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वो बीमार नहीं, थके हुए हैं...

Posted On: 15 Aug, 2010 Others में

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मैं उनको सुबह लाल किले की भव्य प्राचीर से कुछ बोलते हुए सुन रहा था। कभी-कभी लग रहा था कि वो बुदबुदा रहे हैं और साउंड सिस्टम के एम्प्लीफायर के सौजन्य से बोलते हुए लग रहे हैं। वो शायद बुदबुदाने के अभ्यस्त हैं, आदी हैं, इसलिए ऐसा भी लग रहा था कि बोलने के लिए उन्हें एक्स्ट्रा एनर्जी की जरूरत पड़ रही है। बीच-बीच में ऐसा भी लगा कि इनवर्टर की बैटरी बोल गई है और एक्स्ट्रा एनर्जी का स्रोत जवाब देने लगा है। पूरब की हवा का जोर होता तो उनकी आवाज परेड ग्राउंड से होती हुई जामा मस्जिद की तरफ बह निकलती और हवा थोड़ा दक्खन-पछुआ रुख लेती तो एम्प्लीफायर सिस्टम के सपोर्ट के बावजूद कुछ घरघराता सा लगता। ऐसा लग रहा था कि चूंकि वो इस मुल्क के प्रधानमंत्री बना दिये गए हैं, इसलिए बोल रहे हैं। ऐसा भी लग रहा था कि वो बनाये हुए प्रधानमंत्री हैं, इसलिए वो जो बोल रहे हैं, वो बना-बनाया हुआ है। ऐसा भी लग रहा था कि 15 अगस्त के दिन इस मुल्क के प्रधानमंत्री को लाल किले की प्राचीर से बोलना ही होता है, इसलिए वो बोल रहे हैं। कभी-कभी ये भी लग रहा था कि वो जो बोल रहे हैं, वो उनसे बोलने को कहा गया है,  इसीलिए बोल रहे हैं। दरअसल वो बोल भी नहीं रहे थे, कोई स्वतःस्फूर्त भाषण भी नहीं दे रहे थे, वो तो पढ़ रहे थे, बांच रहे थे। वो, जो पहले से ही उर्दू में लिखा हुआ था, जो कई लोगों के दिमाग की समझदारी और हाथों की साझेदारी का अंजाम था और मम्मी-बेटा के दो जोड़ा हाथों से ‘ओके’ किया हुआ था।

वो चारो तरफ से ढके-मुंदे थे, क्योंकि इस मुल्क के प्रधानमंत्री को हमेशा हमले का खतरा रहता है। उन्हें चार लोग लगातार घेरे थे। ऐसा लगता था कि वो अपने मन से कहीं और जाना चाहते हैं लेकिन सफारी सूट पहने ये चार लोग उन्हें वहीं ले जा रहे थे, जहां उन्हें ले जाने के लिए कहा गया है। उनके बायें-दायें दो आदमी खड़े थे और लगातार अपनी खोपड़ी बांये-दायें करते हुए कुछ भांप से रहे थे। उनके दो कदम पीछे दो और आदमी ख़ड़े थे, उनकी खोपड़ी तो और ज्यादा घूम रही थी, वो बीच-बीच में आसमान की तरफ भी देख लेते थे, उनके दो कदम और पीछे दो और आदमी खड़े हुए थे जो दूरबीन से पता नहीं किसे ताड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये सब आदमी बहुत डरे हुए हैं, सहमे हुए हैं, उनकी हरकत से तो ऐसा ही लग रहा था कि या तो इन सफारी सूटधारियों को खतरा है या उस आदमी को जिसे वो नीचे से अपने साये में इस ठिकाने तक ले आए हैं। पूरे माहौल में एक डर सा तारी था, डर, डर और डर। सब एक दूसरे को कनखियों से देख रहे थे। डिपर की तरह आंखें मिचमिचा रहे थे। हंसना तो बिल्कुल मना था। लग रहा था कि सब एक दूसरे से डरे हुए हैं या उससे डरे हुए हैं जो दिखाई नहीं दे रहा। हां, वो जो थे, वो हमेशा की तरह नीली पगड़ी पहने थे और उससे मेल खाती जैकेट। वो एक शीशे के घेरे में बंद थे। कुछ बोले चले जा रहे थे, बांचते चले जा रहे थे, ये देखे बगैर कि उन्हें सुना भी जा रहा है या नहीं? ये देखे बगैर कि उन्हें सुनते हुए लोगों के चेहरों पर उतार-चढाव कैसा आ रहा है? वैसे उन्हें ये देखना भी नहीं था क्योंकि इसीलिए वो उन लोगों से काफी दूर और ऊंचाई पर ले जाए गए थे। बास को पता है कि वो सेंसिटव पर्सन हैं, सच्चा बंदा है, दीन को देख दीन होने वाला है, इसलिए उसे लोगों के चेहरों से दूर रखो, उसे लोगों के चेहरे न पढ़ने दो, अभी जरूरत बाकी है, कुंवर को परफ्केट और मेच्योर होने में अभी वक्त है। बहराहल, वो शीशे के घेरे के पीछे से बीच-बीच में मुट्ठी तानते, बांहें फड़काते जैसे दिखते थे लेकिन ये हमारी गलतफहमी थी, वो ऐसा इसलिए कर रहे थे  कि उनके कुर्ते की बाहें कुछ बड़ी थीं और डायस पर सामने धरे पन्नों में उर्दू के हरफ डिस्टर्ब हो जाते थे।

हम सोच रहे थे कि अगर लालकिले की प्राचीर पर वो न होते तो? अगर हमारे दुल्लर चच्चू होते, तो? चलो, दुल्लर चच्चू न सही, बबोल चच्चू होते, तो? मोहन लाल नाऊ होते तो? या बिल्लन मियां होते, तो? चारो लोग ठीकठाक उर्दू बांच सकते हैं, पुराने जमाने के वर्नाक्युलर स्कूल के पढ़े हैं। मोहन लाल बाबा को छोड़ दें तो सबकी आवाज भी ठीक-ठाक, बुलंद। गांव की रामलीला में तब लाउडस्पीकर कहां होते थे? कद-काठी हुंकारी और कुर्ता-पाजामा के साथ कोसा की पगड़ी में चारो क्या जमते हैं। मैं सोच रहा था कि अच्छा अगर वो वाकई न होते और लाल किले की प्राचीर से दुल्लर चच्चू किसी और का लिखा भाषण बांच कर वापस गांव लौट जाते तो क्या मुल्क कमजोर हो जाता? चलौ दुल्लर चच्चू न सही बबोल चच्चू होते और यही भाषण लाल किले के माइक पर फेरा देते तो क्या आईएसआई की हरकतें तेज हो जातीं? अमेरिका यूरेनियम देने से इनकार कर देता? क्या हम सार्क देशों के मुखिया न रह जाते? …और हो सकता है कि वो वाकई न रहे हों। उनका सेकेंड यानी हमशक्ल रहा हो। दरअसल सवाल सिक्योरिटी और आतंकवादी खतरे का है। भारत का प्रधानमंत्री कुर्सी की कसम खाते ही आतंकवादी हमले की जद में आ जाता है। बड़े मुल्कों में सब जगह होता है, वहां एकाध नहीं कई हमशक्ल होते हैं। वैसे भी हम अब बड़े मुल्क हो गए हैं, 80 रुपये किलो दाल कोई छोटा-मोटा मुल्क खा सकता है? तीन हजार करोड़ सिर्फ खेल में कोई बड़ा मुल्क ही बहा सकता है। हमें तो शक हो रहा है कि लाल किले पर वही थे। वो नहीं हो सकते, उनके बारे में तो सुनते हैं कि वो बड़े खुद्दार टाइप के हैं। फिर कल तो वो काफी एक्टिव थे तो आज सबेरे-सबेरे कैसे लाल किला पहुंच सकते  थे, इतनी जल्दी तो थक जाते हैं। हम तो कल ही काफी डर रहे थे कि आज इतनी मेहनत कर रहे हैं, मीटिंग पर मीटिंग कर रहे हैं, कल सबेरे लाल किला पहुंच भी पाएंगे?

ये हमारा नहीं आफीशियल वर्जन है। बस 10-12 दिन पहले की बात है। आपको याद है कि संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार ने सर्वदलीय मीटिंग बुलाई थी। आप कहेंगे या कहेंगी कि इसमें याद रखने वाली बात क्या है? जब भी सत्र शुरू होता है, अध्यक्ष की तरफ से सर्वदलीय मीटिंग तो बुलाई ही जाती है। क्या आपको याद है कि उस सर्वदलीय मीटिंग में देश के प्रधानमंत्री मौजूद ही नहीं थे। अब आप मेरी बात पर भरोसा नहीं करेंगे कि लोकसभा अध्यक्ष सर्वदलीय मीटिंग बुलायें और प्रधानमंत्री उसमें गैर मौजूद रहें। गैरमौजूद रहना तो विपक्ष का काम है, लेकिन ऐसा हुआ था, क्यों? क्योंकि उसके एक दिन पहले राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ चली मीटिंग में शिरकत के चलते वो थक गए थे। ऐसा आफीशियली कहा गया था। ये बताने की जरूरत भी नहीं पड़ती अगर लोकसभा अध्यक्ष ने ये जानकारी नहीं दी होती कि पीएम बीमार होने के कारण सर्वदलीय मीटिंग में नहीं आए। उनके ऐसा कहते ही पीएम के मीडिया सलाहकार ने आनन फानन में एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया…वो बीमार नहीं, थके हुए हैं। फिर जोर देकर कहा गया कि ये कहना ठीक नहीं है कि पीएम बीमारी के कारण सर्वदलीय मीटिंग में नहीं शामिल हुए, दरअसल वो थके हुए हैं।

अगर वो थके होने के कारण सर्वदलीय मीटिंग में नहीं शामिल हुए तो संसद के मानसून सत्र की सेहत पर क्या असर पड़ा?

अगर वो थके होने के कारण लाल किले की प्राचीर से भाषण नहीं बांचते तो इस मुल्क की थकी हुई सेहत पर क्या असर पड़ता?

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117 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nook के द्वारा
May 25, 2011

Good to see a tlanet at work. I can’t match that.

Balvir के द्वारा
October 1, 2010

मत ऊड़ाओ इन कबूतरों को,  ये ही तो मेरे साथ रहते हैं… क्या हूआ जो गंदा किया मुझको,  इकबार ऊड़ कर फिर से लोट आते हैं… आज जो मुझको साफ कर रहे हो,  कल को माला व फूल चढ़ाओगे… सारा दिन इक मेला सा होगा,  हरकोई गांधी जंयती मनाएगा… जोर-जोर से लाउडस्पिकर को बजा कर,  बापू गांधी अमर रहे जैसे नारे लगाओगे… कुछ देश भक्ति के गीत गाकर,  अपने-अपने घर चले जाओगे… साल भर खड़ा रहता हूं,  इंतजार मैं करता रहता हूं…. कभी बस कुछ प्रेमी आते हैं,  बात कर, इश्क मेरे निचे बैठ लड़ाते हैं… और कुछ बच्चे भी आते हैं,  क्रिकेट का विकेट बना खेल कर जाते हैं… गांधी जयंती आया तो क्या हुआ,  किस लिए सारा देश परेशान है हुआ… टीवी पर देखो बापू आज याद आए हैं,  सारा साल क्राइम और नेताओं ने उसपर डेरा लगाया है… शाम ढलते ही तुमसब चले जाओगे,  काफी थके होगे आज, कुछ खाकर सो जाओगे… मत ऊड़ाओ इन कबूतरों को,  ये ही तो मेरे साथ 364 दिन रहते हैं… तुम तो आज गांधी जयंती मनाते हो,  गंदा कर ही सही पर हररोज जयंती मनाते हैं… मत ऊड़ाओ इनको,  ये ही तो मेरा साथ निभाते हैं।

    Kaeden के द्वारा
    May 25, 2011

    Thknas for sharing. What a pleasure to read!

    Kaylea के द्वारा
    May 25, 2011

    Hey, that’s the gretaest! So with ll this brain power AWHFY?

Gopalji के द्वारा
October 1, 2010

आपने जिस विषय पर लिखा है उस पर लेखन तहजीब भी वैसी ही प्रयोग की है, इस अंदाज़ के लिए आप बधाई के पात्र हैं

sunilrathore के द्वारा
September 25, 2010

hamare pm ne apna sara jeevan(budhape ho chodkar)noukarshah ke roop men kata hai.vartman men woh congress ki noukri kar rahe hai.soniya g ne desh ki gadi chalane ke liye unhe driver ka (pm ka)pad de rakha hai.khair hamare mahan desh men to cabinet mantri tak wheel chair par aate hai kyoki yaha loktantra hai.shayad hamara desh bhi wheel chair par hi baitha hai.post ka reply mile to accha lagega.

shaileshasthana के द्वारा
September 19, 2010

वे थके हुए हैं। वक्त और परिस्थितियों ने थका दिया है। हम लोग अपने संपादकीय कक्ष में बैठकर कुछ भी बातें कर लें मगर देश की बागडोर थामने वाला वह भी भारत जैसा, कांग्रेस के भीतर की जो स्थितियां हैं उनमें, वह भी कई साल पहले रिटायर हो चुका व्यक्ति अगर सरकार चला रहा है तो उसे ताकत दी जानी चाहिए जब तक हम दूसरा विकल्प नहीं दे देते। अखबार और पत्रकार निंदा तो करते ही हैं मगर व्यक्तिगत निंदा से बचना चाहिए। ऐसा आप बड़े भाइयों ने ही सिखाया है। प्रधानमंत्री होने के नाते हमें उनकी निंदा करनी चाहिए मगर उनके किए कार्यों और उनके शब्दों की,  न कि उनके स्वास्थ्य और उनके चेहरे की। आप हम लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं, मार्गदर्शक  हैं उम्मीद है अगले पोस्ट में जोरदार और मन तो झकझोरने वाला विष्णु त्रिपाठी का लेख पढ़ने को मिलेगा। 

Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
September 18, 2010

आपका लेख देश की आवाज़ है,अब मुल्क को जरूरत है युवा व मजबूत कन्धों की

    Suzy के द्वारा
    May 25, 2011

    Didn’t know the forum rules allowed such brilalint posts.

    Mahalia के द्वारा
    May 25, 2011

    Now I know who the brainy one is, I’ll keep looknig for your posts.

Pintu Pandey के द्वारा
September 15, 2010

Bilkul sahi likah gaya hai . humare rajnetao me na rajnaitik ichha shakti hai na hi wah lok desh ke prati jawabdeh hai, bus kursi per baith gaye hai aur unse jo karne ke liye kaha ja rah hai wahi kar rahe hai. Sirf Bhasan dene se kuchh nahi hota hai aur hamare pradhanmantri ya anya kisi bi jimmedar ke statement ka kisi per koi prabhav padta nahi dikhta hai na hi koi unki bato ko gambhirta se leta hai chahe wah hamare padosi mulk ho ya hamare desh ke naukashah, jub hamare leader hi thake huye rahenge to public ka kaya hoga.

Balvir के द्वारा
September 13, 2010

ये लेख काफी सोच समझ और देख कर लिखा गया है। काफी बारिकीयों का ध्यान से प्रस्तुत किया गया है। सच में मां, बेटे के ज्यादा और देश के काफी दूर लगते हैं प्रधानमंत्री जी। उनको देश के लिए नहीं पार्टी की रक्षा करने के लिए बनाया गया है लगता है।

bkkhandelwal के द्वारा
September 13, 2010

sh.tripathi ji kabhi aapki lekhani padna raha aur bahut dunda usdink ka newspaper jismey unki kuch jaani pachnai bhasan ki perti per kahni nahi mila jismey desh ke p.m.ke uchvicahar mujhey yahi laga yeh nahi bol paye inke upper kaamka bojh bahut pures deeshi/duniya ki sab samsaye in ki dil aur maathey per har samay rahti hain becharey karey bhi kya karein kis ko apne dookh mein milayen kabhi madam ki sunno kabhi virodhiyon ki sunno kabhi opposition leade ki sunno jis ko nakara uske virodhi khud hogaye aur subsey badi samsya naujawn dost ki suno itna time mil nahi pata ki biwi ko apna dookh sookh baatlein zara sa mann ghar lagney chaley jaiyein tab bas afta aayjaye gi sab kah detey bhai agr samay nahi ta tab aur bhi zamney meie aapke sivay bhasand deny ke liy aaj kal gali gali chape chape koi na koi neta desh ka bhar apney kandhey per daaley rahta hai woh issliy lal quiley per apni awaz ko uncha karney gay chal iss bahney unchai se deshwasiyon se kuch gapshap maarloonga waseybhi itni secquirity hogi ki apne dil ki to kuch kah nahi sakta desh ke baarey meie meri kya visat jo apna dookhada roun kyunki inbatton ko to khuleam ab janta ke saamney vote laytey samay hi kahana padta barna voto ke samay janta ko kya jwab dengey woh election ke dino meie hamari baatey sunney hi aati hai hamra cher dekhney nahi aati iss cherey ko to t.v.baaley 15august and 26th january ko hamrachera hi public ko dekhna padta aur lal quiley se bolein har samsya ko roj t.v.news channel badi badi likhai meie dikha detey hain aur boletey t.v. per hain kaan hamre phtey uddhar aajkal gaon ke punch bhi hamre punch maarkar desh ki sabhi smasyon ko bol deytey hain hum kya bole pujab ki koi samsya hai nahi woh to hamari biwi ko hamney samjha diya hai kahadena thekey harey huye hain koi jyada insey na bole kewal haath milana ho mila lo u.p.meie hum bole to kya bole uttrakhand meie bawa ramdev apna aur hamra kaam bol kar chaladeytey hain baki desh meie hamrey asiey asiey leder hamari aguwai kartey hain k haum thhekey huye ho ya na ho woh bol kar hamari jaan bacha leytey humm ko cheek kar nahi bolsaktey bihar meie laloo hi bahut hai issliy hamdesh ki janta ko pasand hain hamrey naam aur kaam ko sabhi jaantey hai humey yeh kursi kyun mili hai isko humey kis prakar nibhna hai tabhi hamrey desh ke gaon meie padney wale bachhon ko yeh bhi nahi pata hum iss deh meie kya hai hamri baaton ko aur log kartey desh ki haalt ke woh jaagirdaar hain hum issliye thhak jaatey hain ki hummey yeh dekhna hai kaun hamri jaga bola sahi hai ya galat kyunki humey bhi upper jawab dena hota haihamko desh ki har samsya ke liye har meeting meie bhi rahna zaroori hai per hum nahi huye tab kya hua hamrey p.a. hi hamrey binbaat puri kardey hain asia hi sahi hamarithankan ko woh kisi per hona nahi deytey abhi bimar padey desh ka kaam nahi ruka hum kahin ho ya na ho desh ka kaam nahin ruk sakta yahi hamri party ki lokpriyta hai issiley ham ko desh ka asia p.m.banayaga hai hum kuch bolna bhi nahi chhatey aur hamrey bagger bole desh chalta rahey yahi hamri desh ke saat subhkamnaye hain…………….jai jaihind……jaihind

kamlesh pandey, haldvani के द्वारा
September 12, 2010

सर, प्रणाम !…वो बीमार नहीं, थके हुए हैं। तभी तो देश भी थका जा रहा है,

prakash chandra के द्वारा
September 12, 2010

श्री विष्णु जी सदा सहाय. जिस जंगल का शेर थका हो उसकी बकरियों का क्या होगा . आस पास के गीदड़ और सियार मौका पाते ही मुह मरने आ जाते हैं . शेर की ताकत उसकी हुंकार में होती है और यदि शेर हुंकार ही भूल जाये तो फिर सियार भी उसे मुह चिढाएगे ही .

Ashok Singh Bharat Dainik Jagran के द्वारा
September 8, 2010

विष्णु जी, सादर अभिवादन, वो बीमार नही, थके हुए है..बड़ा ही सटीक उत्तर है। चूंकि आपका निबंध पठनीय होते हुए भी कंपोजिंग की समस्या के चलते अपठनीय ही रहा है। अच्छा होता कि इसमें कुछ सुधार कर लिया जाए तो ज्यादा ही मजा आएगा, पढ़कर प्रतिक्रिया व्यक्त करने में। वैसे मैंने आपकी सुंदर फोटो देखर सोचा शायद आपका मंथन चिंतन भी उतना ही सुंदर होगा। पर न पढ़ पाने की मजबूरी में आपकी फोटो को देखकर ही संतोष कर लिया। आप खुद भी लिखने की (कंपोजिंग) आदत डाले। क्योंकि आलेख के बीच का जीरो हर जगह बाधा बना हुआ है।

गणेश जोशी, हल्द्वानी के द्वारा
September 2, 2010

अगर इस तरह के खास मौको पर ही हमारे देश के प्रधानमंत्री थक जायंगे तो पहले से ही थका हुआ हमारा मुल्क कैसे प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है…कैसे विजन २०२० का सपना साकार हो सकेगा….

    Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
    September 18, 2010

    जोशी जी अपने बिलकुल ठीक कहा है.

ashvini kumar के द्वारा
August 28, 2010

त्रिपाठी जी गृहमंत्री जी जब ऐसे हैं तब वह तो प्रधानमन्त्री हैं उनके बारे मे कहना ही क्या

अरविन्‍द पारीक के द्वारा
August 24, 2010

त्रिपाठी जी निस्‍संदेह आपने चरित्र चित्रण खुब किया है । हम केवल सांसद चुनते हैं हमें तो अब ये भी पता नहीं होता कि सरकार किस पार्टी की होगी व प्रधानमंत्री कौन होगा । इसलिए यदि उम्र अधिक है तो वह प्रदर्शित तो होगी ही ।  अरविन्‍द पारीक http://www.bhaijikahin.jagranjunction.com

s.p.singh के द्वारा
August 24, 2010

लगता है लेखक महोदय किसी अवसाद से पीड़ित हैं या किसी ख़ास विचार धारा के पोषक हैं क्योंकि उन्हें डाक्टर मनमोहन सिंह का नाम भी अपने लेख में लिखने में शायद कुछ कठिनाई हो रही थी \ अच्छा होता की वह अपने लेख में उनके पूर्वर्ती प्रधान मंत्रियों के भाषणों से तुलनात्मक व्याख्या करते तो कुछ रोचकता झलकती | यह इतिहास का सत्य है कि कुछ प्रधान मंत्री ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने न तो संसद का सामना किया और न ही लालकिले से भाषण ही दे पाये थे, जो मनमोहन सिंह जी से पहले लगातार छ: वर्षों तक भाषण दे चुके हैं क्या उन्होंने ने लालकिले के प्राचीर से पडोसी को दी गई चेतावनी पर कभी अमल किया था \ स्वाधीन भारत में एक सबसे बड़ी आजादी है बोलने लिखने की पूर्ण सवतंत्रता \ लेखक को शालीनता का परिचय अपने लेख में देना चाहिए था \ लगता है की लेखक बहुत ही युआ हैं जो शायद बुजर्गों की खिल्ली उड़ाने के अभ्यस्त है और मैं आशा भी करता हूँ की लेखक कल्पना करें की जब उनके पिता श्री ८० वर्ष के होंगे तो वह कैसे व्यहार करेंगे तब उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? ////////////एस.पी.सिंह. मेरठ

    Munish के द्वारा
    September 1, 2010

    एस पी सिंह जी लगता है आप लेख को उपर उपर से ही पढ़ गए या आपकी समझ में नहीं आया, इस लेख में कहीं किसी बुजुर्ग का अपमान का अपमान नहीं है. केवल एक लाचार प्रधानमंत्री का चरित्र चित्रण है, त्रिपाठी जी बहुत खूब.

    rakeshpandey के द्वारा
    September 14, 2010

    sp singh ji kaun baat ka frastetion hai jo is jabardast lekh pe utar rahe hai, padhana sikhe maharaj

    Balvir के द्वारा
    September 15, 2010

    लेखक नें तो वही लिखा है जो उसने महसूस किया उस अवसर पर।  सच में एसपी सिंह सच काफी कडवा होता है और देश की बात करते हैं  और पार्टी के स्वार्थ में लालकिले से भाषण दिलवाते है आप ठीक कहते हैं कि जब लेखक 70 साल के होंगे तो कैसे व्यवहार करेंगे वो वह ही जाने  पर लिखने की आजादी सभी को है पर क्या 64 साल की आजादी के बीतने पर  भी देश का हाल भी जानते हैं और इन सालों में इसी पार्टी का राज ज्यादातर रहा है  तो इन सालो में देश ने तो बहुत तरक्की की पर जनता वहीं लालकिले के निचे ही भाषण  सुनती रही। और आज भी इसी इंतजार में है। कब तक पार्टी का प्रधानमंत्री लालकिले  से देश के लिए भाषण दे… कब तक पार्टी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को थोपती रहेगी।  बस 5 साल का शासन करना है और भविष्य की योजना बनानी है । लेखक ने जो  देखा वो लिखा है देश के हित में न कि पार्टी के हित में। लगता है सच जान कर  आपको काफी तकलीफ हुई होगी क्यों कि पार्टी के आप भी भक्त लगते हो न देश के।   देश को तो आज अच्छे नेता चाहिए न की पार्टी के प्रचारक। आपको भी पार्टी भक्ति छोड़कर देश और समाज के लिए कुछ सोचो दोस्त।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
August 23, 2010

त्रिपाठी जी अभिवादन, हम प्रधानमंत्री या मंत्री को कहाँ चुनते है ? हम तो पार्टी विशेष को ही चुन पाते है. प्रधानमंत्री या मंत्री को तो पार्टियाँ ही चुनती है. जाहीर है वे अपना ही भला देखेंगी. एसे में प्रधानमंत्री या मंत्री अपनी पार्टी का ही तो भला करेगा. वह और कर भी क्या सकता है ? वास्तव में इसमें किसका दोष है, ये विचारने की बात है. उस जगह यदि आप होते तो शायद आप भी बीमार नहीं थके हुए ही होते. धन्यवाद.

omprakash pareek के द्वारा
August 23, 2010

त्रिपाठीजी, एक बात छोट गयी . अभी कुछ दिन पहले चेतन भगत का TOI में एक व्यंग्य “The PM and the Speech Writer” प्रकाशित हुआ था . शायद आपने पढ़ा होगा और अगर नहीं पढ़ा हो तो जरूर पढियेगा हालाँकि आपका पीस इक्कीस है पर वो भी अच्छा है . O.P.Pareek

omprakash pareek के द्वारा
August 23, 2010

त्रिपाठीजी, आपका \" वो बीमार नहीं थके हुए हैं\’ देखा. इतना अच्छा व्यंग्य बहुत कम लोग लिख पाते हैं. अब हिंदी में शरद जोशी, हरिशंकर पारसी और श्रीलाल शुक्ल जैसे व्यंग्यकार नहीं रहे. आपका लेखन देख कर आशाएं जाग उठी. इस लेख की विषय वस्तु के बारे में क्या कहूं. अंतिम वाक्य में सारा निचोड़ आ गया कि \"अगर वो थके होने के कारन ला किले कि प्राचीर से भाषण नहीं बांचते तो इस मुल्क कि सेहत पर क्या असर पड़ता.\" बस आप तो ऐसा ही सुन्दर व्यंग्य लेखन करते रहिये. यही माँ भारती कि सच्ची सेवा है. ओम प्रकाश पारीक

अनिल पांडेय के द्वारा
August 21, 2010

बहुत ही शानदार सर। कमोबेश यही सच है।

    Satch के द्वारा
    May 25, 2011

    AFAIC that’s the best asewnr so far!

Mahendra Tripathi, Jagran के द्वारा
August 19, 2010

आदरणीय भैया जी प्रणाम इतनी उम्र में थोपे जायेगे तो थकना ही है,मजबूरी वाले पी एम कहा जा सकता है, जहां तक बांचने का सवाल है,लगता इन लोगों को अपने बोलने पर विश्‍वास नहीं है, आजकल बांचने वाले ज्‍यादे हो गये है बढिया सटीक समय पर सटीक विचार प्रवाह मिला, अब तो जंक्‍शन पर बार बार आना पडेगा, सादर, महेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी, देवरिया ,यूपी

Mrigank Panday के द्वारा
August 19, 2010

फिल्में समाज का और समाज फिल्मों का आइना होता है-दोनों एक दूसरे पर अपनी छाप छोड़ते हैं। दरअसल ‘वो’ मूक अभिनय (साउंड लैस) की फिल्मों के दौर में जन्मे हैं, इसलिए बे-आवाज हैं। प्रचीन संस्कारों में बंधे हैं, इसलिए महिला स्वर को मातृ आदेश मानकर सकारात्मक लहजे में गर्दन हिलाने भर का काम (अभिनय) करते हैं। प्राचीन संस्कारों व अनुशासन के बंधन में ही वो स्कूली दौर में चोरी-छिपे सोहराब मोदी और पृथ्वीराज कपूर सरीखे बुलंद आवाज वाले सिनेमा तक पहुंच नहीं सके। वैसे भी भारतीय राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रपिता के स्मरण बिना पूरा नहीं हो सकता, जिनके आदर्श तीन बंदर बिन बोले इशारों से ही अपनी बात कहते हैं।

    Mohammad.Khalid.Khan.Bareilly के द्वारा
    September 18, 2010

    पांडे जी आपकी कमेंट्स का अंदाज़ लाजवाब है.

    Linda के द्वारा
    May 25, 2011

    It was dark when I woke. This is a ray of snushnie.

ALOK MISHRA के द्वारा
August 18, 2010

रोचक, सटायर, वर्तमान हालातों पर करारा प्रहार….. शायद ये शब्‍द बेमानी हैं आपके द्वारा गूंधे गये शब्‍दों के आगे।

    Banjo के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow! Great thkiinng! JK

    Stone के द्वारा
    May 25, 2011

    AFAIC that’s the best aswner so far!

सत्येंद्र मिश्र के द्वारा
August 17, 2010

धन्यवाद! चलिए आप का यह आलेख नहीं पढ़ता तो पता भी नहीं चलता कि वह बोल रहे थे। वैसे अभी भी यह विश्वास नहीं हो रहा है कि वह बोल रहे थे। जितनी चाभी भरी सोनिया ने उतना चला खिलौना वाली स्थिति है।  सत्येंद्र मिश्र

    Mohammad.Khalid.Khan के द्वारा
    September 18, 2010

    क्या सत्येंद्र जी खिलौना इतने लम्बे समय तक चलता है आपकी बात में यकीन नहीं होता ?

    Lorene के द्वारा
    May 25, 2011

    HHIS I shuold have thought of that!

Anand rai के द्वारा
August 17, 2010

 vaah……..ऐसा लग रहा था कि चूंकि वो इस मुल्क के प्रधानमंत्री बना दिये गए हैं, इसलिए बोल रहे हैं। ऐसा भी लग रहा था कि वो बनाये हुए प्रधानमंत्री हैं, इसलिए वो जो बोल रहे हैं, वो बना-बनाया हुआ है। ऐसा भी लग रहा था कि 15 अगस्त के दिन इस मुल्क के प्रधानमंत्री को लाल किले की प्राचीर से बोलना ही होता है, इसलिए वो बोल रहे हैं। कभी-कभी ये भी लग रहा था कि वो जो बोल रहे हैं, वो उनसे बोलने को कहा गया है, इसीलिए बोल रहे हैं। दरअसल वो बोल भी नहीं रहे थे, कोई स्वतःस्फूर्त भाषण भी नहीं दे रहे थे, वो तो पढ़ रहे थे, बांच रहे थे।

August 17, 2010

आदरणीय भैया जी, वह इस लिए भी थकते जा रहे हैं कि उनके दौडने का मायने भी कांग्रेसी अपने अनुसार निकालने लगे हैं। मसलन मनरेगा उनके प्रधानमंत्री काल की उपलब्धि है और कांग्रेसी इसे राहुल गांधी की पैदावार बताते हैं। वह भी तब जबकि राहुल न तो ग्रामीण विकास मंत्री हैं और न ही  कैबिनेट के हिस्‍से। शानदार लिखा है आप ने

BHARTIYA BASANT KUMAR के द्वारा
August 16, 2010

वो बीमार नहीं थके हुए हैं…….. पढ़ते हुए, पढ़ने के बाद कई चीजें घटित हुईं। पलटता हूं तो सब एक-दूसरे से जुड़े दिखते हैं। ब्‍लाग पर आपको पढ़ रहा था तभी टीवी पर आरबीआई का नोटों की पहचान वाला विज्ञापन आ रहा था, जिसमें दादा अपनी पोती से संवाद कर रहे हैं—असली नोट की पहचान, बापू वाली तस्‍वीर का वाटर मार्क। 63 साल में कहां पहुंच गये बापू। विदेशी कंपनी की कलम की निब से नोटों के वाटर मार्क तक। एजेंसी के ट्रैक पर संसद ठप के साथ ही संसद से जुड़ी डेढ़ दर्जन खबरों के बीच वह खबर भी , जिसमें छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के सांसद चरणदास महंत की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन सचिवों के वेतन से एक रुपया अधिक यानी.80, 001 रुपये प्रतिमाह वेतन देने की सिफारिश की है। खैर, इसे यहीं समाप्‍त करते हुए मैं आपके उठाए मुद़दे पर ही चलता हूं, चूंकि इस युग का केंद्रीय प्रश्‍न यही है। केंद्रीय प्रश्‍न……..इसलिए चूंकि राजनीतिक पार्टियों के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लगभग ठप पड़ जाने ने एक बड़ा शून्‍य खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि बिना एम्प्लीफायर सिस्टम के सपोर्ट के जिस वाणी में ओज होना चाहिए, वह इस सपोर्ट सिस्‍टम के बावजूद लाल किले की प्राचीर पर घरघराता दिखा। दीगर यह कि आपने इसे महसूस किया, लिखा और हम सब आपको पढ़कर महसूस कर रहे हैं। सोचने को बाध्‍य हो रहे हैं। बहुत पहले की बात। एक सभा में नेहरू जी से एक आदमी ने पूछा था कि आजादी के दस साल बीत गये और मेरे पास रहने को घर नहीं, काम करने का साधन नहीं है, ऐसे में आजादी का क्‍या मतलब है? उस समय नेहरूजी ने कहा कि आजादी का यही मतलब है कि देश के प्रधानमंत्री से तुम यह सवाल कर रहे हो। गुलाम भारत में यह संभव नहीं था। कितना बड़ा फर्क आ गया। आज के प्रधानमंत्री के खुद की अभिव्‍यक्‍ित की आजादी एक नहीं दो जोड़े हाथ तय कर रहे हैं। 300 करोड़पतियों की जुटान वाली संसद और दूसरी ओर कई करोड़ लोगों की आय एक दिन में बीस रुपये से ज्‍यादा नहीं। ऐसे देश में जी रहे हैं, हम।

    Bryson के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow! That’s a really neat asnwer!

डा शैलेन्‍द्र मणि त्रिपाठी के द्वारा
August 16, 2010

ठीक कहा आपने । सटीक, समीचीन और तथ्‍यपूर्ण टिप्‍पणी के लिए बधाई। साथ चलने वाले और साथ देने वाले लोग हमजुबां न हो तो इंसान थक ही जाता है।

upendrapandey gkp के द्वारा
August 16, 2010

आपने बिल्कुल सटीक लिखा है,इतना बोझिल और ऊबाऊ भाषण अब तक किसी प्रधानमंत्री का नहीं रहा। वैसे तो मनमोहन सिंह के जितने भी भाषण अब तक लालकिले से हुए हैं प्रायः नीरस ही रहे हैं लेकिन उन सभी भाषणों से इस 15 अगस्त पर दिए गए भाषण की तुलना की जाए तो उसमें इसकी रेटिंग नंबर वन होगी। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री जी भाषण बांच रहे थे। उनके भाषण में केवल समस्याएं थी,समाधान नहीं। एक समय था जब पंिडत नेहरू,इदिरा जी और वाजपेयी जी बोलते थे तो पूरा देश उनके भाषण को दम साधे सुनता था। और तो और इतना बोगस भाषण तो देवगोड़ा जी का भी नहीं रहा। कल कांग्रेस प्रवक्ता भी चैनलों पर प्रधानमंत्री के भाषण के पक्ष में वकालत कर रहे थे लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी। जिस देश में 80 रुपए किलो दाल बिक रही हो,कश्मीर में आतंकवादियों और दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हाथों सुरक्षा बल के जवान शहीद हो रहे हों। जिस प्रधानमंत्री के आदेश की उसकी कैबिनेट के सदस्य ही अनदेखी करते हों तो इससे ज्यादा दुखद स्थिति क्या हो सकती है। दस जनपथ के रिमोट से प्रधानमंत्री का दिमाग कब तक चलता रहेगा,यह एक बड़ा सवाल है। शायद तब तक जब तक कि युवराज इस योग्य नहीं हो जाते। आदरणीय विष्णु जी इस सामयिक पोस्ट के लिए लिए बधाई। 

    Tracen के द्वारा
    May 25, 2011

    You’re a real deep tnhiker. Thanks for sharing.

Sanyam kumar, Patna के द्वारा
August 16, 2010

आदरणीय भैया प्रणाम आपने दो पात्रों के माध्यम से कुछ मुद्दे उठाये हैं। बिलकुल प्रासंगिक। लगता तो यही है कि विश्वशक्ति के रूप में तेजी से उभरते भारत का फिलहाल  दुल्लर चच्चू या  बबोल चच्चू ही नेतृत्व कर रहे हैं। यदि बटन मां-बेटे को ही दबाना है तो  बगैर जुबान का अर्थशास्त्री क्या दु्ल्लर और बबोल चच्चू भी चलेंगे। आइये हम यही कामना करें कि हमारा भारत न कभी बीमार हो और न थके।  संयम, पटना   

    Brandywine के द्वारा
    May 25, 2011

    YMMD with that anwesr! TX

vipul chaturvedi के द्वारा
August 16, 2010

sir apka lekh desh ki sachchai ko bayaa krne wala hai. ise padhne k baad shayad ye khayal aana laajmi hai ki hamare dheere-dheere aage badte is desh ko boode haatho ki nhi majboot kandho ki jarurat hai, jo ki ek yuva k hi ho sakte hai. lekin aisa lagta hai ki kamjor ho chuki haddiyaan ya to yuvaao par vishwas nhi krna chahti ya fir unhe dar hai ki kahi yuva unki jagah par kaabij na ho jaye aur yahi dar meri samajh se desh ko us gati se aage badne se rok raha hai, jisse use badna chahiye. yuvaao ko bhi mauka milna hi chahiye, kyoki boodhe bhi kabhi yuva the.

आर.एन. शाही के द्वारा
August 16, 2010

अपनी विशेष रोचक शैली में स्थितियों को चलचित्र की भाँति दर्शाने में आपका जवाब नहीं त्रिपाठी साहब, बधाई! वास्तव में दुखी करने वाला व्यंग्य । कब तक झेलना होगा देश को इन तथाकथित ईमानदार अर्थशास्त्री, लेकिन कमज़ोर, लाचार और रबर-स्टाम्प माननीय को, यह तो समय ही जाने । … शाही ।

अतुल चतुर्वेदी के द्वारा
August 16, 2010

उनकी चिंचियाती और गले में फंसी आवाज के कारण जो वह कह नहीं सकते, उसको बे‍हतरीन तरीके से प्रस्‍तुत कर आपने निश्चित रूप से उनकी मदद ही की है

anal patrwal के द्वारा
August 16, 2010

really interesting

vivek tripathi के द्वारा
August 16, 2010

Admirable sattire. Really amazing visualisation and expression.

    Medford के द्वारा
    May 25, 2011

    Home run! Great sluggnig with that answer!

aditya के द्वारा
August 16, 2010

अच्छा लेख है सर, लेकिन एक बात कहनी है की मनमोहन जैसा लाचार प्रधानमंत्री आज तक नहीं हुआ इस देश में

Sudhir Kumar के द्वारा
August 16, 2010

वाह, अदभूत शैली में लिखा है आपने, और बीच-बीच में आपके “पंच” बहुत कुछ सोचने को विवश करते हैं। राहुल से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स पर, और उनके स्वास्थ्य से लेकर उनकी मजबूरियों और उनकी ‘आजादी’ तक, बहुत ही सपाट शब्दों में बहुत कुछ कह गये आप… लाजबाब।

Sudhir Kumar के द्वारा
August 16, 2010

वाह, अदभूत शैली में लिखा है आपने, और बीच-बीच में आपने “पंच” बहुत कुछ सोचने को विवश करते हैं। राहुल से लेकर कॉमनवेल्थ गेम्स पर, और उनके स्वास्थय से लेकर उनकी मजबूरियों तक, बहुत ही सपाट शब्दों में बहुत कुछ कह गये आप… लाजबाब।

नवीन भोजपुरिया के द्वारा
August 16, 2010

सादर प्रणाम विष्णु भईया … एक तानाशाह से लोकतंत्र / प्रजातंत्र का सफर वो भी आपके साथ , वाकई बेमिशाल रहा । सीधे सपाट व्यंग्य तो आज कल टिनहिया ( धम धम बजने वाला ) भी कर लेता है लेकिन आपने जिस अँदाज मे संसद को हिला दिया है शायद शिल्पा शेट्टी भी अगर जान जाय तो शर्मा जाय । अरे विश्वास किजिये , हम सही कह रहे है , आज के लेखन शैली मे जिस प्रकार का अकाल आया है जैसे लग रहा है कि मल्लिका शेहरावत ने नई डिजाईन की फरमाईस कर दी हो । लेकिन आपके लेखन शैली को पढने के बाद ऐसा लग रहा है की भारतीय पहनावे मे कोई दुल्हन दास्तान ए हिन्द को प्रस्तुत कर रही हो । वाकई समस्याये विकराल है तेज का बहुत अकाल है कोई कहे महाकाल है कोई कहे विकराल है यह तो हर साल है इसी बात का बवाल है वो ना तो काल है और ना ही बवाल है यह तो प्रजातंत्र का सुरतेहाल है जनता हर तरह से बेहाल है आम आदमी फटेहाल है गाँव बन रहा कंकाल है शहर मे मचा धमाल है नेता जी मालामाल है जिस प्रकार से हमारे शीर्ष के नेता अपनी रंग रोगन से देश के अस्मिता को और फटेहाल बना रहे है उस चीज को  आपने बहुत ही बेहतरीन , लाजवाब और उम्दा तरिके से दिखाया है । हम विश्लेषण नही करेंगे क्योकि सब कुछ आपने कह दिया है अब तो बस बुझो तो जाने वाला हिसाब किताब है । राजु भईया को धन्यवाद कोटिशः धन्यवाद जो हमे एक बार फिर से मौका दिया यहा तक आने के लिये । आपको कोटि कोटि धन्यवाद जो आपने अपनी लेखन शैली से हम जैसे पतझडिये आदमी को वसंत की सौगात दे दी शायद सावन भी इसी मे है .. धन्यवाद नवीन भोजपुरिया

Parvinder SIngh के द्वारा
August 15, 2010

प्लेअसे ऐसा मत लिकिये .. शायद आपको मालूम नहीं है की एक रेमोते से चलने वाले यन्त्र का अपने ऊपर कुछ कण्ट्रोल नहीं होता.

shatrughan sharma के द्वारा
August 15, 2010

INDIA become power full country but our PRIME MINISTER become weak ………? it is not real DEMOCRATIC face.. we should powerfull pm…. not remot prime minister… manmohan singh can do better but he already surrender at 10 janpath.. SIR aapne yahan desh ki polyticle situation ki jo tasveer khinchi he .. realy it is serious… how we can celebrate 15 aug freely . when dal 90 per kg. evry point on gun point. naxali operat parallel govt in india MY GOD

kumar peyush के द्वारा
August 15, 2010

विष्णु भाई, पहले तो इतनी सुंदर, परिपक्व व नियंत्रित भाषा, शैली और प्रवाह के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें। लखनऊ से कानपुर जद में लगता रहा होगा, किंतु अब दिल्ली आने के बाद माटी से दूर होने की कसक और उस खुशबू को पाने व बिखेरने की ललक आपकी लेखनी से झलकती है। जिससे पत्रकारिता तो समृद्ध हो ही रही है, हम जैसे तमाम लोग जिन्हें रोजी-रोटी की तलाश वतन से दूर ले आई है, को न सिर्फ अपनी माटी से जोड़ती है अपितु आपसे भी ए क चीन्हा-अनचीन्हा रिश्ता स्थापित करती हैं। बुकनू की कहानी हो या बसंत की महिमा या पीए म की निर्मम समीक्षा, सभी को पढ़कर आनंद आ गया। ब्लाग के साथ-साथ इन तरह के आलेखों को अखबार में भी स्थान मिलना चाहिए । यह मेरा निजी अनुरोध है कि आप आदरणीय काका और शेखर जी को भी इसके लिए प्रेरित करें तो पत्रकारिता में स्थापित और आने वाले तमाम लोगों के लिए ए क उच्च मानदंड व दिगदर्शन होगा

lalita pradeep के द्वारा
August 15, 2010

इस उम्र में और क्या उम्मीद होगी. इस देश में वृद्धा अवस्था न जाने कब मौलिक अर्हता से अलग की जाएगी……

    Lainey के द्वारा
    May 25, 2011

    You’re the one with the brains here. I’m watichng for your posts.

Om Prakash Tiwari के द्वारा
August 15, 2010

खड़े कांच के बॉक्स में बोलें पंतप्रधान,  मरी-मरी आवाज है लगती उन्हें थकान ।  लगती उन्हें  थकान दिख रहे बिल्कुल टायर, फिर भी मैया उनको करती नहीं रिटायर ।  जब तक कि युवराज नहीं हो जाएंगे बड़े, तब तक बुत की तरह महाशय रहेंगे खड़े । 

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 16, 2010

    वाह! आपने तो और कमाल कर दिया … बधाई ।

    Twiggy के द्वारा
    May 25, 2011

    That’s 2 cleevr by half and 2×2 clever 4 me. Thanks!

राजू मिश्र के द्वारा
August 15, 2010

वैरीगुड…पढ़ते हुए लग रहा है जैसे लालकिले के प्राचीर से सरदार जगदेव सिंह की कमेंट्ररी सुन रहा हूं…लेकिन खूब तंज कसे…मजा गया…मनमोहन सिंह की आवाज हमारे गांव के मोती से भी बहुत मेल खाती है…एक निरीह तांगेवाला, बेबस। बढि़या खाका खीचने के लिए

    Dharmesh Tiwari के द्वारा
    August 19, 2010

    namste-sar kafi kuchh sikhne ko mila aapke iss lekh se, jabab nahi iska


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