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एक तानाशाह का बुद्धं शरणं गच्छामि (?)

Posted On: 28 Jul, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अखबार में एक फोटो देखा। पहली नजर में किसी धार्मिक अनुष्ठान का लगा। उत्सुकता जगी। कैप्शन यानी फोटो परिचय देखा। पहले तो भरोसा ही नहीं हुआ। दोबारा पढ़ते-पढ़ते मेमोरी बैंक भी एक्टिव हुआ। जो पढ़ा वो भी सच था और फोटो में जो देखा वो तो सच था ही, आखिर फोटो झूठ थोड़े ही बोल सकता है। तभी अपन के व्यवसाय में एक कहावत कही जाती है कि एक फोटो हजार शब्दों के बराबर। दूसरे दिन फिर वैसा ही फोटो देखा, कैप्शन देखा और खबर भी पढ़ी। इसमें भी सच को झुठलाने की कोई गुंजायश नहीं थी, एक फीसदी भी। लेकिन वो सच जो दिख रहा है या था, वो सच लग नहीं रहा है या था। वो पवित्र सच के पवित्र चीवर में लिपटा हुआ एक अपवित्र झूठ लग रहा था, वैसे मैं अभी भी ये कामना कर रहा हूं कि वो सच ही साबित हो, अभी नहीं तो दो दिन बाद ही सही।


भूमिका के बाद कथानक पर आता हूं। दरअसल वो फोटो हमारे एक पड़ोसी सैनिक जनरल का था। वो आजकल हमारे देश के राजकीय अतिथि हैं। जनरल थान श्वे, म्यांमार के सीनियर सैनिक जनरल, सैनिक राज्याध्यक्ष या सच्ची-मुच्ची में पूर्ण सैनिक वर्दी में एक तानाशाह। जिन्हें हम सम्मान से सैनिक शासनाध्यक्ष कहते हैं। फोटोग्राफ्स की लोकेशन थी पहले दिन गया और कुशीनगर, दूसरे दिन सारनाथ। गया जहां तत्कालीन सिद्धार्थ को बोध हुआ, सत्व और सत्य से साक्षात्कार हुआ, जहां राजकुमार सिद्धार्थ, बुद्ध हुए। कुशीनगर, जहां भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को परम प्रवचन देते हुए महानिर्वाण लिया और सारनाथ, जहां उन्होंने पहली बार अपने पांच प्रमुख शिष्यों को उपदेश दिया। उन्हें सत्य का बोध तो गया में हो ही चुका था, सारनाथ में वह गुरुवत हो गए। बहरहाल, अखबारों में छपे फोटोग्राफ्स में दिख रहा था कि वो यानी थान श्वे, सपरिवार, पत्नी, चार पुत्री और एक पुत्र सहित, बौद्ध अर्चना कर रहे हैं। वो नितांत शांतस्थ-ध्यानस्थ दिख रहे थे, उनके अगल-बगल भी लोग उसी मुद्रा में सन्नद्ध थे और कोई बौद्ध भिक्षु कुछ अनुष्ठान जैसा करते दिख रहे थे। ध्यानस्थ मंडली और बौद्ध भिक्षु के बीच में कोई प्रतिमा और मंडप जैसा दिख रहा था, मैं कल्पना कर सकता हूं कि मूर्ति तो शायद भगवान बुद्ध की ही रही होगी। शायद इसलिए कि कैमरे का फोकस राजकीय अतिथि पर ही था। ये सब घटित हुआ, तभी फोटो में दिखा और तभी समाचारों में भी लिखा गया, हमारे समाचार पत्र में भी। सो, हम उसे कैसे झुठला सकते हैं लेकिन ना, ना भई ना, वो तो एक झूठ लग रहा था, कतई झूठ लग रहा है, वैसे मैं अभी भी कामना कर रहा हूं कि वो सच ही साबित हो, अभी नहीं तो दो दिन बाद ही सही।


खबरों में बताया गया कि जनरल थान श्वे ने भगवान बुद्ध की अर्चना करते हुए म्यामांर यानी अपने देश और पूरी दुनिया में शांति की कामना की। खबरों में ये भी बताया गया कि जनरल ने तथागत की आराधना करते हुए म्यामांर और पूरी दुनिया के लिए समृद्धि की कामना भी की। उन्होंने कुशीनगर में म्यामांरपोषित-संरक्षित बौद्ध मंदिर के साथ ही उस बौद्ध तीर्थ के विकास के लिए भी यथासंभव मदद का भरोसा दिलाया। हो सकता है कि उन्होंने ऐसा ही सारनाथ में भी किया हो। बताया गया कि वो बौद्धस्थलों का विकास इसलिए चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग बौद्ध तीर्थस्थलों में पहुंचे और बुद्धं शरणं गच्छामि हों। चूंकि खबरों में ऐसा कहा गया था इसलिए इसे सच मानना चाहिए और पड़ेगा। वैसे ये एक परंपरा है कि जब भी कोई राष्ट्राध्यक्ष, राज्य प्रमुख राजघाट-शांति स्थल जैसे भौतिक स्मारको से लेकर कुशीनगर या सारनाथ जैसे आध्यात्मिक केंद्रों में जाता है, तो वो ऐसा ही कहता है या खबरों में ऐसा ही लिख दिया जाता, भले ही उन्होंने कहा न हो, कामना न की हो। ये कूटनीतिक पत्रकारिता की एक परंपरा है, उसी तरह जैसे ईद की नमाज की खबर में ये लिखा जाता है कि पूरे मुल्क में अमन-चैन की दुआएं मांगी गई और दशहरे की खबर में लिखा जाता है कि पूरे देश ने बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया या भ्रष्टाचार रूपी रावण के संहार का संकल्प लिया। तो ये वैसे ही दुआएं मांगी जाती हैं, जश्न मनाया जाता है, संकल्प लिया जाता है,जैसे सीनियर जनरल थान श्वे ने भगवान बुद्ध से म्यांमार सहित पूरी दुनिया में शांति के लिए कामना की और पूरी दुनिया को बुद्धं शरणं गच्छामि के वास्ते कुशीनगर को बतौर पर्यटक स्थल विकसित करने में मदद का भरोसा दिलाया। उनके भरोसे पर अपने मन को भरोसा तो नहीं दिला पा रहा फिर भी मैं ये कामना कर रहा हूं कि जनरल थान श्वे ने सच्चे मन से कामना की होगी। और, अगर उन्होंने सच्चे मन से कामना की होगी तो भगवान बुद्ध उनकी सुनेंगे, उन्हें अपनी शरण में लेंगे, जैसे उन्होंने कलिंग संहार के बाद अशोक या नर वधिक अंगुलिमाल को अपने शिष्यत्व में लिया था।


एक कल्पना करते हैं। जनरल थान श्वे, भगवान बुद्ध के समक्ष आंख मूंदे ध्यानस्थ पद्मासने संस्थितां हैं। बौद्ध विहार के प्रमुख भिक्षु मंत्रोच्चार कर रहे हैं। तुरही जैसे वाद्य की मंद-मंद ध्वनि गूंज रही है। ताल वाद्य पर हौले-हौले थाप पड़ रही है। प्रतिमा समक्ष सुलगते अगरगुच्छ से घुमड़ता धूम्र दल वातावरण को सुवासित कर रहा है। प्रज्ज्वलित मोम शलाकाओं की पांत आस्था को क्रमबद्ध अनुशासित कर रही है, प्रेरित कर रही है। सब मंत्रों को सुन रहे हैं, गुन रहे हैं, शायद जुंटा प्रमुख जनरल थान श्वे भी। आखिर एक बौद्ध विहार या बौद्ध मंदिर में होने वाले मंत्रोच्चार का अभीष्ट क्या होगा? अहिंसा परम धर्म, जीवों पर दया करो, किसी को न सताओ, सभी को बराबर समझो, शांति की सुरसरि बहाओ, वगैरह-वगैरह। मन सोचने को बाध्य करता है कि उन मंत्रों की जनरल के मन में कैसी प्रतिक्रिया हो रही होगी? उस वक्त उन्हें आंग सान सू की, की याद आ रही होगी,जो वैधानिक तरीके से चुनाव जीतकर भी बरसों से अवैधानिक रूप से नजरबंद हैं, एकमुश्त छह साल से और कुल मिलाकर डेढ़ दशक से भी ज्यादा। भगवान बुद्ध के समक्ष नतमस्तक जनरल थान श्वे के जेहन में उन राजनीतिक विरोधियों के चेहरे उतरा रहे होंगे, जिन्हें उन्होंने बगैर किसी अभियोग के जेलखानों में कैद कर रखा है। पवित्र मंत्रोच्चार की ध्वनि के मध्य इस शांतिकामी जनरल के कानों में उन विधवाओं का रूदन गूंजा होगा, जिनके पतियों ने, एकक्षत्र राज्यतंत्र जुंटा का शांतिपूर्ण विरोध करने की कीमत जान देकर चुकाई। क्या अनुष्ठान के बीच बजते तालवाद्यों के निनाद में उन नौनिहालों की सिसकियों के लिए कोई कोना बचा होगा, जो सैन्य शासन की शांति प्रक्रिया के चलते अनाथ हो गए, अपने संरक्षकों-अभिभावकों को खो बैठे। क्या ध्यान आवेशित मुंदी हुई सैन्य आखों के अंतरपटल पर पीठ से चिपके हुए पेट वाले वो निरीह नागरिक ओझल होते ही सही, दिख रहे होंगे, जो जुंटा शासन की कृपा से राशन में मिलने वाले मुट्ठी भर चावल से किसी तरह दस दरवाजों वाले रंग महल में आत्मा को किसी तरह सहेज कर रखे हैं। मुझे तो गया, कुशीनगर और सारनाथ में मध्य म्यांमार का वह क्षेत्र दिख रहा है जहां पुरातन बौद्ध आनंद विहार अवस्थित है। मेरे कानों में तालवाद्यों की ध्वनि तेज दर तेज होती जा रही है और अचानक वह जुंटा शासन के भारीभरकम टैंकों की गड़गड़ाहट में तब्दील हो जाती है, जो शांतिकामियों को धमकाते राजधानी यंगून की सड़कों को रौंद रहे हैं। मुझे तो अगर गुच्छ से घुमड़ता वो धूम्रदल उस आंसू गैस के गोले से निकली गैस में तरमीम होता लग रहा है, जो पलटकर आंदोलनकारियों ने गुस्साये सैनिकों की तरफ फेंक दिया है। टियर गैस के उस शेल से निकल रही रुलाने वाली गैस सर्पाकार गति से सड़कों पर लोट पोट हो रही है। मुझे तो देव की कांस्य प्रतिमा के समक्ष कतारबद्ध मोम शलाकाएं उन सैकड़ों मशालों की तरह लग रही हैं जो म्यांमार की विभिन्न दिशाओं से राजधानी की तरफ बढ़ रही हैं, जो जीने की आजादी और बुनियादी मानवाधिकार की चाहना रखने वाली अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, मुझे लग रहा है मशालधारकों का नेतृत्व स्वयं तथागत कर रहे हैं, वो लगातार बढ़ते जा रहे हैं, उनके अनुचर, अनुगत अनुयायियों की संख्या बढती जा रही है।


एक और कल्पना करते हैं कि जब विद्वान बौद्ध भिक्षु अपने राजकीय यजमान को शांति, क्षमा, करुणा और दया के देवता के समक्ष बिठा कर मंत्रोच्चार कर रहे होंगे तो उन भिक्षुओं के भी मन में कुछ खदबदा रहा होगा कि नहीं? क्या विद्वान भिक्षु मन ही मन भगवान से ये प्रार्थना कर रहे होंगे कि देव, 48 बरस से अपने मुल्क में सत्य और सत्व को रौंद रहे इस शख्स को मानव बना दो, ताकि म्यांमार में सिसक रहे मानवाधिकार के मुखमंडल पर एक हल्की ही सही स्मित रेखा दर्शनीय तो हो। क्या विद्वान भिक्षु को ये संताप नहीं ताप रहा होगा कि काश कम से कम ऐसा अवसर तो मेरे खाते में नहीं आता जब हजारों भारतीय-चीनी अल्पसंख्यकों के सफाये को जिम्मेदार एक व्यक्ति के लिए हम भगवान से सुनियोजित-प्रायोजित प्रार्थना कर रहे हैं। क्या हम ये मानकर चलें कि जिस म्यांमार के बारे में आम जिज्ञासु काफी कुछ जानता-समझता है, उस मुल्क के हालात के बारे में विद्वान बौद्ध भिक्षु अनजान होंगे। लेकिन हम अपने मन को ये कह कर दिलासा दे लेते हैं कि ये भिक्षु परंपरा तो उस महान आध्यात्मिक मंजूषा की अध्येता है, जिसमें कहा जाता है, पाप से घृणा करो पापी से नहीं। सच तो नहीं लगता लेकिन हम कामना करते हैं कि ये सच ही हो और वो विद्वान भिक्षु एक नए अशोक, एक नए अंगुलिमाल के अवतरण की शुभकामना कर रहे हों।


एक कल्पना और करते हैं, अगर आज गया, कुशीनगर या सारनाथ में साक्षात तथागत उपस्थित होते? यद्यपि तथागत, तथागत हैं, वह गत या विगत नहीं हैं, हमारे आसपास ही हैं, लेकिन हम उन पूर्व सिद्धार्थ, निस्पृह स्थितिप्रज्ञ भगवान बुद्ध की कल्पना कर रहे हैं, जिनके तमाम आख्यान बचपन से पढ़ते आए हैं। वह सारनाथ में अपने शिष्यों संग विचरण कर रहे हैं, कुशीनगर में विहार कर रहे हैं, तभी जनरल थान श्वे, उनके दर्शन की अभिलाषा लिए उनके सान्निध्य को प्रस्तुत होते हैं। म्यांमार के एकमात्र श्रमिक जनरल थान श्वे, उन्हें अपनी मेहनत की कमाई से अर्जित चीवर भेंट करते हैं या करना चाहते हैं। म्यांमार के एकमात्र अधिकृत उद्यमी जनरल थान श्वे, उन्हें अपने व्यवसाय से अर्जित स्वर्ण मुद्रा भेंट करते हैं या करना चाहते हैं। म्यांमार के एकमात्र अधिकृत व्यवसायी जनरल थान श्वे, उन्हें अपने व्यबल से अर्जित एक मूल्यवान हीरा भेंट करते हैं या करना चाहते हैं। म्यांमार एकमात्र अधिकृत शिल्पकार जनरल थान श्वे, उन्हें एक अलभ्य-दुर्लभ पत्थर से बना भिक्षा पात्र भेंट करते हैं या करना चाहते हैं। ऐसे में भगवान बुद्ध क्या करते? उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? उनके उपदेश के तथ्यबिंदु क्या होते?


एक कल्पना और करते हैं, भगवान बुद्ध अपनी शिष्य मंडली सहित अरुणाचल में विहार-विचरण करते हुए भारतीय सीमा से जुंटा शासित म्यांमार की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। वो लगातार भ्रमण पर हैं। लोग उन्हें विस्मय से देख रहे हैं, कुछ संकोच और कुछ भय से विचलन के बावजूद लोग बुद्ध के नजदीक आ रहे हैं। आक्रांत लोगों को बुद्ध का स्नेह स्पर्श स्वर्गिक अनुभूति दे रहा है। लोग पहली बार देश में किसी को सहज स्वाभाविक मुस्कुराहट के साथ देख रहे हैं। बुद्ध जगह-जगह भ्रमण को स्थगन देते हैं, उस दौरान उपदेश भी देते हैं हिंसा से बड़ा कोई पाप नहीं, जीवों पर दया से बड़ा कोई धर्म नहीं, समरसता से बड़ी कोई राजनीति नहीं, सहज शांति व्यवस्था से बड़ी कोई समृद्धि नहीं, आत्मिकता से बड़ा कोई सत्य नहीं। लोग भगवान के विचारों से प्रभावित हो रहे हैं। चारो तरफ उनके उपदेशों की चर्चा हो रही है। उनके अनुयायियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। एक-एक करके उनके विहारों की स्थापना हो रही है। विचार स्वातंत्र्य की अलख जग रही है। लोग सत्य और धर्म का वास्तविक मूल और मूल्य समझ रहे हैं। एक विचारवीथिका के तले एकजुट हो रहे हैं। तभी जुंटा के खुफियातंत्र को इसकी भनक लगती है। तथ्य जुटाये जा रहे हैं, रिपोर्ट्स बन रही हैं। रिपोर्ट्स जल्द से जल्द यंगून पहुंचाई जाती हैं। जुंटा के मुख्यालय में रिपोर्ट्स की सत्यता परखी जाती है और फिर उसके निष्कर्ष सीनियर जनरल थान श्वे तक पहुंचाये जाते हैं। अब मेरे साथ आप भी कल्पना कीजिये कि क्या होता? सत्य का क्या होता, सत्व का क्या होता और धर्म का क्या होता? हां, देश-विदेश या अंतरराष्ट्रीय पन्ने पर एक सुर्खी बनती। म्यांमार में सत्य गिरफ्तार, सत्व नजरबंद। अमेरिका उस घटनाक्रम की कड़ी आलोचना करता। पश्चिम के कई मुल्क अमेरिका के सुर में सुर मिलाते। भारत सधे हुए शब्दों में बुदबुदाता। चीन कोई शाब्दिक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के बजाय म्यांमार के साथ एक और नौ सैन्य युद्धाभ्यास का मुखर मौन निर्णय करता। दबी हुई सी खबर आती कि चीन के दो युद्धपोत म्यांमार की
तरफ बढ़ते हुए देखे गए। संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव पारित होता। म्यांमार की निंदा में 37वां प्रस्ताव पारित हो जाता। महासचिव बान की मून शांति दूत के रूप में म्यांमार पहुंचते। लेकिन इस प्रकरण का समापन इस तरह की एक खबर के साथ हो जाता कि बान की मून को जुंटा शासन ने सत्य और सत्व से मिलने नहीं दिया और वह निराश मन जेनेवा लौटने से पहले शांति प्रार्थना के लिए बोध गया पहुंच रहे हैं।




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89 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Deejay के द्वारा
May 25, 2011

This has made my day. I wish all ptosings were this good.

mahendratripathi के द्वारा
August 14, 2010

आदरणीय भैया जी  सादर प्रणाम   मन को छूने वाला विचार काफी दिनों के बाद ब्‍लाग पर मिला,पढकर काफी अच्‍छा लगा, विचार मंथन वाला लेख, आपको बधाइ,इसलिए भी कि बुकनू में रोचकता और इसमें व्‍यापकता, सादर  महेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी,देवरिया, यूपी

Ramnath Rajesh के द्वारा
August 1, 2010

सर, थान श्वे के दिन लद गए हैं । तुलसी दास ने लिखा है – एक घडी आधो घडी आधो में पुनि आध तुलसी संगत साधु की हरे कोटि अपराध। यदि श्वे को अपराध बोध हुआ है और अशोक की तरह बुद़ध की शरण में आया है तो वह निश्चय ही मुकि्त का पात्र बन गया है। जीवन के अंतिम क्षणों में भी यदि उसे यह अहसास हो जाए कि उसकी भूमिका एक माली की थी, उसका दायित्व फुलवारी के पौधों का बेहतर ढंग से देखभाल करना था तो वह मोक्ष का पात्र बन गया है। गीता में भी भगवान ने कहा है- सर्व धर्माणि परितज्य मामेकं शरणं ब्रज अहम त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्ष्श्यामि मा शुच:। अत: उसका यह अहसास ही पर्याप्त है कि कैंची फुलवारी के पौधों को बेहतर आकार देने के लिए उसके हाथ में मिली थी, पौधों को बेतरतीबी से काटने के लिए नहीं। कैंची के गलत प्रयोग ने ही उसे तानाशाह का तमगा दिला दिया। सवाल यह है कि चाटुकारों से मुक्त होकर क्या श्वे कभी आत्म चिंतन करने के लिए प्रेरित होगा। क्या उसे कभी उस दर्द का अहसास हो पाएगा जो किसी के परिजन की हत्या के बाद उस पर आश्रित भोगते है। यदि भगवान बुदध की शरण में आना दिखावा नहीं था तो क्षण भर के लिए श्मशान विरक्ति के रूप में ही सही उसका सत्ता से मोहभंग होगा और उसे अपने किए पर अकेले में पछतावा होगा। रही बात म्यांमार की तो अत्याचार का अंत तो होना ही है। कोई निरंकुश शासक कितने दिनों तक राज कर सकता है । ईश्वरीय सत्ता के अलावा सारी सत्ताएं नश्वर और परिवर्त्नशील हैं। अत: म्यांमार को जितने बुरे दिन देखने थे उतने उसने देख लिए, अब तो जो भी होगा बेहतर ही होगा। आपका इस विचारोत्तेजक लेख ने लेखन पर खुद लगाए गए ताले को खोलने का काम किया। संदर्भ भले ही अंतरराष्ट्रीय हो, बात तो चिंतन के स्तर पर ही आकर ठहरती है। श्वे को सदबुद़िध आए यही कामना है।

Riyaz Hashmi के द्वारा
July 31, 2010

शानदार लेख। भीतर तक हिला कर रख दिया। कल्पना कीजिये कि इस लेख को यदि भगवान बुद्ध पढ़ते तो मुस्कुराए बिना नहीं रह सकते थे। आपको बधाई, अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा। सादर

शैलेन्‍द्र मणि त्रिपाठी के द्वारा
July 31, 2010

समसामयिक, प्रासंगिक और विचारोत्‍तेजक लेख के लिए आपको बधाई।

ALOK MISHRA के द्वारा
July 30, 2010

विष्‍णु भइया, तानाशाह जनरल थान श्र्वे की बोधगया व सारनाथ की यात्रा का जो चित्रण आपने अपनी कल्‍पनाशीलता से किया है उसके लिए यही कहा जा सकता है कि अनुपम, अदभुद, अकल्‍पनीय…..। तानाशाह जनरल के बहाने आपका यह लेख अपने देश के उन छद्मधारियों पर भी प्रहार करता है जो भीतर से कुछ और हैं और बाहर से कुछ और। तानाशाह की मनोवृत्ति, बौद्व भिक्षुओं के भीतर घुमड़ने वाले विचारों को भले ही शब्‍दों की बाजीगरी कहा जाये लेकिन इस सच को कोई झुठला नहीं सकता कि वाकई उस समय उनके भीतर कुछ ऐसा ही उठ रहा होगा। आलोक मिश्रा पटना

विजय त्रिपाठी के द्वारा
July 30, 2010

हिंदुस्तान में लोग कम पड़ गए जो जनरल के पीछे पड़ गए?

dinesh mishra के द्वारा
July 30, 2010

आदरणीय सर, प्रणाम। आपका यह ब्लॉग पढा। मन में एक सवाल उठा कि जनरल थान श्वे का बुद्धं शरणं गच्छामि महज एक दिखावा या अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए एक छलावा तो नहीं। वस्तुत: यह तानाशाहों की एक सामान्य प्रवृत्ति रही है जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से समर्थन हासिल करने के लिए या फिर अपने क़ृत्य को जायज ठहराने के लिए सहज ही धर्म का सहारा ले लेते हैं। चाहे वह सम्राट अशोक हों या फिर जनरल थान श्वे। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध में लाखों व्यक्तियों के मारे जाने के बाद युद्ध -विजय की जगह धम्म-विजय का अभियान चलाया था। किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद अशोक ने न तो कलिंग का राज्य वापस किया और न ही अपनी सेना विघटित की। यही नहीं उसने पराजित राजाओं को उनके राज्य भी नहीं लौटाए। उसने राज्य में पशु-वध निषेध किया था किन्तु राजकीय रसोई में मांसाहार पकाया जाता था। वस्तुत: चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा आरम्भ की गयी राज्य-निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढाते हुए अशोक ने मौर्य साम्राज्य की चौहद्दी तैयार की थी। अब ऐसे में जनसामान्य मेंअपने साम्राज्यवादी कृत्य को न्यायोचित ठहराने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि धर्म का सहारा लिया जाए। अशोक ने भी वही किया। जनरल थान श्वे भी वही कर रहें हैं। वर्ना बौद्ध स्थलों की यात्रा करने से पहले वह वर्षो से नजरबंद व नोबेल पुरस्कार विजेता शांतिदूत आंग सान सूकी को रिहा करते और म्यानमार में लोकतंत्र- बहाली की घोषणा करते। काश आपकी कल्पना साकार होती।

upendrapandey gkp के द्वारा
July 29, 2010

तानाशाह जनरल थान श्वे पर विचारोत्तेजक लेख लिखने के लिए आदरणीय विष्णु जी को बधाई। बुद्ध के समक्ष दुनिया में शांति की कामना करना और हो आंग सान सू जैसी लोकतंत्र की हिमायती नेता को म्यांमार में नजरबंद रखना तानाशाह के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। इतिहास गवाह है कि कलिंग युद्ध के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया लेकिन भारत से लौटने के बाद जनरल का मन बदल जाएगा,इसकी उम्मीद तो फिलहाल कम ही दिखती है। 

hari shankar mishra के द्वारा
July 29, 2010

किसी एक घटना पर चितन का यह बड़ा फलक बहुत कुछ सोचने पर बाध्य करता है। यह एक पत्रकार ही नहीं विचारक का भी नजरिया है और जाहिर है कि एक तानाशाह के दौरे के बहाने एक देश के पूरे हालात और हमारी छद्म वैदेशिक नीति को भी आइना दिखाता है। बेशक यह अंगुलिमाल और वाल्मीकि की धरती है लेकिन जनरल थान के हृदय परिवर्तन की बात तो किसी के गले से नहीं उतर सकती। अरसे बाद इतना विचारोत्तेजक लेख सामने आया।  

pradeep agnihotri के द्वारा
July 29, 2010

कल्पनाशीलता का अनुपम नमूना है ताजा लेख। नेत्रों से परे दृश्यों को  समझने और कल्पना करने की क्षमता ही किसी लेखक, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और अन्य रचनाशील लोगों को महान बनाती है। श्वेत पट पर लिखे काले अक्षर अगर ज्ञान की नींव हैं, तो कल्पनाशीलता उस ज्ञान को ऊंची मंजिलों तक पहुंचाने की सीढ़ी। व्यस्तता के बावजूद किसी बिन्दु विशेष पर मस्तिष्क को बांधे रख पाना और उसे प्रस्तुत करना सराहनीय है। ऐसे लेखन की जल्द उम्मीद करना आपके साथ अन्याय होगा लेकिन महीने-डेढ़ महीने के अंतर से यह सिलसिला कायम रहना चाहिए।  

सुमंत मिश्र के द्वारा
July 28, 2010

राजनीति और धर्म के घालमेल का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है? लेकिन धर्म एक दीर्घकालीन राजनीति है,चर्चिल की इस उक्ति को भी नही भूलना चाहिये। बुद्ध के लिए तो यह जगत क्षणिक और शून्यवत था, किंतु आज के राजनेता स्विस बैंक के एकाउंट होल्डर हैं। तानाशाह तो सबसे ज्यादा।

    Chyna के द्वारा
    May 25, 2011

    Walking in the presence of ganits here. Cool thinking all around!

Ibrahim kumbhar pakistan के द्वारा
July 28, 2010

तानाशाह की कहानी जिस अंदाज़ से बयान की है उस पर आप को सलाम है बल्कि दोनों हाथों से सलाम करता हूँ,हमें भी 4 तानाशाहाओं का अनुभव है और उनहोंने जो हमारे देश का जो खाना खराब क्या है  बस ना ही पोंछें आप के लिए जो सुना था आपको पड़ कर आप के विचार देख कर बहुत खुश हुआ और आप की लोकतांत्रिक सोच को देख कर खुशी भी हुई और गर्व भी कि हम से कभी कभी संपर्क में रहते हैं आप के खयाल आप के विचार पड़ कर आप की महानता को न केवल मानना पड़ेगा लेकिन आप को अपना गुरु बनाने को दिल चाहता है, लेकिन आप के पास हमें पाठ देना का समय ही नहीं होगा

sunil pandey के द्वारा
July 28, 2010

सर, बहुत बढ़िया।

    Lizabeth के द्वारा
    May 25, 2011

    You’re the grteeast! JMHO

    Youngy के द्वारा
    May 25, 2011

    AKAIK you’ve got the ansewr in one!

shambhu dayal vajpayee के द्वारा
July 28, 2010

कुछ सवाल उठाते,कुछ जवाब देते ,कुछ विचार विंदु छोडते और कल्‍पनालोक की घुमावदार गलियों में फिराते चित्‍ताकर्षक शब्‍द चित्रण ने आद्यंत पढने को मजबूर किया । खुदा करे इसी बहाने तानाशाह का हृदय परिवर्तन हो और वह कठोरता छोड करुणा को वरण करें। लोक तंत्र बहाल हो।आंग सान सू की आजाद हों। वैसे तानाशाह या मदांध व्‍यक्ति को अपराधबोध के झटके नहीं लगते।वह इसी आत्‍म मुग्‍धता में रहता है कि वह जो सोच – कर रहा है,वही सही है,धर्म है। इस लिए बुद्धं शरणम् शैली की इन यात्राओं से संघं शरणम् होने जैसे किसी चमत्‍कारिक परिवर्तन की उम्‍मीद नहीं करनी चाहिए।- शंभू दयाल वाजपेयी

    Johnie के द्वारा
    May 25, 2011

    Hahaahha. I’m not too bright today. Great post!

kmmishra के द्वारा
July 28, 2010

भगवान बुद्ध तो अब रहे नहीं हां अंगुलिमाल अब भी रूप बदल बदल कर टहल रहे हैं । कभी जनरल थान श्वे के रूप में कभी एंडरसन के रूप में कभी सज्जन कुमार और टाइटलर के रूप में । बहुत सुंदर लेख । आभार ।

प्रभात शुंगलू के द्वारा
July 28, 2010

आपका लेख पढ़ कर ऊर्जा मिली। कुछ और पढ़ने की। कुछ और लिखने की। कुछ और मुखौटों को नोंच फेंकने की। 

    Becky के द्वारा
    May 25, 2011

    Thakns for the insight. It brings light into the dark!

रामधनी द्विवेदी के द्वारा
July 28, 2010

जनरल थान श्‍वे का हृदय परिवर्तन हो रहा है। यह प्रक्रिया शीघ्र पूरी हो— अशोक और अंगुलिमाल की तरह,ऐसी कामना करनी चाहिए। शुभम् भूयात

Nikhil के द्वारा
July 28, 2010

आपके इस लेख के बारे में क्या कहूँ विष्णु जी, आपके कलम से जब भी कोई बात निकलती है, युवाओं के मार्गदर्शन को मनोबल मिलता है. जिसतरह से म्यांमार के निरंकुश शाषक का समूर्ण चारित्रिक वर्णन और बुद्ध की उनकी आस्था का दूसरा पहलु जो आपने दिकहाया, वह काफी प्रभावी है. आपकी प्रशंशा में कुछ कहना सूर्य को दिए दिखने जैसा है. आभार, निखिल झा

नीलेश कुमार के द्वारा
July 28, 2010

आदरण्‍ीय सर इस लेख के जिस लेखक को हम जानते हैं, वह शायद सिर्फ तारीफ के लिए तारीफ सुनना कतई पसंद नहीं करता। लिहाजा, हमारी राय में इस शाब्दिक व्‍यंजन में कल्‍पनाशीलता का जिस स्‍तर पर समावेश किया गया है, वह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि जब अनुभवी हाथ कुछ गढ्ते हैं तो वह रचना किस स्‍तर की होती है। लेकिन, इस बेहतरीन व्‍यंजन में एक कंकड् खटक गया। भारत में कभी भी………. …………….बुराई की अच्‍छाई पर जीत का जश्‍न……. …………………………………………………………….नहीं मनाया जाता। शायद भावप्रवाह में यह चूक हो गई। लेखक की शान में अगर गुस्‍ताखी हुई तो क्षमा।

    Stormy के द्वारा
    May 25, 2011

    Posts like this brgihetn up my day. Thanks for taking the time.

rkpandey के द्वारा
July 28, 2010

आदरणीय विष्णु जी, एक सधी हुई तुलिका से आपने गंभीर मुद्दे को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जिसके लिए आपको साधुवाद. म्यांमार के तानाशाह का टोटल चरित्र ही ऐसा है कि उनसे किसी लोकतंत्र को स्वीकारने की उम्मीद करना बेमानी है. शायद किसी तानाशाह की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि उसे लगातार अपनी सत्ता का भ्रम कायम रखने के लिए हिंसा और दमन का सहारा लेना पड़ता है. आपका ब्लॉग वाकई बेहद अच्छा है.

अनिल अग्रवाल के द्वारा
July 28, 2010

आद.विष्‍णू भाई , कमाल कर दिया आपने । मैने उस फोटो और कैप्‍सन को विशेष गौर किया था ,परन्‍तु आपने तो पूरा चलचित्र ही सामने प्रस्‍तुत कर दिया ।

    Pebbles के द्वारा
    May 25, 2011

    More posts of this qulatiy. Not the usual c***, please

anshuman के द्वारा
July 28, 2010

विष्‍णु जी … साधुवाद … बहुत अच्‍छा आलेख। … म्‍यान्‍मार बड़ा विलक्षण है। कुछ दार्शनिक मजाकिये कहते हैं कि भिक्षुओं को मांसाहार की अनुमति मिलने की दुर्घटना यहीं हुई थी। कोई चील किसी भिक्‍खु के पात्र में मांस गिरा गई और पाबंदी टूट गई क्‍यों कि मांस आकाश से आया था। पूरी दुनिया में सबसे विलक्षण बु्द्ध मंदिर यही हैं, जहां प्रसाद में सोना चढ़ता है। लोग मंदिर के बाहर से सोने का वर्क खरीद कर बुद्ध पर चस्‍पां कर देते हैं। पद्मासीन गौतम की मूर्ति विशाल है। शीश तक कोई नहीं पहुंचता। इसलिए बुद्ध का अधोभाग सोने चिपकने से बेडौल हो गया है। …. बेचारे बुद्ध. :::अंशुमान

    rkpandey के द्वारा
    July 28, 2010

    आदरणीय अंशुमान जी, आप की कृति तो वैसे भी साहित्य की परंपरा को पुष्ट करती है किंतु आज विष्णु जी ब्लॉग पर आपका कमेंट पढ दिल खुश हो गया.

shatrughan के द्वारा
July 28, 2010

Sir congratulation … aapke isa article me shamil har bindu chetnaa jagane wale hen… 1budhism, 2. aang saan su kee 3. loktantra. 4. bhautik SMARAK. 5. GAYAA KUSINAGAR AUR SAARNATH ka atihasik mahatva bhi pata chalta he…. isa prakar article me shahron ka itihaas ka bhi ullekh bhi kiya jay to yuva pidhi ko inka alag se mahatva batane ki jarurat nahi rahegi…lekh me moka mudde aur mahatva ka sateek milan he - BUDDISM is GREAT RELIGION which all time favourite 4 world chief justice of india deeply intrest in buddhism plz arrange ths article for him

आर.एन. शाही के द्वारा
July 28, 2010

त्रिपाठी साहब जी बहलाने के लिये ही सही, एक कल्पना ये भी करें कि जनरल का शायद हृदय परिवर्तन हो रहा है, और बहुत शीघ्र म्यांमार से कुछ रचनात्मक और सकारात्मक परिवर्तन वाले निर्णय लिये जाने पर मंथन चल रहा हो, ऐसी खबर छन कर आए । क्योंकि यह भी शाश्वत है कि हर अतिमहत्वाकांक्षी तानाशाह और क़ौमों का या तो दुखद अन्त हुआ है, या फ़िर हृदय परिवर्तन, जिसने लोक कल्याणकारी रचनात्मक परिवर्तन को जन्म दिया । विध्वंसक हथियारों के निर्माता कालान्तर में नोबल बने हैं, और किसी नरसंहार के दोषी अशोक के कारण बुद्धत्व को प्रचार-प्रसार मिला है । वैसे यह एक खयाल ही है । बेहतरीन लेख के लिये बधाई … आर.एन. शाही । shahirn.jagranjunction.com

नवीन भोजपुरिया के द्वारा
July 28, 2010

विष्णु त्रिपाठी सादर प्रणाम एक निरंकुश तानाशाह और उसके आडम्बर , या शायद ऐसे कई उदाहरण जब हमारे मानस पटल पे कुछ ऐसी सोच , कुछ ऐसी सिलवटे दे के जाते है जिनको सोच के कभी कभी रुह कांप जाती है । एक तानाशाह की असलियत जो दिखाई दे रही है या ये आडम्बर जो नंगा सच है । आपने जिस प्रकार भगवान बुद्ध और फिर उनकी सोच को आज के वस्तुस्थिति मे उतारा है उसके लिये आप कोटि कोटि बधाई के पात्र है । सत्य – असत्य का द्वन्द , और उनके एक दुसरे से भिडने की प्रक्रिया , और आडम्बर के टुटने का सच , और एक तानाशाह और उसके सिपाहसलारो का वही चाल चलना जो एक असत्य का पुजारी चलता है जैसी चीजो को आपने बहुत ही बेहतरीन तरिके से दिखाया है । भाई मुकेश जी के टिप्पणी से मै बिल्कुल सहमत हुँ कि आपकी रचना पढने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी जी लिखी कोई ताजा तरीन रचना पढ रहा हुँ । एक बेहतरीन लेख , जिसे हर पाठक को पढना चाहिये । राजनीति , तानाशाही , अध्यात्म , सत्य , असत्य और जनता की बेचारगी का एक बेहतरीन संगम । आप कोटि कोटि बधाई के पात्र है । धन्यवाद दुंगा मै राजु भईया का जिनकी वजह से मै यहाँ तक पहुंच पाया । आपका नवीन भोजपुरिया

raghvendra chaddha के द्वारा
July 28, 2010

एक तानाशाह की तीर्थयात्रा… सचमुच एक पत्रकार की अन्वेषी नजर ही इसे पकड़ सकती है। म्यामार के राष्ट्राध्यक्ष की कुरसी संभालते समय जनरल थान श्वे जिस हेकड़ी में दिखते होंगे, सारनाथ  में उनकी देहभाषा उनकी बेचारगी को परिभाषित कर रही थी। धम्मेख स्तूप की परिक्रमा करते समय उन्हें कदम बढ़ाने के लिए एक सहायक के सहारे की जरूरत पडी। जब वह बुद्ध के प्रतीकों के समक्ष दंडवत हुए तो लगा कि उन्हें अपने किए पर कहीं न कहीं पछतावा होने लगा है। आपने इस पूरी स्थिति को जिन वाक्यों में बांधा है, उसके लिए एक ही शब्द है अदभुत।  एक तानाशाह की यात्रा का सटीक निहितार्थ निकालने के लिए वाराणसी टीम की ओर से आपको ढेरों बधाईयां। साथ में एक सवाल भी मन में उठ रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी तानाशाह की यात्रा को मीडिया किस रूप में देखे, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। कल जब फोन पर आपने सारनाथ और बुद्ध के संबंधों के बारे में दरियाफ्त की तो मुझे लगा कि आपके अंतरमन में जरूर कुछ हलचल मच रही है। उस हलचल के दरमियान जो मंथन और साधना हुई, उससे जो खूबसूरत मोती  निकले, उसकी कल्पना न थी। - राघवेंद्र चड्ढा, वाराणसी -      

    sudhanshu srivastava के द्वारा
    September 6, 2010

    very nice sir.

    Alyn के द्वारा
    May 25, 2011

    This has made my day. I wish all psotigns were this good.

mukesh kumar के द्वारा
July 28, 2010

एकबारगी तो ऐसा लगा मानो हजारी प्रसाद द्विवेदी की कोई रचना पढ़ रहा हूं..वाणभट्ट की आत्मकथा या फिर अनामदास का पोथा…। काश, मैं भी इतनी खूबसूरती से कह पाता, लिख पाता। रही जनरल साहब की बात तो गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-अवश्यमेव भुक्तव्यम्…जो किया है वो भुगतना ही पड़ेगा.. किसी न किसी रूप में, किसी न किसी जन्म में..। भगवान बुद्ध के शरण में जाने से पाप थोड़े न धुल जाएंगे।

अतुल चतुर्वेदी के द्वारा
July 28, 2010

एक खबर के माध्‍यम से धर्म दर्शन की पड़ताल और राजनीतिक संदर्भों में राष्‍ट्रीय, अंतरराष्‍ट्रीय रंगमंचीय शोशेबाजी पर व्‍यंगात्‍मक पैनी निगाह डालता एक समग्र लेख। फंतासी एवं यथार्थ का शानदार मिश्रण।  

राजू मिश्र के द्वारा
July 28, 2010

वास्‍तव में थान श्‍वे के पाप का घड़ा भर चुका है…अगर वह सच्‍चे बुधिष्‍ट हैं…बुद्ध के समक्ष शरणागत होकर अपनी करतूतों के प्रायश्चित की अनुय-विनय करते घूम रहे हैं तो उन्‍हें फौरन आंग सान सू को आजाद कर देना चाहिए..तभी उनकी भक्ति सफल होगी, भगवान बुद्ध खुश होंगे। बेचारी आंग सान सू ….

Arvind Chaturvedi के द्वारा
July 28, 2010

मजा आ गया सर, शायद कल्पनाशीलता का चरम हो यह लेकिन यथार्थ सा लगता है। अरविंद चतुर्वेदी

    Kelis के द्वारा
    May 25, 2011

    Got it! Thnaks a lot again for helping me out!

आनंद राय- लखनऊ के द्वारा
July 28, 2010

आदरणीय भाई साहब! बहुत दिन बाद आपको पढने का मौका मिला.. बहुत अच्छा लगा.. बधाई …. बुद्ध अनूठे हैं, ध्रुवतारे हैं, उन तक पहुँच कर हर तानाशाह को अपने गुनाह याद आते हैं. आपने अपनी कल्पना से जो सवाल उठाये हैं वह तो नियति है. सम्राट अशोक हों, डाकू अंगुलिमाल या फिर म्यामार के राष्ट्राध्यक्ष जनरल.. बुद्ध ने यही तो कहा - किसी की गर्दन को काट देना आसान है, उसे जोड़ना मुश्किल. अब कौन जोड़ना चाहता है. जब तक काटने में सुख मिलता तब तक तलवारें चलती रहती हैं. जिस दिन मन भर जाता उस दिन बुद्ध की शरण में लोग चले जाते हैं.. चाहे कोई राष्ट्राध्यक्ष हो या आम आदमी, एक दिन बुद्ध की शरण में जाना ही है. क्योंकि मन की शांति तो वहीं मिलती हैं.

shakti singh- mau के द्वारा
July 28, 2010

bahut behatar post

    Luckie के द्वारा
    May 25, 2011

    What a joy to find smeonoe else who thinks this way.

    Danice के द्वारा
    May 25, 2011

    Cool! That’s a cveler way of looking at it!

मदन मोहन सिंह के द्वारा
July 28, 2010

 म्‍यांमार को कलिंग की तरह रौंदने का दोषी है, थान श्‍वे। शायद अपराध बोध हुआ हो। इसलिए भगवान बुद्ध की शरण में आया। लेकिन उस पर यकीन करें भी तो कैसे। इसकी तो एक ही कसौटी है़ सू-की को तत्‍काल रिहा करे। उनसे माफी मांगे। बहरहाल सर, एक खला के बाद खुलूस आया है। बड़ों की मौजूदगी छोटों को दौड़ में शामिल होने के लिए हिम्‍मत देती है। थमता जा रहा था सिलसिला, लोग फिर लिखना शुरू करेंगे।

    arvind vidrohi के द्वारा
    July 28, 2010

    सब नौटकी है।


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