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मुन्नी बदनाम हुई केखे लिए...

Posted On: 14 Nov, 2010 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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ईद की पूर्वसंध्या थी। कानपुर से चली फरक्का एक्सप्रेस ने टूंडला में हाथ-पांव खड़े कर दिये। बताया गया कि हथिनीकुंड बैराज के सौजन्य से कालिंदी इस कदर हहरा रही हैं कि दिल्ली में अंग्रेजों के जमाने का इस्पाती रेलवे पुल बंद कर दिया गया है। इसलिए ट्रेनों को उनकी औकात के मुताबिक यथास्थान विचलित-स्थगित-निरस्त किया जा रहा है। रास्ता यही था कि टूंडला से आगरा जाएं और वहां से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंचें। आनंद शर्मा देवदूत बनकर अवतरित हुए, टूंडला से पिकअप किया और हम आगरा के लिए निकल पड़े। मोबाइल के मुताबिक टाइम था रात का एक बजकर 46 मिनट। रास्तों पर आमदरफ्त तो कतई नहीं थी लेकिन सन्नाटा नहीं था। हर 50-100 मीटर पर कर्णशूलक गीत-संगीत। दरअसल मुझे कल्पना नहीं थी। मैंने सवालिया निगाहों से देखा तो आनंद भाई का आगराइट अंदाज में जवाब था, लौंडे हैं, त्यौहार सेलिब्रेट कर रहे हैं। मेरी गुजारिश पर एक सेलिब्रेशन प्वाइंट पर कार थम गई और हम भी कुछ दूर से ही सही सेलिब्रेशन का एहसास जज्ब करने लगे, कंसीव करने लगे। मेरे लिए ये नया एक्सपीरियेंस था। होली पर तो देखा था, जगह-जगह म्यूजिक सिस्टम लगाकर होरिहारों या हुड़दंगियों का इस तरह का सेलिब्रेशन, लेकिन ईद के बारे में ऐसी कल्पना नहीं थी। ये भी हो सकता है कि ईद के मौके पर इतनी रात हम पहली बार इस तरह निकले हों। सेलिब्रेशन की लोकेशन का सीन कुछ इस तरह था, सड़क पर कई कोणों से लाइट्स लगी थीं, जो सेलिब्रेशन प्वाइंट को चकमक कर रही थीं। सड़क किनारे तख्त या चबूतरों पर म्यूजिक सिस्टम आसीन था। उसके ऊपर हरे रंग का सिल्की बैनर भी दिखा, जिस पर बड़े-बड़े हरफों में ‘ईद मुबारक’ लिखा था।

ऊपर जो लिखा है, वो अगर हम नहीं भी लिखते तो इस लिखे हुए पर और इसे पढ़ने वालों पर पड़ने वाले  इंपैक्ट में कोई खास बदलाव नहीं होता। लेकिन बात कहीं से तो शुरू करनी ही होती… और तब जब बात मुन्नी की हो रही हो। म्यूजिक सिस्टम पर जो गाना बज रहा था, वो कुछ अलग था। यही वजह है कि दिमाग की सुई उसी पर अटक गई।…और उस सेलिब्रेशन में जितने लोग मौजूद थे, वो सब भी उस कुछ अलग लगने वाले खास गाने पर अटके, लटके और मटके हुए थे। लोगों का जो अटकना था वो अटक रहा था। लोगों का जो लटकना था वो लटक रहा था। लोगों का जो मटकना था वो मटक रहा था। मेरा सिर्फ दिमाग अटक गया। मुझे तो लगा कि म्यूजिक सिस्टम भी उस गाने पर अटका हुआ था क्योंकि हमें वहां थमे हुए सात-आठ मिनट हो चले थे लेकिन वो गाना थमने का नाम ही नहीं ले रहा था या ये भी हो सकता है कि जो लोग उस गाने पर थमने का नाम नहीं ले रहे थे, वही म्यूजिक सिस्टम को भी उस गाने पर थमने से रोक रहे हों। गाने का ध्रुवपद कुछ इस तरह था…मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए। गाना लगातार बज रहा था और जो सेलिब्रेट कर रहे थे, वो अपने-अपने अंदाज में थिरक रहे थे। मैंने थिरकने वालों में खास बात देखी कि वो जोड़ों में थिरक रहे थे, मटक रहे थे या फुदक रहे थे। वो जोड़े एक दूसरे के 63 थे, सम्मुख, आमने-सामने। वो लगातार एक दूसरे पर आंखें काढ़े हुए थे, जिसे हम (अ) सामान्य परिस्थितियों में एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालना कहते हैं। उनकी आंखें लगातार चार हो रही थीं, लेकिन निश्चित तौर पर वो, वो नहीं थे, जिनके लिए कुछ दिनों पहले एक (अ) प्राकृतिक कानून बनाया गया है। उनके घुटने एक सुनिश्चित अंश के कोण में मुड़े हुए थे। उन्होंने अपने दोनो हाथ सांप के फन की तरह काढ़े हुए थे। जब उनकी स्प्रिंगनुमा गर्दनों पर टिके हुए सिर भरतनाट्यम शैली में आगे-पीछे हो रहे होते तो उनकी आंखें और ज्यादा एक-दूसरे पर फटी हुई दिखतीं, जिनके लिए प्रतिष्ठित साहित्यकार विस्फरित नेत्र जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं। उनके फन की मुद्रा में तने हुए हाथ एनसीसी वाली लेफ्ट-राइट की तरह कोहनियों से आगे-पीछे हो रहे थे। वो लगभग 30 अंश मुड़े हुए घुटनों के बल पर कंगारुओं की तरह आगे-पीछे फुदक रहे थे। कोई भी ये बात आसानी से समझ सकता था कि वो ये सब सिर्फ और सिर्फ मुन्नी के लिए कर रहे थे। मैं उस नर्तक समूह में एक संप्रदाय देख रहा था, मुन्नी संप्रदाय। वो सब मुझे परम साधिका मुन्नी के अनुगामी लग रहे थे। वो अस्तव्यस्त होते हुए भी नर्तन की तमाम मुद्राओं में अंतर्व्यस्त होते हुए मुन्यातुर हुए जा रहे थे, मुन्याकांक्षी हुए जा रहे थे, मुन्याभिलाषी हुए जा रहे थे। वो मुन्नी, जो निस्वार्थ कर्मयोगी है, दूसरों के लिए समर्पित है। वो मुन्नी,  जो परम संन्यस्त है, दूसरों के लिए न्यस्त और व्यस्त (बदनाम) है। जो सत्य की साधक-शोधक है, इसलिए बिना लाग-लपेट ये मंजूर कर रही है कि हां वो बदनाम हो गई है, बदनाम हो चुकी है (और आगे भी बदनाम होने को उत्सुक रहेगी)। यह स्वीकारोक्ति वह ऐसे-वैसे नहीं, गाते हुए, नाचते हुए, ठुमकते हुए कर रही है। उसकी यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी प्रेरणाप्रद लग रही है कि वो यह स्वीकारोक्ति किसी अदालत के कठघरे में नहीं, हाईकमान की वर्किंग कमेटी में नहीं, बास के केबिन में नहीं, थाने की हवालात में नहीं, राखी का इंसाफ में नहीं बल्कि एक दबंग थानेदार को सरेआम अपनी अंगुलियों में थिरकाते हुए कर रही है।

गाने के दौरान मुन्नी जब भी बदनाम होती तो तेबारी हो जाती, तिवारी हो जाती, त्रिपाठी हो जाती। वो तीन बार पाठ करती…तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। डार्लिंग! तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। इस त्रिपाठ में एक अदभुत लास्य भाव की अभिव्यंजना है। ललित मिश्रित कामोद और हंसध्वनि की वर्णसंकर भैरवीआइट रागात्मकता है। इस तेबार में जहनी रूमानियत से भरपूर एक Commune Compelism है, जो ‘तेरे लिए’ को ‘तेरे लिएsm’ में Convert कर देता है, Conversion के लिए बाध्य करता है, अंतःप्रेरित करता है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए की बारंबारता से अभिप्रेरित ‘तेरेलिएsm’ है और इसके  पीछे जो Compelism है, वो समर्पण का चरम बिंदु है, जिसकी मासूम चाहना है, उसके लिए सब कुछ खो बैठने का एवरेस्ट प्वाइंट है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए है, वो आग्रह, चाहत, समर्पण और उसी में विलीन हो जाने का compilation (कंपाइलेशन) है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए है, वो लास, रास और दास भाव की लाइफस्टाइल मैगजीन कवर स्टोरी का  पैकेज प्लान है, जिसमें विजुअल प्रापर्टी सिर्फ और सिर्फ मुन्नी है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए का समुच्चय द्रुत आरोह है, वो निरंतर आरोहण की प्रक्रिया के बूते अभीष्ट की सिद्धि और उसे हासिल करने का अवरोहविहीन आध्यात्मिक उपक्रम है।

आखिर मुन्नी के पास है क्या? है, उसके पास मुन्नीत्व है। दरअसल वो अपने मुन्नीत्व के लिए बदनाम हुई है, हो रही है और आगे भी होती रहेगी। मुझे लगता है कि मुन्नी ने मुन्ना भाइयों के इस मुल्क में मुन्नीत्व के तौर पर एक नई विचारधारा का प्रतिपादन किया है। मुझे ये भी एहसास हो रहा है कि इस मुल्क में मुन्नीत्व के कायल होने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। त्वदीयं वस्तु गोविंदं की तरह मुन्नीत्व से प्रेरित लोग सिर्फ तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए की रंटत लगा रहे हैं। मैं कल्पना कर रहा हूं कि जिस देश में मेरे लिए, मेरे लिए, मेरे लिए की पुकार मची रहती थी, वहां तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए का मुन्नीत्व हिलोरें ले रहा है। लोग इसकी मांग कर रहे हैं कि तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मोरा, को नई राष्ट्र कविता का दर्जा दिया जाना चाहिए। नई दिल्ली स्टेशन से कनाट प्लेस जाने के लिए मेट्रो के एक कोच में घुसे तो देखा कि सीटें खाली पड़ी थीं और कई लोग फिर भी खड़े थे। मैने खड़े लोगों की ओर सवालिया निगाहों से देखा, उनमें से एक ने गले में पहना हुआ लाकेट मेरी आंखों के सामने कर दिया। मैंने देखा लाकेट में मुन्नी का सेवातुर चित्र  था और नीचे सत्यं-शिवम-सुंदरम की तर्ज पर लिखा था, तेरे लिए-तेरे लिए-तेरे लिए।

दरअसर मुन्नी बदनाम नहीं, सतनाम हुई है।





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127 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ravindra K Kapoor के द्वारा
December 6, 2013

मुन्नी के ऊपर आपका ये चुभता सा व्यंग के रंगों से आभूषित लेख पढ़ा और अपने को कुछ ठगा सा महसूस कर रहा हूँ. भारत का वर्त्तमान समाज जिस रंग में रंगता जा रहा है उसमे शायद मुन्नी भी अब पीछे छूट गयी है, पर ये कहाँ जाकर विराम लेगा ये कहना कठिन है. जब समाज में सामाजिक मूल्य खत्म होने लगते हैं तो ऐसे ही दृश्य उभर कर आते हैं त्रिपाठीजी. क़ानून और सामजिक नियमों को पालन करने वालों को गालियां मिलती हैं और मूल्य तोड़ने वाले भारत कि दुर्दशा को देख कर मन मसोस कर रह जाते हैं. रोज देर रात तक पुरे जोर शोर से लाउड स्पीकर पर ये मुन्नी वाले गीत एक जहर बन कर चारों ओर जिस वातावरण को बिखेर रहे हैं उसमें कभी कभी तो कोई गीत लिखने का मन भी उचाट होने लगता है. उन भावों को आपने अभूत सुंदरता से चित्रित किया है. मेरे अपने एक कुछ अलग से गीत को You Tube पर सुनियेगा, हो सकता है कुछ अच्छा लगे सुभकामनाओं के साथ…Ravindra K Kapoor

Dev raj kullvi के द्वारा
March 3, 2013

बहुत खूब

Santlal Karun के द्वारा
August 19, 2012

दौलत और शोहरत के लिए अश्लीलता-भोंडेपन की कलईदार उत्तेजक अभिव्यक्ति कोई हिंदी फिल्मों के नियंताओं से सीखे  –”मुन्नी” , ”शीला” - जैसे श्लील शब्दों के उज्जवल-संवेदनात्मक अर्थों को हम सभी ने किस कदर हाँफते-भागते, गिरते-पड़ते और लहू-लुहान होते देखा | किन्तु उनके द्वारा पूरी तरह रौंदे-गंदला किए गए “मुन्नी” - जैसे शब्द की भावोज्ज्वालता की पुनर्प्रतिष्ठापना का यह आत्म-व्यंजक, ललित विचार कितना सराहनीय है, यह कहने की आवश्यकता नहीं | त्रिपाठी जी, हार्दिक साधुवाद !

SATYA PRAKASH के द्वारा
July 15, 2012

NICE TRIPATHI JI

sp12 के द्वारा
July 15, 2012

TRIPATHI JI, HAME YE NAHI SAMAJH ME AA RAHA HAI KI AGAR MUNNI BADNAAM SE SATNAAM HO GAI HAI TO FIR YE BATAIYE KI ” MAYAWATI ” KO KYA KAHA JAYEGA???????????? PLEASE HAME JARUR BATAIYEGA…. PRAKASH0922@GMAIL.COM PAR

satya prakash singh के द्वारा
July 15, 2012

MUNNI SATNAAM HUI NETA TERE LIYE

Mohinder Kumar के द्वारा
April 25, 2012

त्रिपाठी जी खूब खाका खींचा है आपने. अगर मुन्नी सतनाम हुई तो फ़िर यह भी बता दीजिये कि “शीला” और “अनार कली” का क्या किया जाये ? ही ही हो हो.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 18, 2012

बहुत अच्छा | बधाई त्रिपाठी जी !!

rakeshvu के द्वारा
January 4, 2012

Very nice. Best line is first 2 line. Gr8

Pooja के द्वारा
October 8, 2011

bahut achaa laga munnikhand ka ye adhyaya padh k…..

Dortha के द्वारा
May 25, 2011

More posts of this qaultiy. Not the usual c***, please

जगदीश त्रिपाठी के द्वारा
May 7, 2011

गजब लिखे अहा भइया। अरे तो दुइय चीज तो मशहूर अहै। हथियार मा लाठी। या पंडितन मां त्रिपाठी।

SHANI RAI के द्वारा
January 31, 2011

बढ़िया तो है ,लेकिन एक सुझाव देना चाहता हु की थोडा शोर्ट में लिखा करे वो बेटर होगा ………धन्यवाद

नीरज नीखरा के द्वारा
January 31, 2011

विष्णु जी, आपके इस लेख की प्रशंसा के लिए मेरे शब्द कोष में शब्द नहीं हैं. अद्भुत, श्रेष्ठ, लाजबाब… और बदनाम से सतनाम की यात्रा में तेरे लिए समर्पण की अभिव्यंजना …. सर्वश्रेष्ठ.

    Terrah के द्वारा
    May 25, 2011

    Wow! That’s a really neat aswenr!

sandeep kumar के द्वारा
December 21, 2010

सर पता नहीं इस सुंदर लेख के लिए आपको धन्‍यवाद दूं कि मुन्‍नी को, जिसने आपको लिखने को प्रेरित किया। खैर, इस विवाद को छोड़कर मैं एक बार पिफर सतनाम मुन्‍नी की महत्‍ता भरा लेख पढ़ने जा रहा हूं।

Jogendra rajpoot के द्वारा
November 28, 2010

डियर सर , मुन्नी को लेकर किये गये आधुनिक संस्कृति के बखूबी चित्रण के लिए बधाई स्वीकारें । सर , मुन्नी ईद पर ही बदनाम नहीं हुई यह होली पर भी बदनाम होगी और हर उस पार्टी तथा सेलीब्रेशन में बदनाम होगी जहां दारूबाज और हुड़दंगी लौंडे मस्ती काटेंगे । आजकल पार्टी के नाम हो रहे भौंडे प्रदर्शन के लिए मुन्नी नहीं हमारी संस्कृति बदनाम हो रही है जो झंडू बाम होकर रह गई है ।

    Blue के द्वारा
    May 25, 2011

    I bow down hublmy in the presence of such greatness.

    horain fayyaz के द्वारा
    July 31, 2012

    लेख तो सुन्दर था ही लेकिन आपका कमेन्ट और भी प्रभावशाली है राजपूत जी … मुन्नी नहीं हमारी संस्कृति झंडू बाम होकर रह गयी है…पढ़कर मैं बिना मुस्कुराये नहीं रह सकी…

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 25, 2010

आदरणीय श्री त्रिपाठी जी, मुन्नी संप्रदाय से मिलवाया आपका धन्‍यवाद । चलिए किसी बहाने ही सही तेरे लिए तेरे लिए की विहंगम ध्‍वनि उत्‍पन्‍न तो हुई । क्‍या पता यह ध्‍वनि सभी कार्यो व क्षेत्रों में नजर आने लगें और लगे हाथो इस देश का कुछ भला हो जाए । हमारी जनसंख्‍या है अमेरिका, यूरोप, आस्‍ट्रेलिया…… तेरे लिए । हमारे खनिज भंडार है विश्‍व….. तेरे लिए । यह राग और यह ध्‍वनि हमारे देश में पहले से ही विद्यमान थी । बस अब मुन्‍नी के नाम से गुंजायमान हो रही है । लेकिन आपकी दृष्टि की दाद देनी होगी जो उसने कुछ समय में ही इतना कुछ देख लिया । लग रहा था कि कोई चलचित्र देख रहा हूँ । प्रत्‍येक अंग की मूवमैंट का वृहद वर्णन । सच अद्भूत । अरविन्‍द पारीक

shyamendra kushwaha के द्वारा
November 24, 2010

सर प्रणाम, अद्भुत।

    Liberty के द्वारा
    May 25, 2011

    That’s the best awsner of all time! JMHO

Satyendra Singh के द्वारा
November 23, 2010

भारतीय लोक संस्कृति में मुन्नी तो पहले से ही बद थी, बदनाम थी, चाहे उसका नाम जो भी रहा हो/ नई बात यह है कि अब उसकी बदनामी की बात व्यापक पैमाने पर होने लगी है/ ऐसा क्यों ? लोग चौंक क्यों रहे हैं ? कहीं हम अपनी लोक संस्कृति से विमुख तो नहीं हो रहे हैं ? फिर यह चर्चा अभी क्यों ? क्या इस कारण कि वैश्वीकरण के इस दौर में मुन्नी अपनी चाहत की अभिव्यक्ति में ज्यादा बोल्ड हो गयी है ? यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि मुन्नी एक पात्र है, जो पूरबी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचल में वर्षों से एक खास चरित्र की अभिव्यक्ति करती रही है/ एक भोजपुरी गीत में मुन्नी को उसका यार मिलने के लिए बुलाता है (साढ़े तीन बजे मुन्नी जरूर मिलना साढ़े तीन बजे )/ खैर, इस गाने का अतीत भी वहीं से जुड़ा है/ दबंग का यह गीत ‘ लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए, सलीमन तेरे लिए’ से प्रेरित है/ बाद में एक गीत आया ‘ लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए’ / दोनों में एक महत्वपूर्ण अंतर है – पहले लौंडा बदनाम होता था, अब लौंडिया बदनाम हो रही है/ यह बदलते परिवेश में मुन्नी के बोल्डनेस का सूचक है/ पहले की मुन्नी कुछ सहमी-सहमी सी थी, लेकिन अब उसमें अपनी चाहत की अभिव्यक्ति का साहस आ गया है/ बाजारवाद के इस दौर में ग्रामीण समाज की इस मुन्नी की अहमियत को फिल्म जगत ने भी पहचाना और उसे लपकने में कोई हिचक नहीं दिखाई/ एशिया महाद्वीप ही नहीं, अमेरिका तक को उसने हिला दिया / यह मुन्नी की ताकत थी, लोक संस्कृति की ताकत थी, जिसे बाजार ने पहचाना/ लेकिन इस बाजार ने इसके मूल स्रोत को उतना श्रेय नहीं दिया/ यही कारण है कि लोक संस्कृति से विमुख महानगर का अभिताज वर्ग इस पर चौंकता है/ वह वर्षा और बाढ़ को देखकर भी चौंकता रहा है/ यह तो उसकी आदत में शुमार है/ अब यदि ईद के अवसर पर कोई मुन्नी के गीतों पर थिरकता है, तो वह अकारण नहीं है/ ईद तो उसके लिए एक बहाना है/ दरअसल, मुन्नी उन्हें एक सांस्कृतिक पहचान देती है, एक सुकून देती है/ दिल्ली में रहने वाले बिहार के मजदूर सरस्वती पूजा करते हैं और उसी बहाने नाचते-गाते हैं/ आखिर विद्या की देवी से उनका क्या लेना-देना है ? उन्हें तो श्रम देवता की पूजा करनी चाहिए/ सवाल यह भी है कि ये लोग अंगरेजी या हिन्दी के शास्त्रीय गीतों पर इतना क्यों नहीं थिरकते हैं ? कहने का आशय यह है कि ‘मुन्नी संप्रदाय’ क्षेत्र, जाति व धर्म से परे है/ यह हीनता ग्रस्त नहीं है/ इसमें लोकानुरंजन है/ इसे अपनी संस्कृति पर गर्व है/ यह अभिताज वर्ग के सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देती है/ यह लोक की भावाभिव्यक्ति है/ इसका हमें सम्मान करना चाहिए/ विष्णु जी ने अपने यात्रा वृतान्त के जरिये मुन्नी के एक नए सांस्कृतिक पक्ष को उदघाटित किया है/ उनकी भाषा-शैली विषय के अनुरूप नर्तन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ती है/

    dinesh sharma के द्वारा
    December 3, 2010

    sir aapne bharat ki vaisi janata ki aawaz banane ki safal kosish ki hai, jo gungi hai. sadhuvaad

jlsingh के द्वारा
November 20, 2010

मेरे ख्याल से पीनेवाले को पीने का बहाना चाहिए. वो चाहे सरस्वती पूजा हो, नया साल का सेलिब्रेसन, या ईद, मुहर्रम, हर जगह मुन्नी ही बदनाम होती है या गुमनाम होती है. दरअसल हम इसी फूहड़ संस्कृति को विकसित समाज का रूप दे रहे है. या कह सकते हैं कि आज हम सभी इतने संतापग्रस्त हो गए है कि मस्ती का कोई भी पल खुशियों से भर लेना चाहते हैं. चे वह फूहड़ या अश्लील ही क्यों न हो!

    Starleigh के द्वारा
    May 25, 2011

    Now we know who the seibnsle one is here. Great post!

रामधनी द्विवेदी के द्वारा
November 19, 2010

वाह क्‍या कहने हैं, इस कहने के –और मुन्‍यातुरों, मुन्‍याकांक्षियों और मुन्याभिलाषियों के साथ ही प्रेरणास्‍पद मुन्‍नी के भी।

ramnathrajesh के द्वारा
November 17, 2010

मुन्नी की बदनामी नई बात नहीं है। वह तो जमाने से बदनाम होती रही है। नई बात उसका यह ऐलान है कि वह वह किसके लिए बदनाम हुई है। यही बेबाक अंदाज कथित उन्मुक्त समाज को भा गया है। परेशानी की बात यह है कि यह गाना कब्र में पांव लटकाए बूढे भी अपनों के बीच गा रहे हैं। ईद की मस्ती के दौरान रात में म्यूयजिक सिस् म पर यदि आंखें तरेरे मानसिक रूप से बच्चे और शारीरिक तौर पर युवा इस गाने पर अपने अंगों को मरोडते हुए अपनी कुंठा को अभिव्यक्त करते हैं तो कोई नई बात नहीं है। बीस साल पहले से यह परंपरा रही है कि छात्रावासों में सरस्वयती पूजा के दौरान छात्र रात में मां सरस्वती की प्रतिमा के सामने उस साल के सर्वाधिक प्रचलित गीतों पर डांस करते रहे हैं। वह गाना झूठ बोले कौआ काटे :::हो या कभी कभी मेरे दिल में याल आता हो हो। यहां एक बात जरूर स्परर्शी है कि आपने उनकी भंगिमाओं की जिन पैनी नजरों से व्याख्या की उसने उनके इस आइटम को जरूर गौर करने के काबिल बना दिया।

    Lola के द्वारा
    May 25, 2011

    I feel so much hiapepr now I understand all this. Thanks!

mrigank pandey के द्वारा
November 16, 2010

मुन्नी…कहने को सिर्फ ढाई अक्षर मगर आजकल यही शब्द ढाई आखर प्रेम का बना हुआ है। प्रेमत्व में मुन्नीत्व तक का सचित्र वर्णन वास्तव में सराहनीय, उल्लेखनीय, अनुकरणीय है। हां ये विचारणीय भी है, विचारणीय सिर्फ आइडिया की क्लिकिंग से लेकर माहौल को कैप्चर करने के कारण ही नहीं बल्कि इसका चित्रण कुछ लंबा हो जाने के कारण भी। मुन्नी की इस दबंगई शैली में प्रस्तुति के लिए आपको बधाई। – मृगांक

    Lacey के द्वारा
    May 25, 2011

    Haha. I woke up down today. You’ve cheeerd me up!

    Kenelm के द्वारा
    May 25, 2011

    Very true! Makes a change to see smoonee spell it out like that. :)

rashmi ojha के द्वारा
November 16, 2010

दरअसल वो अपने मुन्नीत्व के लिए बदनाम हुई है, हो रही है और आगे भी होती रहेगी। मुझे लगता है कि मुन्नी ने मुन्ना भाइयों के इस मुल्क में मुन्नीत्व के तौर पर एक नई विचारधारा का प्रतिपादन किया है। ……वाह क्या लेख है …इसे पढ़ कर पहली बात दिमाग मे उभरी की ..हम तो इस गाने को कब से सुन रहे हैं लेकिन इसके बारे हर कोई इतना सोच नही सकता ।

    Aileen के द्वारा
    May 25, 2011

    In awe of that asenwr! Really cool!

Satish Mishra के द्वारा
November 15, 2010

यदि तीन बार पाठ करने से मुन्नी को तिवारी या त्रिपाठी हो जाना चाहिए तो एकता कपूर, जिन्होंने कोई भी डायलाग तीन बार से कम कभी नहीं बोलने दिया, को तो जाने कबका त्रिपाठी हो जाना चाहिए था. अपील की जाये.

atharvavedamanoj के द्वारा
November 15, 2010

superb..excellant o brilliant too

विजय त्रिपाठी के द्वारा
November 15, 2010

मुन्नी के बहाने तिवारियों-त्रिपाठियों को बदनाम किया जा रहा है।

    sushma के द्वारा
    November 16, 2010

    आप आगबबूला क्यों होते है त्रिपाठी जी बहुत कुछ लिखा जाता है और पड़ा जाता है रचना को रचना की ही दृष्टी से देखे तो ही अच्छा रहता है क्यों ठीक कह रहे है न?आप तो इसे कही का कही जोड़ रहे है.वैसे भी मुन्नी तो बदनाम हो ही गयी है.

    Rajneesh Tripathi के द्वारा
    November 20, 2010

    इस रचना से त्रिपाठी-तिवारी मजबूत हुए हैं सर। कोई तो है जो किसी बहाने उनकी ताकत बता रहा है।

Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
November 15, 2010

इसे कहते है कुछ अलग लिखना… इस गाने का मूल गाना याद आ रहा है…. लड़की बदनाम हुई नसीबन तेरे लिए…यह मुन्नी ही है, जिसने नसीबन को डार्लिंग में बदलकर सन्नामी की स्थितियां पैदा कर दीं… सच, ऐसा आप ही लिख सकते हैं।

abhishek tripathi, kanpuriya club के द्वारा
November 15, 2010

bhaiya ais likhe ho ki ab munni bhi itra rahi hai. jhakarkatti se bhannapurva tak tumhar lekh ka print liye-liye ghoom rahi hai. badnam kare k liye mumbaiyan ka gariya rahi hai aur kah rahi ab to gt road ma hi basab. yahi hamka samman miliye.

R K KHURANA के द्वारा
November 15, 2010

प्रिय विष्णु जी, देर आयद दुरुस्त आयद ! बहुत- बहुत सुंदर व्यंग ! यात्रा के चिंत्रण के साथ मुन्नी का वर्णन आपकी कल्पना शक्ति को भी दर्शाता है ! शुरुआत में कोइ भी मुन्निव्रत नहीं हो पाता परन्तु अंत ……मुन्नी मुन्नी हो गया ! बधाई ! राम कृष्ण खुराना

नवीन भोजपुरिया के द्वारा
November 15, 2010

विष्णु भईया भोजपुरिया प्रणाम शुरुवात हम करेंगे इन पंक्तियो से जज्बातो के मरते शहर की पैदाईस हो गये हम सब, हर मोड पे एक एक मर्डर तो आज कायर भी करता है ,,, जी हम सही कह रहे है , अपना भी एक ऐसा ही अनुभव रहा जब हम अपने गांव अभी 20 दिन पहले गये थे जहा पे एक गांव पे बुजुर्ग के देहांत हो जाने पे उनकी तेरहवी मे जाने का मौका मिला और जिस समय उनके फोटो पे पुष्प अर्जित हो रहा था उसी समय एक गाने की दो लाईन सुनाई दी जिससे बाकी माजरा मालुम पड गया गाना था मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये झंडु बाम हुई डार्लिंग तेरे लिये अब राजु भईया तो दशहरी आम कह रहे है कोई लंगडा तो कोई खटहवा तो कोई तोतापुरी कह रहा है । मलाईका को देखने के बाद तोतापुरी ज्यादा उचित है । खैर आपके ब्लाग जीवंत होते है एक एक पंक्ति हमारे साथ चलती है और उनका असर वैसा ही होता है ठीक जैसे झंडु बाम के लगाने के बाद कोई पुराना दर्द काफुर हो जाता हो । एक करारा व्यंग्य एक जबरदस्त प्रहार आज के ढकोसले से भरे समाज पे । राजु भईया धन्यवाद इस महारथी से परिचय करवाने के लिये ! जय हो जिया हो ।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 15, 2010

आदरणीय त्रिपाठी जी सादर प्रणाम,बदनाम मुन्नी को सतनाम……………………..धन्यवाद सर!

devendrarai के द्वारा
November 15, 2010

आदरणीय विष्‍णु भैया, मुन्‍नी के बहाने आपने समाज के बदलते रंग-ढंग का सजीव चित्रण किया है। साथ में जो दर्शन दिया है, वह हर किसी के लिए नया है। मैंने रविवार को ही इसे पढा, अपने अन्‍य साथियों को भी पढाया। पर, कम्‍प्‍यूटर में तकनीकी गडबडी के कारण एक दिन बाद आपसे मुखातिब हो सका। सच में आपके ताजा ब्‍लाग से काफी कुछ जानने और समझने का अवसर मिला। खासतौर से जेट गति से परिवर्तित होती भारतीय मानसिकता के संदर्भ में। बहुत बढिया। देवेन्‍द्र राय, कोलकाता

    Beatrice के द्वारा
    May 25, 2011

    This has made my day. I wish all posgtnis were this good.

sdvajpayee के द्वारा
November 15, 2010

 आपके मुन्‍न्‍यत्‍व से एक और मुन्‍नी-प्रसंग की याद आ गयी। चार पांच साल पहले मानेसर या आगरा  में हुई संपादकीय कार्यशाला के सांध्‍य कालीन कार्यक्रम में स्‍व. विनाद शुक्‍ल जी ने श्री शैलेन्‍द्र दीक्षित जी के साथ ” तीन बजे मुन्‍नी जरूर आना ….; .” का ऐसा पौरुषी समां बांधा थी कि बडे बडे वीतरागी से दिखने वाले भी मुन्निया गए थे। मुन्‍नैषणा में लीन हो गए थे। लेखन कौशल की तारीफ करने की जरूरत नहीं है।

    Brijesh के द्वारा
    November 15, 2010

    मानेसर में उक्त मुन्नीगान हुआ था।

गोपाल कृष्ण शुक्ल के द्वारा
November 15, 2010

वाह विष्णु जी बहुत अच्छा समा बाँधा मुन्नी के लिये । क्या हो गया है इस पावन देश भारत का जो मुन्नी (दबंग) और मुन्ना (मुन्ना भाई MBBS) भजन और श्रृध्दा की दृष्टि से देख रहा है।

shatrughan के द्वारा
November 15, 2010

Vishnu ji bhai saheb namaskaar. aapne munnism ki jo vyakhya ki vo vakai sunder he. munni ko isa najar se kisi ne dekha hi nahi tha. munna bhaiyon ke beech munnism kese havi ho jata he yeh bhi apne aap me MAHILA SHAKTI ka parichay deta he… aapne dance me mast ladkon ka jo live chitran kiya vah bhi khoob he. naag ka fun or visfurit aankhen apne aap bata deti hen ki vahan kesa mahol hoga.

    Zaiyah के द्वारा
    May 25, 2011

    IMHO you’ve got the right asnewr!

lalita pradeep के द्वारा
November 15, 2010

vry imaginative………………

आर.एन. शाही के द्वारा
November 15, 2010

आदरणीय त्रिपाठी साहब, आपने जिस अंतर्दृष्टि से मुन्नीत्व का विश्लेषण आलेख में किया है, वह विलक्षण और दुर्लभ है । आपकी दृष्टि के कई एंगल तक तो पहुंच भी नहीं बन पा रही है । परन्तु यह तथ्य है कि फ़िलवक़्त समाज में मुन्नीत्व का भाव और उसके प्रति दीवानगी अपने चरम पर है, तथा सभी धर्म, समुदाय तथा साम्प्रदायिक भावनाओं पर भी हाबी है । काश कि यह सकारात्मक और रचनात्मक भी होती ।

Rajneesh Tripathi के द्वारा
November 15, 2010

मुन्नी की हर पंक्ति में परमार्थ का संदेश है। आपने यात्रा वृत्तांत के जरिए उसके वास्तविक भाववोध तक सबको पहुंचा दिया। जन्म लेती नई साधक परंपरा का भी पता दे दिया। मुन्नी की देहभाषा तक ही सीमित रहनेवालों के लिए यह नवीनतम व्याख्या नए ढंग से रचने, सोचने का भी रास्ता दिखाएगी। बधाई सर..।

pradeep agnihotri के द्वारा
November 15, 2010

जैसे बाइकर्स, कनछेदन कराके बाली पहनने वालों, उतरने को उद्यत जींस पहनने वालों, अच्छी-भली काया पर डरावने चित्र बनवाने वालों के समुदाय हैं, वैसे ही आपका देखा मुन्यातुर समुदाय भी है। दूर से देखने पर ये सभी बड़ा बढिया और ज्ञानपरक अनुभव देते हैं। कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे भी मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में हुआ था। जहां माता-पिता और परिवारीजनों के साथ पूजा करने आई एक युवती घुटने से करीब आठ इंच ऊंचा परिधान पहिने थी। फूलवालों और पूजा सामग्री बेचने वालों के द्विअर्थी जुमले तमाम लोगों को असंयत कर रहे थे, स्थान की पवित्रता में बट्टा लगा रहे थे। लेकिन युवती और उसके परिवारीजनों के लिए सब कुछ सामान्य था। जाहिर है कुछ लोग सिर्फ अपनी सुविधा के अनुसार माहौल बनाते हैं, उन्हें बाकी समाज से कोई लेना-देना नहीं होता। इजी कनेक्टिविटी के दौर में उनका जुटान भी आसान होता है औऱ इजी मनी के चलते साधन भी उपलब्ध रहते ही हैं। तब मूल्यों के मूल्यहीन होने में कितनी देर लगती है। रात के दो बजे का अनुभव बढ़िया पिरोया।

amitabh kumar के द्वारा
November 15, 2010

jab tak munna jinda hai,tab tak munni badnam hoti rahegi.jis din logo ke ander ka minna mar gaya,koi munni badnam nahi hogi…….bahut accha lekh hai.ek anuradh hai krapaya apne lekh mujhe e mail dar diya kare to mai apka aabhari rahuga.munni ko is roop me prastut karane ke liye badhai,kisi ne to munni ke dard ko samajha,varna to munni is desh me ‘item’ hai.regards.amitabh kumar

Mahendra Gaur के द्वारा
November 14, 2010

अच्छा लेख है……………..badhai ……………कभी कभी मुन्नी अतोम बोम्ब भी हो जाती है…………….. ओवेराल्ल article reting ४.५/५

डाँ रजनीश शुक्ल के द्वारा
November 14, 2010

वाह। क्या बात है बरसो बाद पढा क्लासिकल व्यंग। आज तो व्यंग के नाम पर् विद्रूपता ही है। ऐसे में सार्थक बहस को आमन्त्रित करत व्यंग लेख तो शीतकालीन धूप की तरह गर्माहट देता है जिसमें ताप नहीं है, पर उष्मा है। ऐसी उष्मा जो जलाती नहीं पश् सक्रिय कर जाती है। मून्नी तो समाज में बढरही ऐन्दिकता है। जो तरह तरह से नर्तन कर रही है, नर्तन करा रही है। यह मन के अन्दर बैठा हुआ वह भाव है जो मांसलता के भौडे रूप को ही देखन चाहता है। इस मुन्नी का बदनाम हो ना अर्थात् ऐन्दिकता को बोधात्मक् अनुभव में परिवर्तित न कर उसे और अधिक उघाड देना है। यह क्लासिकल लेखन मेरे मन को देर तक उष्ण बनाये रखेगा।

    Carley के द्वारा
    May 25, 2011

    Good to see a tlanet at work. I can’t match that.

November 14, 2010

मुनी के इत्ते बढ़िया विवेचन पर अब कुछ कहने का बचा है का ?

punit tripathi के द्वारा
November 14, 2010

सही कहा आपने parantu kya muslim samuday waale aisa maante hain wo to bolte hai ye haram hai salman kaise aapni chhote bhai ke bibi ke saath dance kar raha hai.

mahendratripathi के द्वारा
November 14, 2010

सादर प्रणाम नये तरह की बहस के साथ समाज में साहित्यिक तरीके से जो शब्‍दों की रचना की वह निश्चित तौर पर एडाप्‍ट करने वाला है काफी दिनों के बाद ही सही लेकिन विचारों को डझकझोरने वाला इशू मिला चारो तरफ मुन्‍नी बदनाम हुइ को लेकर चर्चा दूसरे तरह की हो रही है लेकिन आप के विचार ने नया सवाल खडा किया है इतना तो जरुर है कि आपके चकराने वाले विचार को दो बार तो जरुर पढना पडेगा तभी पल्‍ले पडेगा बहुत अच्‍छा लगा आपको बधायी इस लिए कि इसको आपने नये तरीके के साथ देखा आपका महेन्‍द्र कुमार त्रिपाठी महराजगंज निकट नेपाल बार्डर

suni pandey के द्वारा
November 14, 2010

मुन्नी की ‘बदनामी’ को लेकर शब्दों का अद्भुत खांचा खीचा है। ए क नए संप्रदाय का अभ्युदय किया है। जिस व्यंगात्मक लहजे में मुन्नी को सतनाम किया है, वह बहुत अच्छा लगा।

    Rayann के द्वारा
    May 25, 2011

    At last, someone comes up with the “right” anwesr!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 14, 2010

खूबसूरत लेख ……….. वो अस्तव्यस्त होते हुए भी नर्तन की तमाम मुद्राओं में अंतर्व्यस्त होते हुए मुन्यातुर हुए जा रहे थे, मुन्याकांक्षी हुए जा रहे थे, मुन्याभिलाषी हुए जा रहे थे। कई बेहतरीन शब्दों के निर्माण ने इस लेख को पूरी तरह से मुन्निमय बना दिया है…………….. हार्दिक बधाई………….

dinesh mishra के द्वारा
November 14, 2010

सर प्रणाम। अदभुत विश्‍लेषण किया है मुन्‍नी का आपने। खास तौर पर मुन्‍नी संप्रदाय के बारे में आध्‍यात्मिक नजरिए ने मुझे काफी प्रभावित किया है। यह बहुत कुछ कबीर का अपने निर्गुण राम के प्रति समर्पण जैसा ही है। जहां वह अपने राम के लिए दुल्‍हन तक बन जाते हैं- प्रभु मेरे पीव मैं राम की बहुरिया। आपके विश्‍लेषण में मुझे हिंदी सा‍हित्‍य के प्रख्‍यात विद्वान अज्ञेय का चिंतन नजर आता है। कुछ -कुछ मुक्तिबोध और निर्मल वर्मा के यायावरपने की भी झलक मिलती है। जो कहीं भी कभी भी आगे बढ जाने के लिए ठहर जाता है। चिंतन करने लग जाता है। बिलकुल बुद्ध की तरह। अज्ञेय की कविता असाध्‍य वीणा का प्रियंवद भी वीणा को साधने के दौरान अपने आपको समर्पण की हद तक गुजर जाता है। वह अपने आपको वीणा के अस्‍ि‍तत्‍व से साम्‍य स्‍थापित कर लेता है। इस प्रकार वह असाध्‍य वीणा बज उठती है। वह कहता है- श्रेय नहीं कुछ मेरा सब कुछ थी तथता की। मैं तो डूब गया था स्‍वयं शून्‍य में। वही चिंतन प्रक्रिया आपने भी अपनाई है। अदभुत और अकल्‍पनीय चिंतन।

kmmishra के द्वारा
November 14, 2010

आदरणीय त्रिपाठी जी सादर प्रणाम । आपने लेट नाईट शो को मुन्नीत्व प्रदान किया । व्यंग के इस क्लासिकल स्टाईल पर बस फिदा हुसैन होने का मन कर रहा है लेकिन होऊंगा नहीं क्योंकि भारत की नागरिकता छोड़ने का इरादा नहीं है और न हीं किसी देश की लेने का । इतने दिनों के बाद वापसी और साथ में बदनाम मुन्नी । आनंद आ गया बदनाम मुन्नी के इस शास्त्रीय पक्ष को पढ़ कर ।

    Morey के द्वारा
    May 24, 2011

    Didn’t know the forum rules allowed such birlliant posts.

ashwini के द्वारा
November 14, 2010

भैया, —जिस देश में मेरे लिए, मेरे लिए, मेरे लिए की पुकार मची रहती थी, वहां तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए का मुन्नीत्व हिलोरें ले रहा है। मुन्‍नी बदनाम के बहाने एक नया दर्शन। यह philosophy अच्‍छी लगी।

deoki nandan mishra के द्वारा
November 14, 2010

visnu ji. aapne bahut acchi bat par apna blog likha haii. es tarah ke halat sabhi tuharon par utpann ho rahe haii. julush me puri sadak ko gher lena aam bat hai. mughe lgta haii ye sab sarkari mshinari ke active na hone ki vajah se haii. maii ead ke muke par singapor gaya tha. wahna par bhi esi tarah ke halat paida hote the. tab wahna ki sarkar ne kisi bhi samuday ke julesh par rok laga di. ab wahna ki sarkar kisi bhi samuday ke parv par sarkar kiour se sajawat ki jati haii. mughe lagta haii india me to ye behad jaruri haii

sumit rana के द्वारा
November 14, 2010

vishnu ji aap ki lekhni men jadoo hai. bahut majedar likha hai aapne. aapki kalam ko salam

आनन्‍द राय-लखनऊ के द्वारा
November 14, 2010

‘मैं उस नर्तक समूह में एक संप्रदाय देख रहा था, मुन्नी संप्रदाय।’ आदरणीय भाई साहब आपने अपनी इस यात्रा के बहाने एक नये संप्रदाय की खोज कर दी। वाकई आपके इस शब्‍द चित्र और यात्रा वृतांत से जागरण जंक्‍शन पर बदलते दौर की एक नयी तस्‍वीर चस्‍पा हुई है। इस रपट में मनोविज्ञान, मनोविकृति और उन अदृश्‍य अहसासों की तरफ भी इशारा है जिसे सामान्‍य तौर पर लोग समझ नहीं पाते हैं। दो बार पढ़ा हूं और बहुत मजा आया। कई जगह मन गंभीर हुआ और कई जगह गुदगुदी भी हुई। मसलन —–’उनकी आंखें लगातार चार हो रही थीं, लेकिन निश्चित तौर पर वो, वो नहीं थे, जिनके लिए कुछ दिनों पहले एक (अ) प्राकृतिक कानून बनाया गया है। ‘ ——- -’गाने के दौरान मुन्नी जब भी बदनाम होती तो तेबारी हो जाती, तिवारी हो जाती, त्रिपाठी हो जाती। वो तीन बार पाठ करती…तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। डार्लिंग! तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। इस त्रिपाठ में एक अदभुत लास्य भाव की अभिव्यंजना है। ललित मिश्रित कामोद और हंसध्वनि की वर्णसंकर भैरवीआइट रागात्मकता है।’ यकीनन यात्रा का प्रसंग आपके शब्‍दों में ढलकर इतना पठनीय और मनभावन हो गया है कि उसे व्‍यक्‍त कर पाना मुश्किल लग रहा है। इस सुरुचिपूर्ण रपट के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

राजू मिश्र के द्वारा
November 14, 2010

मुन्नी जब भी बदनाम होती तो तेबारी हो जाती, तिवारी हो जाती, त्रिपाठी हो जाती है, ऐसा भी नहीं है बंधु…वास्‍तव में मुन्‍नी तो चारोधाम है …मुन्‍नी मजहब से परे है। मुन्नीत्व का विवेचन बहुत कायदे से किया है। समापन भी जोरदार है। ले मैं तो कालाजाम हुई डार्लिंग तेरे लिए…जय हो। 

    November 14, 2010

    ई कालाजाम हुई डार्लिंग तेरे लिए !

    जय हो !

    Adarshini srivastava के द्वारा
    November 15, 2010

    tripathi ji ki soch aur is rachna ko likhne ki kala ki mai daad deti hu, sahi hai aj kal kisi bhi samaroh me aise karnshulak geet aam baat ho gai hai

    ajaysingh के द्वारा
    November 15, 2010

    आरणीय सर बात मुन्‍नी की नहीं है। बात है त्‍यौहारों में बढ़ रही फूहड़ता व अश्‍लीलता की। त्‍यौहारों के बहाने की सही कम से कम महीने या साल भर में कुछ भी करने की आजादी मिल जाती है।करीब बीस साल पहले फैजाबाद की एक घुमंतू समुदाय की स्‍थानीय गायिका ताराबानो ने गाना गाया था लड़का बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिये। अब उसी का दूसरा चरित्र मुन्‍नी के रूप में सामने आया है।

    praful vyas के द्वारा
    November 15, 2010

    अच्छा व्यंगात्मक लेख,लेखक को बहुत बहुत धन्यवाद


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