अंदाज नहीं बदला था तो डाक्टर गदाधर मिश्र का। अखबार पढ़ते-पढ़ते वो सामने बांयें-दांयें बिछी लंबवत बेचों पर बैठे बेरोजगार खलिहा अनामंत्रित आमंत्रितों से मुखातिब होते, द्याखौ यो चरन सिंह याकौ दिना पार्लियामेंट नहीं गा लेकिन व्हन जौन पीतर केर पाटी लागि है, ओम्हा जीवनभर खातिर नाम लिखवा लीन्हेस। इंदिरा जी केर माया है, जनता पार्टी वाले सार आपस मा लड़ि-भिड़ि के छिया-बिया (तितर-बितर) हुई गे और ई जौन बड़े भारी किसान नेता हैं, इंदिरा जी की कठपुतरी की नैयां कमर मटका रहे हैं। कांग्रेसी विचारधारा से ओतप्रोत, चुनाव के दौरान गाय-बछड़ा के पोलिंग एजेंट और नेहरू निधनोपरांत उनकी बेटी के अंधभक्त पंडित गदाधर की इच्छा-अपेक्षा के विपरीत कांख से कांखता और सीने से हांफता कोई मरीज दाखिल होता, फिर पंडित गदाधर एफआरसीएस डाक्टर हो जाते।
क्या प्राब्लम है?
मरीज-आयं?
दरअसल वो प्राब्लम का मतलब नहीं समझता था।
क्या दिक्कत है?
मरीज-बैद जी, बुखार तो उतरि गा, अब कान मा सनसनाहटौ नहीं होति, मूड़ पिराबौ (सिरदर्द) कम हुइगा है।
बैद जी- तो व्हाट इज प्राब्लम?
मरीज-जीभ नहीं उतरी, कौनो स्वादै नहीं आवत, जी अरसात है पर कुछौ नीक नहीं लागत।
बैद जी-दरअसल ये एंटीबायटिक का रियेक्शन है। सबके साथ ऐसा ही होता है। थोड़ा गंभीर होते हुए वो बताते, ऐसा करना, कोयले की आंच में नींबू की फांक को धीरे-धीरे सेंकना, उसके बाद फांक के ऊपर बुकनू मलो, फिर उसे इत्मीनान से चाटो। दो-तीन बार करोगे तो टेस्ट लौट आएगा।
..और डाक्टर गदाधर मिश्र का वो फार्मूला आज भी अचूक है। दुनिया भर की तमाम दवा कंपनियों और उनके रिसर्चर्स ने तमाम बीमारियों के नुस्खे तलाश लिए लेकिन बदनतोड़ बुखार या माइग्रेन के बाद की बेस्वादी का बुकनू से बेहतर कोई तोड़ नहीं। मरे हुए स्वाद को जिलाने में बुकनू का कोई जोड़ नहीं। रसना की रसकामना है बुकनू। जिह्वा की जिजीविषा का जंतर है बुकनू। अनुपलब्ध आस्वादन की स्थिति में मुखसंतुष्टि का मंतर है बुकनू। (जारी)



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30 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sudhanshu srivastava के द्वारा
September 6, 2010

सर आज पहली बार पढ़ा….. बहोत खूब लिखते हैं आप

dinesh mishra के द्वारा
July 21, 2010

respected sir, pranam; mainey aapka yah anubhavjanya lekh padha, padh kar man anandit hua. aapke lekh ki sabse achchi bat lagi iski chutili bhasha. iske shabd hi iski jaan hain. deshaj shabdon ke prayog ne pathak ko samvedana ke ganvai dharatal par pahuncha diya hain. vastutah, yah lekh roj marra ke anchal vishesh ki sanskriti ko bhi khas tavajjo deta hai. shahari bhagambhag ke beech apne chute huye, ankahe ateet ki dhundhali yaden jehan me taja ho jati hain. vastav mein yahi yadein jeevan ko samposhit aur prerit karti hain. aap ke is lekh ki shailley bhi jeevan ke dainandin se judi hui jeevan ke sahaj hasya se upaji hain. isiliye pathak ko aarambh se ant tak jode rahati hain. aapka agyakari shisya dinesh mishra

kalyan kumar के द्वारा
May 25, 2010

बेमिसाल बुकनू। पढ़ते-पढ़ते स्वाद भी आ गया। विष्णु जी आपके व्यंग्य लेखन का जवाब नहीं। बहुत दिन बाद ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली। 

अजय शुक्‍ला के द्वारा
April 18, 2010

बडा होकर मैं भी ऐसा ही लिखने की कोशिश करूंगा

kmmishra के द्वारा
April 16, 2010

जबरदस्त व्यंग्य रचना । इतनी की दस्त लग जाये । बुकनू के क्या कहने । रचना की पौष्टिकता में वृद्धि की है इसने । सच्ची भूख बढ़ गयी ।

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
April 11, 2010

शत शत बधाई आपको सुंदर लेखन के लिए, बहुत सुंदर दृश्य प्रस्तुत किया अपने बुकनू के माध्यम से….

विवेक भटनागर के द्वारा
April 8, 2010

आदरणीय विष्णु जी, बुकनू श्रृंखला पढ़कर हतप्रभ हूं। सिद्धहस्त व्यंग्यकार की लेखनी है यह। वह भी गांव के चौपालों पर किस्सागोई में दक्ष लोगों की जुबान जैसी….। हालांकि कुछ प्रश्न उठ रहे हैं- जैसे, वह कौन सा प्राण तत्व है, जो बुकनू को इतना स्वादिस्ट और औषधीय बना देता है (मैंने शहर में बिकने वाला पैक्ड बुकनू भी खाया है, लेकिन उसमें वह मजा नहीं है, जो गांव की चाची के हाथ के बने बुकनू में था), बुकनू का उद्भव और विकास कैसे हुआ होगा। इसका नाम बुकनू ही क्यों रखा गया और कुछ क्यों नहीं। आखिर बुकनू का अर्थ क्या है…  । इन सवालों के जवाब अगले एपीसोड में खोजने का प्रयास कीजिएगा…। एक बार फिर लेखन की शैली के लिए बधाई।

mukesh pandey के द्वारा
April 8, 2010

सर्वोत्‍तम है दशक भर पहले के वैवाहिक उत्‍सव का वर्णन। वैद जी और बकुनू का रिश्‍ते का सी‍नीरियों बेजोड है। गांव की भाषा व घटनायें याद करने के लिए साधुवाद।

mukesh pandey के द्वारा
April 8, 2010

सर्वोत्‍तम है दशक भर पहले के वैवाहिक उत्‍सव का वर्णन। वैद जी और बकुनू का रिश्‍ते का सी‍नीरियों बेजोड है।

govind mishra के द्वारा
April 8, 2010

pakistan se vapas aakar jitna sukun un logo ne mahsus kiya hoga us se kahi adhik ise padh kar main mahsus kar raha hun. maza aa gaya sir…buknu ka koi jawab nahi sach puchiye to jadu hai jadu….pranam

vivek tyagi के द्वारा
April 7, 2010

विष्णुजी, लगता है अब तक आप अपनी प्रतिभा के साथ हस्तमैथुन कर रहे थे। प्रतिभा के पहले संसर्ग के बाद कितना खूबसूरत बुकनू पैदा हुआ है। वाह, क्या खूब, बहुत-बहुत बधाई -विवेक त्यागी

Dr. UPENDRA के द्वारा
April 6, 2010

देखते-देखते सबके केआरआरए (की रोल रिस्पांसबिलिटीस एरिया) फिक्स हो गए। रामौतार चच्चू बस की छत पर चढ़े, कमले और मुल्लू नीचे सन्नद्ध, एक-एक करके दहेज का सामान उतारा जाने लगा। ……श्वेतकेशी वेटेरन महिला…… बुकनू में बिलकुल वही चरपरा स्वाद, वही जिह्वासिंचक अंदाज जो पहली बार सुदेश गौड़ के टिफिन में हमने आपने शेयर किया था। तबसे अब तक कनपुरिया बुकनू का स्वाद जिह्वा तक ही सीमित था। आज दिमाग पर चढ़ गया। और बुकनूमय केआरआरए.. व श्वेतकेशी वेटरन महिला सरीखे प्रयोग। अब तो लगता है ब्लागर बनना ही पड़ेगा। काफी स्वाद आने लगा है

O.P.Saxena के द्वारा
April 6, 2010

विष्‍णु जी, आपके बुकनू में,बुकनू से इतर भी कई स्‍वाद हैं। खास तौर पर टिपिकल कनपुरिया लहजे का स्‍वाद……… मना कर रहै रहन लेकिन सार जौन पाएस धांसत गा, धांसत गा, का बालूसाही औ का सिन्नी, अब झ्यालैं सरऊ। सचमुच मजा आ गया।

Anand Madhab के द्वारा
April 6, 2010

आपकी लेखनी मुझे काका जी कहिन टीवी सीरियल याद दिला गया? शायद आपको भी याद हो दूरदर्शन पर आता था.

Adarsh Pandey के द्वारा
April 6, 2010

बुकनु के कालजयी पराक्रमी वर्णन के लिए शत् शत् बधाई, आने वाली कई पीढियां आपको और आपकी लेखनी के माध्यम से बुकनू को याद करेंगी…..और हो सके तो किसी कनपुरिया मसाले वाले को भी ये लेख और बुकनु की रेसिपी भिजवाइए जिससे वो अगर संभव हो तो बुकनु के भक्तों के लिए कुछ कर सके…और दिल्ली , बंबई भी बुकुनू के महात्म्य को समझ सकें….

Pradeep Agnihotri के द्वारा
April 6, 2010

बुकनू की इस यात्रा में आपने याददाश्त को कहां-कहां घुमाया, काबिले तारीफ है। बहुआयामी लेखन में कई चीजें एकसाथ चलती हैं, वे यहां भी परिलक्षित हो रही हैं। बुकनू बनाने से लेकर उसके गुणों का बखान, उन बहुआयामों में से एक है। आशा है अगली किस्त में भी कुछ ऐसा ही बेहतर पढ़ने-समझने को मिलेगा।

manish के द्वारा
April 5, 2010

भाषा, शैली और विट के मामले में आपके पोस्ट मुझे रागदरबारी की याद दिलाते हैं। बस संदर्भ बदलने की देर है। तो फिर…। एक किताब और क्या। आपने नान फिक्शन भी लिखा तो वह फिक्शन से कम नहीं होगी। ऐसी अपेक्षा इसलिए भी क्योंकि, यदि कोई अपने दिक् काल, सराउंडिंग्स, भाषा, संस्कृति और संस्कारों को इतनी तीव्रता से महसूस कर सकता है, उन पर इतनी तीक्ष्ण और विश्लेषणात्मक नजर रखता है (.यह इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि सेंट्रल डेस्क के अन्य साथियों के साथ मुझे भी आपको सुनने के कई अवसर मिले हैं, बल्कि उनसे कुछ  ज्यादा ही…) तो मैं जानता हूं ऐसी उम्मीद ज्यादती नहीं मानी जाएगी। इस महान बुकनू की महिमा, गरिमा से पहला परिचय आपकी ही पोस्ट से हुआ। इससे पहले मैंने यह शब्द सुना भी नहीं था। कभी इसे खाना चाहूंगा।            

    anil के द्वारा
    April 15, 2010

    भाषा, शैली और विट के मामले में आपके पोस्ट मुझे रागदरबारी की याद दिलाते हैं। बस संदर्भ बदलने की देर है। तो फिर…। एक किताब और क्या। आपने नान फिक्शन भी लिखा तो वह फिक्शन से कम नहीं होगी। ऐसी अपेक्षा इसलिए भी क्योंकि, यदि कोई अपने दिक् काल, सराउंडिंग्स, भाषा, संस्कृति और संस्कारों को इतनी तीव्रता से महसूस कर सकता है, उन पर इतनी तीक्ष्ण और विश्लेषणात्मक नजर रखता है (.यह इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि सेंट्रल डेस्क के अन्य साथियों के साथ मुझे भी आपको सुनने के कई अवसर मिले हैं, बल्कि उनसे कुछ ज्यादा ही…) तो मैं जानता हूं ऐसी उम्मीद ज्यादती नहीं मानी जाएगी। इस महान बुकनू की महिमा, गरिमा से पहला परिचय आपकी ही पोस्ट से हुआ। इससे पहले मैंने यह शब्द सुना भी नहीं था। कभी इसे खाना चाहूंगा। Click here to cancel reply. Name (required) Mail (will not be published) (required) English Hindi Hinglish Security Code: Reset

Alok Tripathi के द्वारा
April 4, 2010

लाजवाब बुकुनू की बेमिसाल किस्सागोई।

pra01 के द्वारा
April 4, 2010

अरे इ बुकनू है का ? काहे सें बनत है तनिक हमें भी तो बताय दो

सत्येंद्र, बरेली के द्वारा
April 4, 2010

अरे वाह, विष्णु जी, आनन्द आ गया। बुकनू तो बहाना उस कालखंड के इतिहास, भूगोल और संस्कृति का आपने हू-ब-हू चित्रण कर किया है। आपका यह शब्द चित्र वाकई काबिले तारीफ है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि बुकनू के बहाने इतनी सारी चीजों पर एक साथ रोशनी डाली जा सकती। दाद देनी होगी आपके यादाश्त को। वाह क्या बात है, जीते बुकनू, मरते बुकनू, देख तमाशा विष्णु का। हां, बुकनू के जिन घटकों का आपने ने पिछली बार जिक्र किया था उसमें मुझे लगा एक घटक छूट गया था और वह था अजिया और नन्नों के स्नेह का पाक। सारी बीमारी, परेशानी और हैरानी की अचूक दवा तो यही है जिससे हम दिन-ब-दिन दूर होते जा रहे हैं। एक बार और आपको बधाई। ऐसे लेखन के लिए जिसे पढ़ने को मन चाहे, जिससे ऊब न हो और जिसे जबरिया न पढ़ना पड़े।

sunil pandey के द्वारा
April 4, 2010

बिकनू काचित्रण मन से सीधे जुड़ने वाला रहा।  मजा आ गया सर।

Ramnath Rajesh के द्वारा
April 3, 2010

सर मजा आ गया। कई मानसिक विकारों को दूर करने में सक्षम है यह बुकनू। लेखन यह अंदाज मानसिक भूख बढाने वाला है। गंवई शब्द कहीं पुरानी यादों को ताजा कर हर स्तर पर तंगी के इस दौर में मेरा दिमागी हाजमा ठीक रखने में सहायक है । बुकनू की अगली खुराक का इंतजार रहेगा। रामनाथ

Vijay Kumar Jha के द्वारा
April 3, 2010

बुकनू का स्‍वाद और मजा शुरू से अंत तक महसूस हो रहा है। साथ में जो टिपिकल पारिवारिक माहौल का जायका है, उसका भी मजा बुकनू से कम नहीं है। दोनों का मेल तो अद्भुत, बेहद लजीज जायका दे रहा है। यह तीसरी कड़ी का मजा लेने की तलब कुछ ज्‍यादा ही बढ़ाने वाला है।

नीरज वशिष्‍ठ के द्वारा
April 3, 2010

काफी मजा आया इसे पढ़कर। शादी के बाद का जो प्रसंग आपने ने यहां पर जिक्र किया है, वह काफी अपने जैसा लगा। हू ब हू यहीं कुछ तो हमने भी देखा है, बारात लौटने के बाद। इसलिए यह प्रसंग मेरा अपना हिस्‍सा लगा, सिर्फ जगह और पात्र अलग हो सकते हैं, कहानी में लेश मात्र भी अंतर  नहीं है।  

Dr. vinta pandey के द्वारा
April 3, 2010

वाह भेया, क्या याद दिलाई है ३२ मसालों वाली अम्मा के हाथ के बने बुकनू की जो पेट के हर रोग की अचूक औषधि थी. कभी सादे पानी से, कभी गुनगुने पानी से, कभी सीधे फाकना है,कभी नीबू के साथ चाटना है , आदि……आदि………मज़ा आ गया.

संजीव मिश्र के द्वारा
April 3, 2010

विष्णु भैया, बिकनू का पांच सितारा चित्रण मन से सीधे जुड़ने वाला रहा। बुकनू सभी तत्वों से सीधे संवाद कराती है, इसमें अब कोई शक नहीं रह गया है। छिद्दू के बहाने सखरेज के शुक्ला जी याद आ गये, जो साइकिल पर शुक्ला छाप बुकनू बेचते हुए “खाओ हर्र, …… पर्र पर्र” नारा लगाते थे। शुक्ला जी की हाजमेदार बुकनू भले ही कभी न खरीदी गयी हो किन्तु उनका यह उद्घोष अचानक मामा आ गये जैसे शब्द मुंह से निकाल देता था। बुकनू, हर्र और पाकिस्तान से आ रही तमाम आवाजों के बीच एक बार फिर बहुत जबर्दस्त बुकनूकरण की बधाई।

VIKAS MISHRA के द्वारा
April 3, 2010

स्वामी कमाल का लिखा है आपने। पहले पहला भाग पढ़ा और अभी दूसरा। लखनऊ में पहली बार बुकनू खाया था। स्वाद आत्मा में बस गया, लेकिन जो बुकनू आपने खिलाया है, उसका स्वाद तो जिंदगी भर चुभलाने से भी नहीं जाएगा। कनपुरिया अंदाज के क्या कहने, कनपुरिया भाषा के साथ आपने साहित्य की हिंदी का जो क्रास करवाया है, उसने बुकनू महात्म्य को और भी सरस बना दिया है। बधाई हो स्वामी।

navneet sharma के द्वारा
April 3, 2010

बुकनू के बहाने लोक की सैर कर चुका हूं। घटनाओं का इतना संवेदनासंपन्‍न और सृजनात्‍मक आख्‍यान अति सुंदर लगा। सबसे बड़ा चिंतनीय पक्ष यह है कि हम लोकपरंपरा के उन पक्षों को बिसराते जा रहे हैं जो अब भी हमारे लिए लाभकारी हो सकते हैं। जगजीत साहब की आवाज में यह शे’र जिन्‍हें नहीं रुलाता वे संवेदनासंपन्‍न नहीं हो सकते : खूब गए परदेस कि अपने दीवार-ओ-दर भूल गए शीशमहल ने ऐसा घेरा, मिट्टी के घर भूल गए       दादी या नानी मां की कहानियां भी आज के दौर में बुकनू हो चली हैं। अपने एक मित्र पूर्ण ‘अहसान’ का शे’र याद आ रहा है : घर से रामायण का रिश्‍ता टूट गया जबसे दादी मां का चश्‍मा टूट गया। आपको बुकनू 2 के लिए बधाई।                           

राजू मिश्र के द्वारा
April 3, 2010

बोलचाल के आमफहम कनपुरिया स्‍टाइल शब्‍दों का बेहतरीन गुलदस्‍ता संजाया है विष्‍णु जी आपने…मजा आ गया।


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